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इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की शहादत के दुःखद अवसर पर विशेष

इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की शहादत के दुःखद अवसर पर विशेष

सफ़र का अंतिम महीना है।

यह इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की शहादत का दुःखद दिन है। इस दुःखद अवसर पर इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम का पवित्र रौज़ा श्रद्धालुओं से भरा पड़ा है इसमें बहुत वे श्रद्धालु भी हैं जो पवित्र कर्बला की यात्रा पर न जा सके। सब इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की सेवा में हाज़िर हुए हैं ताकि उनकी शहादत के दुःखद अवसर पर आपके पवित्र रौज़े में हाज़िर होकर अपने दिल को सुकून प्रदान कर सकें।

ये श्रद्धालु इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की शहादत के दुःखद अवसर पर उनके पवित्र रौज़े में हाज़िर हुए हैं ताकि अपने आंसूओं से दिल पर जमे ज़ंग को छुड़ा और अपनी आत्मा को विशुद्ध कर सकें। लोगों के दिल दुःखी व मन क्षुब्ध हैं परंतु इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के पवित्र रौज़े में उपस्थिति से उन्हें जो दिली खुशी है उसका वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता। यह बात सही है कि इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की ज़ियारत ग़रीबों का हज है किन्तु इमाम कर्बला न जा पाने वाले के गंतव्य भी हैं। जो लोग किसी भी वजह से कर्बला नहीं जा सके उन्होंने कर्बला जाने वालों से दुआ करने के लिए कहा था और इन लोगों ने कर्बला जाने वालों से विदा ली थी ताकि वे उन सबकी तरफ से भी ज़ियारत करें किन्तु कर्बला न जा पाने की वजह से जो दिली ग़म है उसे दूर किया जाना चाहिये। जब लोगों के ये क़दम कर्बला में बैनल हरमैन न पहुंच सकें और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के प्रेम व श्रद्धा में क़दम ज़मीन पर न रख सके तो केवल एकमात्र आशा की किरण और शरण स्थल अली बिन मूसा रज़ा अलैहिस्सलाम हैं।

बहुत से श्रद्धालु मशहद इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के पवित्र रौज़े में इस आशा के साथ गये हैं कि शायद अगले साथ उन्हें कर्बला जाने का सौभाग्य प्राप्त हो जाये।

इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम शीया मुसलमानों के आठवें इमाम हैं। आपने 35 वर्ष की उम्र में इमामत का ईश्वरीय दायित्व संभाला। चूंकि आपके पिता इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम बग़दाद और बसरा की जेलों में बंद थे और शीयों से उनके संबंध खत्म हो गये थे इसलिए शीयों से संपर्क का साधन इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम थे। आपकी इमामत के दौरान तीन बनी अब्बासी ख़लीफ़ाओं हारून, अमीन और मामून ने शासन किया। इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के जीवन के अंतिम पांच वर्षों में अब्बासी ख़लीफ़ा मामून का शासन था। वह अब्बासी ख़लीफ़ाओं में बहुत ही धूर्त, मक्कार और पाखंडी था। आरंभ में मामून ने इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम को प्रस्ताव दिया कि वह ख़िलाफत को स्वीकार कर लें किन्तु जब इमाम ने उसके इस प्रस्ताव को रद्द कर दिया तो उसने कहा कि जब खिलाफ़त को नहीं स्वीकार कर रहे हैं तो उत्तराधिकारी के पद को अवश्य स्वीकार कीजिये।

मामून ने जो इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम को उत्तराधिकारी का प्रस्ताव दिया था तो इसके विभिन्न कारण थे। मामून ने सत्ता की भूख में अपने भाई अमीन की हत्या कर दी थी जिसके कारण बहुत से लोगों विशेषकर सुन्नी मुसलमानों के मध्य उसकी लोकप्रियता ख़त्म हो गयी थी क्योंकि सुन्नी मुसलमान अमीन के प्रबल समर्थक थे इस आधार पर वह इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की लोकप्रियता का लाभ उठाकर अपनी सरकार को वैधता प्रदान करना चाहता था। चूंकि मामून ने अमीन की हत्या कर दी थी इसलिए बनी अब्बास अंदर से क्रोधित व क्षुब्ध थे मामून यह चाहता था कि बनी अब्बास उसे स्वीकार कर लें और उसके आदेशों का पालन करें उसने यह कार्य अब्बास से करवाने के लिए इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम को अपने पास बुला लिया ताकि एक प्रकार से उसकी सरकार को वैधता प्राप्त हो जाये। आरंभ में  इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम पवित्र नगर मदीना से मामून की सरकार के केन्द्र मर्व नहीं आना चाह रहे थे किन्तु जब मामून के कारिन्दों ने इमाम को मदीना से मर्व चलने के लिए मजबूर किया तो आप विवशतः मर्व आ गये किन्तु ध्यान योग्य बिन्दु यह है कि मामून की सारी चाल यह थी कि इमाम उत्तराधिकारी के पद को स्वीकार कर लें ताकि उत्तराधिकारी की आड़ में वह अपने अवैध कार्यों को वैध का रूप दे सके किन्तु इमाम ने उत्तराधिकारी का पद स्वीकार करके लोगों को सत्य, शुद्ध इस्लाम और पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों से अवगत कराया।

ईरान के अंदर और इस्लामी जगत के पूर्वी क्षेत्रों में कुछ लोगों ने शीया धर्म को स्वीकार कर लिया था और कुछ लोगों के अंदर शीया धर्म की ओर रुजहान उत्पन्न हो गया था। लोगों द्वारा शीया धर्म को स्वीकार करने या शीया धर्म के प्रति रुचि पैदा करने में इमाम के पहले के प्रतिनिधियों ने भूमिका निभाई थी जबकि एसे भी बहुत से लोग थे जो इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम को नहीं पहचानते थे। इस आधार पर जब इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम ने मामून के उत्तराधिकारी पद को स्वीकार कर लिया तो पैग़म्बरे इस्लाम और उनके परिजनों से प्रेम करने वालों का मनोबल ऊंचा हो गया और उन पर जो दबाव था वह कम हो गया और हर जगह पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों को अच्छे नामों के साथ याद किया जाने लगा और जो लोग पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों से अवगत नहीं थे वे इन महान हस्तियों से अवगत हो गये।

इसके अलावा मामून इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की मौजूदगी में मुनाज़रा व शास्त्रार्थ करवाता था ताकि इस बहाने से वह इमाम की छवि को धूमिल कर सके और उसे आघात पहुंचा सके और इसके लिए वह दूसरे धर्मों के बड़े- बड़े विद्वानों को आमंत्रित करता था परंतु मामून की कामना के विपरीत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम का शैक्षिक स्थान पहले से अधिक स्पष्ट हो गया और दूसरे धर्मों के लोगों ने इमाम के ज्ञान के अथाह सागर से लाभ उठाया।

इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम गुप्त ढंग से इस प्रकार अत्याचार से संघर्ष कर रहे थे कि उनका यह संघर्ष पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों से लोगों के अधिक अवगत होने का कारण बना और लोग पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों विशेषकर इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की प्रशंसा करने लगे जबकि सरकारें उनकी विशेषताओं और आध्यात्मिक स्थान को छिपाने और उन्हें आघात पहुंचाने के लिए विस्तृत पैमाने पर दुष्प्रचार करती थीं। बहरहाल मामून ने जब यह देखा कि जिन लक्ष्यों के लिए उसने इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम को उत्तराधिकारी बनाया था उनमें से कोई भी लक्ष्य वह हासिल नहीं कर सका है तो उसने इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम को शहीद करवाने में किसी प्रकार के संकोच से काम नहीं लिया। इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम भी अपने पूर्वजों की भांति अन्याय व अत्याचार से संघर्ष के मार्ग में शहीद हुए और उन्होंने एक क्षण के लिए भी अत्याचारी सरकार से सहकारिता करने और उसके साथ साठ- गांठ को स्वीकार नहीं किया। ईरान के लोग गर्व करते हैं कि वे इस प्रकार की महान हस्ती के मेज़बान हैं और प्रतिदिन इस महान हस्ती के पावन अस्तित्व से लाभांवित हो रहे हैं।

इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम समस्त सद्गुणों और नैतिक विशेषताओं की प्रतिमूर्ति थे। इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम समस्त ईश्वरीय सद्गुणों से सुसज्जित होने के बावजूद समाज के हर वर्ग के अधिकारों पर ध्यान दिये जाने पर बल देते थे। एक प्रसिद्ध रावी सुलैमान बिन जाफ़र अबू हाशिम जाफ़री कहता है कि एक दिन कुछ कार्यों को अंजाम देने के लिए मैं इमाम की सेवा में था जब मेरा काम समाप्त हो गया तो मैंने इमाम से जाने की अनुमति मांगी किन्तु इमाम ने फरमाया आज रात हमारे पास  रहो! उसके बाद मैं इमाम के साथ उनके घर गया। सूरज डूबने का समय हो गया था और इमाम के ग़ुलाम एक इमारत के निर्माण में व्यस्त थे। इमाम ने जब उन सबों के मध्य एक अजनबी को देखा तो पूछा कि यह कौन है? उन सबने जवाब दिया यह एक मज़दूर है हमारी सहायता कर रहा है उसे हम कुछ दे देंगे। इस पर इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम ने कहा कि क्या इसकी मज़दूरी तय किये हो? तो उनके दासों ने कहा कि नहीं हम जो भी दे देंगे यह ले लेगा। इस पर इमाम नाराज़ हो गये। उन्होंने फरमाया बारमबार इन लोगों से मैंने कहा है कि किसी को भी काम पर न लाओ किन्तु यह कि पहले उसकी मज़दूरी तय कर लो। इसके बाद इमाम फरमाते हैं” अगर किसी व्यक्ति की मज़दूरी तय किये बिना उसे काम पर रख लिया जाये तो अगर उसकी मज़दूरी के तीन बराबर भी उसे दिया जाये तब भी वह यही समझेगा कि उसे कम दिया गया है किन्तु अगर पहले से मज़दूरी तय कर ली जाये और जो मज़दूरी तय की गयी है उतना ही पैसा दिया जाये तो वह प्रसन्न रहेगा और सोचेगा कि वचन पर अमल किया गया है और अगर जो मज़दूरी तैय की गयी थी  उससे थोड़ा ही ज्यादा दी जाये तो वह प्रसन्न होगा और सोचेगा कि अधिक दिया है और आपका आभार व्यक्त करेगा।“

ज्ञात रहे कि सुलैमान बिन जाफ़र अबू हाशिम जाफ़री वह विश्वसनीय और भरोसेमंद शीया रावी है जिसे आठवें इमाम, इमाम रज़ा, नवें इमाम, इमाम जवाद, दसवें इमाम, इमाम अली नकी और 11वें इमाम इमाम हसन अस्करी अलैहिस्लाम की सेवा का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।

अपने और अपने परिवार के लिए आजीविका के लिए प्रयास करने को एक अच्छी विशेषता बयान किया गया है और यह मोमिन इंसान के लिए अच्छी विशेषता बयान की गयी है। इस्लाम के अनुसार आजीविका के लिए प्रयास ईश्वर की राह में जेहाद के बराबर है जो व्यक्ति इस राह में जान दे देता है वह ईश्वर की राह में शहीद मरता है। इस प्रकार मज़दूर का पसीना बहाना शहीद के ख़ून के बराबर है जो ईश्वर की राह में शहीद होता है। इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम आजीविका के लिए प्रयास करने वाले के पुण्य के बारे में कहते हैं” सच में जो रोज़ी में वृद्धि चाहता है ताकि अपने परिवार का संचालन कर सके तो उसे ईश्वर की राह में जेहाद करने वाले से अधिक पुण्य दिया जायेगा।“

समाज के हर इंसान के अधिकार पर ध्यान देना इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की वह सिफारिश है जो हमेशा महत्वपूर्ण रही है और सदैव विशेषकर आज के समाज की ज़रूरत है और कोई दूसरों के अधिकारों का ध्यान रखता है तो इससे समाज में बहुत ही रचनात्मक प्रभाव पड़ते हैं। जो लोग दूसरों से काम करवाते हैं उन्हें चाहिये कि मज़दूर का पसीना सूख जाने से उसकी मज़दूरी दे दें।

इस्लाम धर्म का एक उद्देश्य इंसान की प्रतिष्ठा की सुरक्षा है। इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम फरमाते हैं” अगर लोग हमारी बातों की सुन्दरता को समझ जायें तो हमारा अनुसरण करेंगे। इस आधार पर हम सब पर अनिवार्य है कि हम मज़दूरों के अधिकारों का ध्यान रखें और इस बात को दृष्टि में रखें कि मज़दूरों का सम्मान वास्तव में महान ईश्वर के उन बंदों का सम्मान है जो हलाल ढंग से आजीविका कमाने के लिए प्रयाय कर रहे हैं।

इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम का एक स्वर्ण कथन पेश करते हुए कार्यक्रम को समाप्त करते हैं। आप फरमाते हैं” जो दूर होने के बावजूद हमारी ज़ियारत करे और हमारी ज़ियारत के लिए आये तो प्रलय के दिन हम तीन जगहों पर उसकी सहायता के लिए आयेंगे ताकि उसे दुःखों से मुक्ति दिलायें। पहला उस वक्त जब इंसान के कर्मपत्र दाहिये और बायें हाथ में दिये जायेंगे। दूसरे उस वक्त जब वह पुले सेरात से गुज़रेगा और तीसरे उस वक्त जब उसके कर्म तौले जायेंगे।      




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