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इंडिया जल रहा है, लेकिन क्या यह मोदी का अंत हैं? दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित पत्रिका का विश्लेषण

इंडिया जल रहा है, लेकिन क्या यह मोदी का अंत हैं? दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित पत्रिका का विश्लेषण

28 जनवरी को भारतीय प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने कोविड-19 के ख़िलाफ़ लड़ाई में जीत की घोषणा कर दी थी। विश्व आर्थिक मंच के शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए, उन्होंने कोरोना वायरस को प्रभावी ढंग से क़ाबू करके एक बड़ी आपदा से मानवता को बचाने के लिए तालियां बटोरी थीं। लेकिन तीन महीने भी नहीं गुज़रे थे कि भारत महामारी का केंद्र बन गया। देश की स्वास्थ्य प्रणाली पूर्ण रूप से ध्वस्त हो चुकी है।

देश के दूसरे इलाक़ों का हाल क्या होगा, जब राजधानी दिल्ली की सड़कों पर लोग ऑक्सीजन नहीं मिलने से तड़प-तड़प कर दम तोड़ रहे हैं। लोग अपने प्यारों को लिए एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल के लिए दौड़ लगा रहे हैं, श्मशान लाशों से पटे पड़े हैं और लाशों को जलाने का नहीं थमने वाला सिलसिला जारी है। सोशल मीडिया पर मदद की अपील के संदेशों की बाढ़ सी आ गई है।

कुछ लोगों ने तो अपने मृतकों को अपने गार्डेन में ही दफ़ना दिया है। वहीं कुछ लोग फ़ुटपाथों और पार्कों में लाशें जलाने पर मजबूर हैं। दक्षिण भारत में एक स्थानीय रिपोर्टर का कहना थाः लोग मक्खियों की तरह गिर रहे हैं। शायद ही ऐसा कोई परिवार बचा होगा, जो इस संकट से प्रभावित नहीं हुआ हो। गुरुवार को मरने वालों के आधिकारिक आंकड़े 208,000 बताए गए थे, जो एक बहुत बड़ा शर्मनाक झूठ है। क्योंकि कुछ विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह आंकड़ा 20 गुना ज़्यादा हो सकता है।

ऑक्सीजन और आवश्यक दवाओं के लिए एक बड़ा काला बाज़ार उभरकर सामने आया है, और 2015 में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा चीन को पछाड़ने के लिए एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में प्रशंसा हासिल करने वाला राष्ट्र, अब आपातकालीन विदेशी सहायता की बैसाखी का सहारा ले रहा है।

भारत को आज जिस स्थिति का सामना है, उसके लिए एक वायरस से ज़्यादा एक अंहकारी और कट्टर हिंदू राष्ट्रवादी नेता का आचरण ज़िम्मेदार है। मोदी के दावोस भाषण के बाद, उनकी सरकार ने भारतीयों को आत्महत्या के लिए उकसाने का काम किया और देश व विदेशों में यह भ्रम फैलाय कि मोदी सरकार ने महामारी को परास्त कर दिया है।

फ़रवरी में मोदी की हिंदुत्वादी कट्टरपंथी पार्टी बीजेपी ने एक प्रस्ताव पारित करके COVID -19 के ख़िलाफ़ लड़ाई में दुनिया में एक गौरवशाली और विजयी राष्ट्र का नेतृत्व करने वाले मोदी की प्रशंसा की गई। प्रस्ताव में दावा किया गया कि इंडिया ने सक्षम, संवेदनशील, प्रतिबद्ध और दूरदर्शी प्रधान मंत्री के नेतृत्व में COVID -19 को परास्त कर दिया।

उसके बाद, मार्च की शुरूआत में मोदी के स्वास्थ्य मंत्री ने एलान किया कि भारत, महामारी को लगभग हरा चुका है। उसी महीने गुजरात में बिना मास्क लगाए हज़ारों लोगों ने गुजरात के मोदी स्टेडियम में भारत और इंग्लैंड के बीच क्रिकेट मैच देखा। देश के कई राज्यों में बड़ी-बड़ी चुनावी रैलियों का आयोजन किया गया।

हिंदुओं के धार्मिक त्यौहार कुंभ मेले का आयोज किया गया, जो दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों मे से एक है और हर 12 साल में आयोजित होता है। सिर्फ़ 12 अप्रैल को 30 लाख से अधिक तीर्थयात्रियों ने हरिद्वार में गंगा नदी में डुबकी लगाई।

उसके पांच दिन बाद, जब भारत में कोरोना के 2 लाख 30 हज़ार से ज़्यादा मामले दर्ज किए गए, मोदी ने पश्चिम बंगाल में समर्थकों की भारी भीड़ का उत्साह बढ़ाते हुए कहा कि उन्होंने इससे पहले कभी इतनी भीड़ नहीं देखी।

आज भारत की इस नाज़ुक हालत के लिए मोदी द्वारा देश के संस्थापकों द्वारा स्थापित संस्थानों को कमज़ोर करने का परिणाम है। समस्त अधिकारों को अपने हाथों में लेकर और लोकतांत्रिक दुनिया में ख़ुद को बेमिसाल नेता के रूप में पेश करने के चक्कर में मोदी ने लगभग हर उस संस्थान को तहस-नहस कर दिया, जो शायद वर्तमान स्थिति के समय उन्हें तेज़ी से प्रतिक्रिया देने के लिए बाध्य करती।

दूरदर्शन समेत सरकारी और मेन स्ट्रीम मीडिया, मोदी को देश बचाने वाले के रूप में पेश करता रहा है। इस बीच, भारतीय राजनयिक, विदेशी अख़बारों के संपादकों पर मोदी सरकार की आलोचना करने वाले लेखों और रिपोर्टों को हटाने के लिए दबाव बनाने का प्रयास कर रहे हैं।

ट्विटर और फ़ेसबुक को सरकार की आलोचना वाले संदेशों को हटाने का आदेश दिया गया है। यहां तक कि इस क़यामत के समय में भी मोदी की इमेज बचाना, उनकी सरकार और पार्टी की सबसे बड़ी प्राथमिकता है।

यहां सवाल यह है कि क्या इस नई स्थिति को मोदी के अंत की शुरूआत मान लिया जाए? क्या इस लोगों में पनप रहा रोष, भारतीय प्रधान मंत्री के पतन का कारण बनेगा?

मोदी के पास संकटों से उबरने का एक लंबा रिकॉर्ड है। 2001 में गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के कुछ महीनों के बाद, उन्होंने भारत के इतिहास में सबसे ख़ूनी सांप्रदायिक दंगों की निगरानी की, जिसमें हज़ारों मुसलमानों का नरसंहार किया गया। देश भर में हाहाकार मच गया, उनकी एडॉल्फ़ हिटलर से तुलना की जाने लगी। अमरीका में उनके प्रवेश पर प्रतिबंध लग गया। लेकिन न केवल मोदी ने उस रोष पर क़ाबू पाया, बल्कि उन्होंने देश और विदेश में अपनी एक लोकप्रिय नेता के रूप में छवि गढ़ दी।

2016 में नोटबंदी के उनके फ़ैसले ने करोड़ों भारतीयों के जीवन को बुरी तरह प्रभावित किया। लेकिन इससे उनकी लोकप्रियता कम नहीं हुई और उन्होंने देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में और उसके बाद 2019 में संसदीय चुनाव जीता।

हालांकि देश को अब जिस ख़ौफ़नाक माहौल का सामना है, वह पहले की किसी भी घटना से बिल्कुल अलग है। मोदी इसके आरोप से बच नहीं सकते हैं, लेकिन वह ख़ुद कभी इसकी ज़िम्मेदारी स्वीकार नहीं करेंगे। कोई भी चीज़, उन्हें अपने पद से इस्तीफ़ा देने के लिए प्रेरित नहीं कर सकेगी।

अगले आम चुनाव में अभी तीन साल बाक़ी हैं, और अपने दामन पर लगने वाली ख़ून की छींटों को वह इस राजनीतिक परंपरा से धोने की कोशिश करेंगे कि जब नेताओं की बात आती है तो भारतीय सबकुछ भूल जाते हैं। मोदी भारतीयों की कमज़ोर याददाश्त का भरपूर लाभ उठाना चाहेंगे। msm (Kapil Komireddi FP)


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