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इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम की शहादत

इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम की शहादत

इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम का जन्म 3 सफ़र सन 57 हिजरी क़मरी को मदीना नगर में हुआ था।

सन 65 हिजरी क़मरी में अपने पिता इमाम ज़ैनुल आबेदीन की शहादत के बाद आपकी इमामत का काल आरंभ हुआ।  इमाम मुहम्मद  बाक़िर (अ) ने 19 वर्षों तक ईश्वरीय मार्गदर्शन के दायित्व का निर्वाह किया।  सात ज़िलहिज्जा अर्थात आज ही के दिन सन 114 हिजरी क़मरी में बनी उमय्या के तत्कालीन शासक हेशाम बिन अब्दुल मलिक के आदेश पर आपको शहीद कर दिया गया।  इमाम मुहम्मद बाक़िर की क़ब्र मदीने के जन्नतुल बक़ी नामक क़ब्रिस्तान में है।

कमरे में प्रवेश करते समय वह अपने ही विचारों में गुम था। दिल कहता था कि आगे बढ़े मगर बुद्धि कहती थी कि ठहर जा। दिल कहता था कि अगर आगे बढ़ा तो, तेरे बीवी बच्चे सुख चैन में रहेंगे , अब तक और इतने वर्षों से तू इसी लिए तो अथक परिश्रम कर रहा था। बुद्धि कहती थी कि अगर आगे बढ़ा तो हर हाल में तू उनके अपराधों में भागीदार बन जाएगा। दिल व दिमाग के इस घमासान युद्ध में वह फंसा हुआ था एक सांसारिक मोह माया की ओर बुला रहा था और दूसरा परलोक की सुन्दरता से उसे लुभा रहा था। वह परेशान व बदहवास था। फैसला करने की ताक़त खत्म हो गयी थी , एक क्षण के लिए वह कमरे में खड़ा हो गया छोटे से कमरे में चारों ओर नज़र दौड़ाई और ऊंची आवाज़ में स्वंय से पूछने लगा मैं अब क्या करूं? 

 

अचानक ही ताज़ी रोटी की सुगंध उसके नथनों से टकरायी , वह बाहर निकला तो देखा कि एक औरत तंदूर पर बैठी रोटियां पका रही है। बच्चे आंगन में एक दूसरे के पीछे दौड़ रहे थे। तंदूर की आग से महिला का चेहरा तमतमा रहा था और उसकी आंखों में लाली थी। कुछ देर वह महिला को देखता रहा फिर ज़ोर से उसने कहाः मैं स्वीकार कर लूंगा ताकि तेरे चेहरे से आंच और आंखों की जलन को दूर कर सकूं। वह इतनी ज़ोर से चिल्लाया था कि औरत चौंक गयी और रोटी बनाने के लिए जो आटा उसके हाथ में था वह तंदूर में गिर गया। उसने हैरत से अपने पति को देखा और कहने लगी आज तुम्हें क्या हो गया है? 

 

वह कुछ देर चुपचाप अपनी पत्नी को देखता रहा फिर उसने बोलना शुरु किया। क़बीले के बड़े लोग मुझे उमवी सरकार का अधिकारी बनाना चाहते हैं, समझ में नहीं आ रहा है क्या करूं? अक्ल काम नहीं कर रही है। मान लूं या इन्कार कर दूं? उसकी पत्नी ने उसे ध्यान से देखा और कहा इतनी देर से टहल टहल कर सोच रहे हो फिर भी कोई फैसला नहीं कर पाए? अक्लमंदी यही है कि मुहम्मद बिन अली अलैहिस्सलाम के पास जाओ और उनसे इस मामले में मदद मांगो। उस व्यक्ति की आंखें चमकने लगीं  उसने  मुस्कराते हुए  अपना माथा ठोंका और  कहने लगा यह बात अब तक मेरे दिमाग में क्यों नहीं आयी थी? 

इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम ने मुस्करा कर उसका स्वागत किया और पूछाः तुम्हारी समस्या क्या है? उस व्यक्ति ने सिर झुका कर दबे दबे स्वर में कहाः क़बीले में मेरी अच्छी पकड़ है। हमारे क़बीले का एक सरदार था जिसकी मृत्यु हो गयी है अब लोग मुझे सरदार बनाना चाहते हैं इस बारे में आप का क्या विचार है? इमाम  मुस्कराए और फिर कुछ ही क्षण बात, उनकी बातें उस व्यक्ति के कानों में रस घोलने लगीं। इमाम कह रहे थे। " ईश्वर ने आस्थावानों को उनके ईमान की वजह से ऊंचाई प्रदान की है भले ही लोगों की नज़रों में वह तुच्छ हों और ईश्वर ने नास्तिकों को तुच्छ रखा है भले ही लोगों की नज़रों में उच्च हों। किसी को किसी पर वरीयता प्राप्त नहीं है, अगर है तो ईश्वर पर ईमान की वजह से । जहां तक यह सवाल है कि तुम वह पद स्वीकार करो या नहीं तो देखो अगर ईश्वर के स्वर्ग में नहीं जाना चाहते तो इस पद को स्वीकार कर लो क्योंकि बहुत से अत्याचारी शासक, आस्थावान को जाल में फंसाते हैं और उसका खून बहाते हैं और तुम जो उस शासक की सेवा में होते हो और  उसके कामों का एक हिस्सा तुम्हारे ज़िम्मे होता है, उसके इस अपराध में तुम भागीदार होते हो जबकि बहुत संभव है कि उस शासक की सुविधाओं में तुम भागीदार न रहो। " 

इमाम ने इसके साथ ही यह भी कहा कि उनकी सेवा बिल्कुल न करना यहां तक कि एक बार दवात में क़लम डालने की सीमा तक भी नहीं, क्योंकि जो भी उनकी जितनी सेवा करता है, अपने धर्म को उतना ही नुक़सान पहुंचाता है। इमाम की बातों ने मीठी शहद की तरह उसके अस्तित्व में मिठास भर दी, उसे अपना जवाब मिल गया था और इस तरह से उसके दिल और दिमाग में जारी दंद्ध समाप्त हो गया था। 

 

इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम की ज़बान में एेसा ही प्रभाव और ऐसी ही मिठास थी। वह शिया मुसलमानों के पांचवें इमाम  और पैगम्बरे इस्लाम के परिजन अर्थात अहलेबैत के एक सदस्य हैं। पैगम्बरे इस्लाम के उत्तराधिकारियों में एक न एक ऐसी विशेषता होती थी जिस से उन्हें याद किया जाता है। पांचवें इमाम का नाम मुहम्मद बिन अली है और उनकी उपाधि " बाक़रुलउलूम " है।  अरबी में बाक़िर शब्द का अर्थ होता है धरती को चीरने वाला।  उनको यह उपाधि इस लिए मिली क्योंकि  उन्होंने ज्ञान को लोगों के लिए स्पष्ट किया और ज्ञान के छिपे ख़ज़ानों को ज्ञान प्रेमियों  के लिए उपलब्ध कराए।  

 

इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम को अच्छी तरह से मालूम था कि किसी भी काम और क़दम की बुनियाद चेतना और विचारधारा का निर्माण है। अगर किसी समाज में ज्ञान फैलाना है तो सब से पहले ज्ञान के महत्व से उस समाज के लोगों को अवगत कराना आवश्यक है। इसी लिए इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम ने पहले क़दम के तौर पर पैगम्बरे इस्लाम के कथनों से लोगों को अवगत कराना आरंभ किया वह कहते थे कि ज्ञान एक खज़ाना है और उसकी कुंजी, सवाल है, इस लिए सवाल करो ! ईश्वर तुम लोगों पर कृपा करेगा, क्योंकि सवाल करने से चार लोगों को लाभ मिलता है। सवाल करने वाले को, शिक्षक को, सुनने वाले को और जो जवाब देता है। " 

 

इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम का काल ज्ञान विज्ञान  के विस्तार का काल था और धर्मशास्त्र तथा हदीस अर्थात पैग़म्बरे इस्लाम एवं उनके पवित्र परिजनों के कथनों के क्षेत्र में काम करने वाले महान विद्वानों का दौर था  परंतु इन सबके मध्य इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम का विशेष स्थान था। चौथी हिजरी क़मरी के अंत और पांचवी हिजरी क़मरी के आरंभ के महान विद्वान शेख मुफीद लिखते हैं” पैग़म्बरे इस्लाम के अनुयाइयों, अनुयाइयों को देखने वालों और धर्म शास्त्रियों ने इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम के हवाले से ज्ञान बिखेरा है।  इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम अतीत के पैग़म्बरों के बारे में बयान फरमाते थे और लोग उनसे पैग़म्बर इस्लाम के आचरण एवं परम्परा से अवगत होते थे। 

 

पांचवीं हिजरी शताब्दी के महान शिया विद्वान शेख तूसी इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम के  महत्वपूर्ण व प्रभावशाली  शिष्यों की संख्या 466 बताते हैं। वह लिखते हैं कि हिजाज़ के शिया सुन्नी सभी लोग धार्मिक मामलों को इमाम से पूछते थे। बहुत से सुन्नी विद्वान इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम के पास शिष्यों  की तरह बैठ कर  ज्ञान अर्जित करते थे। हिजाज़ में इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम इतना प्रसिद्ध थे कि लोग उन्हें सैय्यदुल फोक़हा अर्थात धर्मशास्त्रियों के सरदार के नाम से जानते थे। विभिन्न विषयों के बारे में इमाम का विशेष स्थान इस प्रकार था कि हमेशा इस्लामी क्षेत्रों के लोगों के पूछने वालों का आना जाना लगा रहता था। बहुत से सुन्नी विद्वान इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम को ज्ञान का अथाह सागर मानते हैं। सुन्नी मुसलमानों के महान विद्वान ज़हबी लिखते हैं” समस्त सदगुण इमाम के अंदर एकत्रित थे और वे वास्तव में पैगम्बरे इस्लाम के  उत्तराधिकारी  थे। 

 

ईश्वरीय धर्मों  में अच्छे व्यवहार को बहुत महत्व दिया गया है और इसे एक मूल्यवान नैतिक विशेषता समझा जाता है। इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम फरमाते हैं” आस्थावान  का अपने  भाई के लिए मुस्कराने का बहुत महत्व है और उसकी समस्याओं व दुःखों को दूर करना नेकी व भलाई है । वे कहते हैं कि आस्थावान  के दिल को खुश  करने से अधिक किसी दूसरी चीज़ से बेहतर तरीक़े से  ईश्वर की उपासना नहीं की जा सकती।  इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम दूसरों को प्रसन्न करके  प्रसन्न होते थे और पैग़म्बरे इस्लाम के हवाले से लोगों को बताते थे कि उन्होंने कहा है कि  जिसने मोमिन को प्रसन्न किया उसने मुझे प्रसन्न किया अर्थात पैग़म्बरे इस्लाम को प्रसन्न किया और जिसने मुझे प्रसन्न किया उसने ईश्वर को प्रसन्न किया और कभी पैग़म्बरे इस्लाम अपने आस पास के लोगों को ऐसे हल्के फुल्के मज़ाक के लिए प्रोत्साहित करते थे जो किसी को खुश कर दे  और लोगों से फरमाते थे निःसंदेह ईश्वर उस व्यक्ति को पसंद करता है जो लोगों के मध्य मज़ाक करता है अगर उसके मज़ाक़ में अशोभनीय बातें न हों। ”

 

ईरान के प्रोफेसर सादिक़ गुलज़ादे कहते हैं कि आस्थावान व्यक्ति, प्रफल्लता से समाज को भर देता है और जहां जहां जाता है खुशिया और ऊर्जा बांटता है। आस्थावान का दुख उसके अस्तित्व के भीतर होता है और अपने दुख दर्द वह अपने भीतर ही संजोए रखता है और दूसरों को हमेशा खुश करता है। इस प्रकार से समाज में संतुलन पैदा होता है। यह वही पाठ है जो इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिसस्लाम ने दिया है और जिसके आधार पर समाज में न्याय, संतुलन और प्रेम फैलता है। इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम कहते हैं कि आलस्य व अवसाद से दूर रहो क्योंकि यह दोनों चीज़ें सभी बुराइयों की जड़ हैं आलसी व्यक्ति अपना अधिकार नहीं ले सकता और अवसाद ग्रस्त व्यक्ति सही काम में संयम नहीं दिखा सकता। इसी के साथ वह लोभ व लालच से दूर रहने पर भी बल देते और कहते हैं कि लालची व्यक्ति, उस रेशम की कीड़े की तरह होता है जो अपने ऊपर धागा जितना लपेटता जाता है उतना ही उससे निकलना उसके लिए कठिन होता है यहां तक कि उसी में वह मर जाता है। मानव समाज के मार्गदर्शन के आकाश के इस चमकते सितारे की नज़रों से ओझल होने और इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलमा के शहादत दिवस पर एक बार फिर हम आप की सेवा में हार्दिक संवेदना प्रकट करते हैं।


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