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इमामे हादी अलैहिस्सलाम का जन्म दिवस

इमामे हादी अलैहिस्सलाम का जन्म दिवस

पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स) के पौत्र और शिया मुसलमानों के दसवें इमाम, इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम का उपनाम हादी है।

आपका शुभ जन्म सन 212 में ज़िलहिज महीने की 15 तारीख़ को हुआ था।  इमाम हादी का जन्म मदीना के निकट "सरया" नामक क्षेत्र में हुआ था।  आपके पिता ने आपका नाम अली रखा था।  इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम के कुछ उपनाम इस प्रकार हैं हादी, नक़ी नासेह, फ़क़ीह, अमीन और मुर्तज़ा।  आज भी बहुत से लोग इमाम अली नक़ी को उनके मश्हूर उपनाम "हादी" के नाम से पुकारते हैं।

अपने पिता इमाम जवाद अलैहिस्सलाम की शहादत के बाद इमाम हादी ने मुसलमानों के नेतृत्व के ईश्वरीय दायित्व को संभाला।  इमाम हादी ने 33 वर्षों तक इस दायित्व का निर्वाह किया।  इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम के काल में इस्लामी समाज में वैचारिक दृष्टि से मतभेद फैल चुके थे।  भौगोलिक दृष्टि से इस्लाम का लगातार विस्तार हो रहा था।  इस परिस्थिति में दूसरे राष्ट्रों की विचारधाराएं इस्लामी समाज में प्रविष्ट हो चुकी थीं।  ऐसे में इस्लामी समाज में भांति-भांति की विचारधाराए प्रचलित हो रही थीं।  इस प्रकार की विचारधाराएं अपने ही दृष्टिकोण को पेश करके उसका प्रचार व प्रसार कर रही थीं।  इन बातों के परिणाम स्वरूप इस्लामी पंथों में गंभीर मतभेद पैदा होने लगे थे।  उधर तत्कालीन अब्बासी शासक कुछ विचारधाराओं का समर्थन कर रहे थे जिसके कारण मतभेद अधिक फैलते जा रहे थे।  उस काल में लोगों के बीच द्वेष, भ्रांतियां, भेदभाव, शत्रुता, धार्मिक भ्रांति और इसी प्रकार की बुराइयां बढ़ती जा रही थीं।  इन सब बातों से इस्लाम को बहुत नुक़सान हो रहा था।

अपने पिता की शहादत के बाद लगभग आठ वर्ष की आयु में इमाम हादी अलैहिस्सलाम ने ईश्वरीय मार्गदर्शन का दायित्व संभाला।  आपने 33 वर्षों तक ईश्वरी मार्गदर्शन का दायित्व बहुत ही उचित ढंग से निभाया।  इन 33 वर्षों में से 13 साल आपने मदीने में और 20 साल सामर्रा में गुज़ारे।  दसवे इमाम के जीवनकाल में अब्बासी शासन के 6 शासक आए जो सबके सब बहुत क्रूर थे।  इस दौरान सत्ता को लेकर अब्बासी शासकों में बहुत कड़ा संघर्ष रहा।  ऐसी स्थिति में इन शासकों का अत्याचार बहुत अधिक फैल चुका था।  ऐसे में इमाम ने अपनी दूरदर्शिता से तत्कालीन इस्लामी समाज को पतन से सुरक्षित किया।  

इमाम हादी अलैहिस्सलाम ने पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद (स) की परंपरा का अनुसरण करते हुए मुसलमानों के बीच एकता स्थापित करने का प्रयास किया।  पैग़म्बरे इस्लाम (स) मुसलमानों के बीच एकता और एकजुटता पर विशेष रूप से बल दिया करते थे।  आप फ़रमाते थे कि इस्लाम के शत्रुओं के मुक़ाबले में मुसलमानों का सम्मान और उनका शक्ति एकता में ही निहित है।  मुसलमानों के बीच एकता स्थापित करने के उद्देश्य से इमाम हादी अलैहिस्सलाम ने विभिन्न शैलियां अपनाई थीं।  इन शैलियों में से एक यह थी कि वे पवित्र क़ुरआन और पैग़म्बरे इस्लाम (स) की परंपरा या सुन्नत की ओर विशेष ध्यान दिया करते थे।  इमाम हादी ने अपने मानने वालों को लिखे एक पत्र में इस बात को स्पष्ट किया है।  वे लिखते हैं कि समस्त इस्लामी पंथ इसपर एकमत हैं कि क़ुरआन, हक़ है जिसमें किसी भी प्रकार का कोई भी संदेह नहीं है।  अब जब पवित्र क़ुरआन किसी रवायत या हदीस की पुष्टि करता हो तो फिर उसका मानना मुसलमानों के लिए आवश्यक है।  जब सारे ही लोग क़ुरआन की शिक्षाओं को मानें तो एसे में यदि कोई गुट इसको नहीं मानता तो वह इस्लाम से निकल जाता है।  इमाम के इस कथन से निशकर्ष निकलता है कि पूरी दुनिया के मुसलमान क़ुरआन पर एकमत हैं।  अबजब पवित्र क़ुरआन किसी भी बात की पुष्टि करे तो सारे ही मुसलमानों को उसे मानना चाहिए।

इमाम हादी ने शिया मुसलमानों के लिए भी पैग़म्बरे इस्लाम की परंपरा को ही प्रचलित किया।  एक बार इमाम हादी बीमार हो गए।  इमाम ने एक शिया धर्मगुरू "अबू हाशिम जाफ़री" से कहा कि वे किसी शिया को करबला भेजे ताकि वह वहां पर इमाम के स्वास्थ्य के लिए दुआ करे।  अबू हाशिम ने "अली बिन बेलाल" नामक व्यक्ति को इस काम की ज़िम्मेदारी सौंपी।  अली बिन बेलाल ने यह ज़िम्मेदारी स्वीकार करते हुए कहा कि इमाम हादी अलैहिस्सलाम स्वयं बहुत महान हैं।  वे तो इमाम हुसैन की ही भांति इमाम हैं।  ऐसे में मुझ जैसे व्यक्ति की तुलना में स्वयं उनकी दुआ ईश्वर के निकट जल्दी स्वीकार होगी।  यह बात जब इमाम हादी तक पहुंची तो उन्होंने कहा कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) काबे और हजरे असवद से बेहतर थे किंतु वे काबे का तवाफ़ करते और हजरे असवद को भी चमने थे।  इसके बाद इमाम हादी ने कहा कि ईश्वर ने धरती पर कुछ ऐसे स्थान निर्धारित किये हैं जहां पर उसकी इच्छा है कि प्रार्थना की जाए और दुआएं मांगी जाएं।  इस प्रकार के स्थानों पर ईश्वर से जो कुछ मांगा जाता है उसे वह मांगने वालों को प्रदान करता है।  करबला में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की क़ब्र भी उन्हीं स्थानों में से एक है।

इमामों ने धर्म के प्रचार एवं प्रसार के लिए जो शैलियां अपनाई उनमें से एक "तक़य्या" भी है।  इस शैली को इमाम हुसैन की शहादत के बाद विशेष रूप से अपनाया गया।  इमाम हादी अलैहिस्सलाम के काल में शिया मुसलमानों और पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों पर बहुत कड़ी नज़र रखी जाती थी।  उस काल में वे बहुत ही दबाव और कठिनाइयों में थे।  स्थिति इतनी संवेदनशील थी कि इमाम हादी के काल में बहुत से शिया मुसलमान, अपना ईमान छिपाने पर मजबूर थे।  हालात इतने ख़राब हो चुके थे कि कभी तो शिया मुसलमानों को अपने अक़ीदे के विपरीत बात कहनी पड़ती थी।  एक शिया मुसलमान ने ऐसा ही किया।  जब उसने इमाम से इस बारे मे पूछा तो इमाम हादी ने कहा कि तुमने ठीक किया। इमाम ने कहा कि एसी परिस्थिति में तक़य्या ज़रूरी है जिसका बदला ईश्वर की ओर से दिया जाएगा।

इस्लामी जगत में वैचारिक मतभेद आरंभ से थे और आज भी हैं।  इमाम हादी अलैहिस्सलाम के काल में भी वैचारिक मतभेद पाए जाते थे जिनकी जड़ें हज़रत अली अलैहिस्सलाम के काल से जुड़ी हुई थीं।  हज़रत अली अलैहिस्सलाम की विशेषताओं और उनकी महानता के कारण उनके काल के कमज़ोर आस्था रखने वाले इमाम अली के लिए वे विशेषताएं प्रयोग करने लगे थे जो ईश्वर से विशेष हैं।  इस प्रकार के लोग हज़रत अली अलैहिस्सलाम को पैगम्बरे इस्लाम (स) से बड़ा स्थान देने लगे थे।  हज़रत अली ने इसका कड़ा विरोध किया था।  इस बारे में उन्होंने कहा था कि शिया मुसलमानों को चाहिए कि वे पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों को बंदगी की सीमा से आगे नहीं बढ़ाना चाहिए।  वे पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों से दुश्मनी को विनाश का कारण मानने के साथ ही उनके बारे में अति करने को भी विनाश का ही कारण मानते थे।  इस संदर्भ में हज़रत अली अलैहिस्सलाम का कहना है कि मेरे बारे में दो गुट हलाक हो जाएंगे।  एक वह गुट जो दोस्ती में अति करेगा और दूसरा वह गुट जो मुझसे शत्रुता में अति करेगा।

इमाम अली अलैहिस्सलाम के बाद उनके विरोधियों विशेषकर उमवी और अब्बासी शासकों ने पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों के समर्थकों के बीच मतभेद फैलाने और दूसरे लोगों को उनसे दूर करने के उद्देश्य से इस प्रकार के मतभेदों को अधिक से अधिक हवा देने का काम किया।  इमाम जवाद अलैहिस्सलाम के काल की एक समस्या यह थी कि उनके काल के अतिवादियों का तत्कालीन शासक खुलकर समर्थन करते थे।  इमाम हादी ने इस प्रकार के अतिवादियों से मुक़ाबला करने का प्रण किया।  उन्होंने इस प्रकार के लोगों से दूरी बनाते हुए शिया मुसलमानों से कहा कि वे भी एसे लोगों से दूर रहें।  इमाम ने इस प्रकार की भ्रष्ट विचारधारा से लोगों को अवगत करवाया।  इमाम ने अपने मानने वालों से कहा कि वे इस प्रकार की विचारधारा रखने वालों से दूरी बनाए रखें।  इमाम जवाद ने "फहरी" और "इब्ने बाबाई क़ुमी" जैसे लोगों से शियो को दूर रहने को कहा।  अपने एक पत्र मे इमाम हादी ने इसका कारण बताते हुए लिखा है कि इब्ने बाबा यह सोचता है कि मैंने उसे नबी बनाया है और वह मेरा विश्वसनीय है।  इमाम कहते हैं कि ख़ुदा उसपर लानत करे।  उसपर शैतान सवार हो चुका है जिसने उसे गुमराह कर दिया है।

इमाम के काल में तत्कालीन शासन की ओर से लगातार अत्याचार किये जा रहे थे जिसके कारण घुटन का वातावरण बन गया था।  इस परिस्थिति में इमाम हादी ने लोगों का प्रशिक्षण आरंभ किया।  एतिहासिक प्रमाणों के अनुसार इमाम हादी के कम से कम 185 शिष्य थे।  उनके यह शिष्य इस्लामी ज्ञान के हर क्षेत्र में निपुर्ण थे।  इमाम के शिष्यों में कुछ एसे थे जो बाद में विश्व विख्यात ज्ञानी के रूप में जाने गए।  इन्ही लोगों में से एक "अब्दुल अज़ीम हसनी" हैं जिनका मक़बरा ईरान के शहरे रै में है।  इमाम हादी के एक अन्य शिष्य का नाम है फ़ज़्ल बिन शाज़ान।  उनका संबन्ध ख़ुरासान से था।  शाज़ान के महत्व के बारे में इमाम हसन असकरी अलैहिस्सलाम कहते हैं कि कितने सौभाग्यशाली है ख़ुरासान के लोग, जिनके बीच फ़ज़ल बिन शाज़ान जैसा इन्सान मौजूद है।  इमाम हादी के शागिर्द, विश्व के अलग-अलग क्षेत्रों में रहकर अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे थे।

 


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