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आर्मीनिया ने रूस से मांग ली मदद मगर पुतीन को है कराबाख़ में हस्तक्षेप को लेकर संकोच...क्या वाक़ई आज़रबाइजान जंग जीत चुका है? क्या ईरान की सीमा के क़रीब पहुंच रहा है इस्राईल?

आर्मीनिया ने रूस से मांग ली मदद मगर पुतीन को है कराबाख़ में हस्तक्षेप को लेकर संकोच...क्या वाक़ई आज़रबाइजान जंग जीत चुका है? क्या ईरान की सीमा के क़रीब पहुंच रहा है इस्राईल?

आर्मीनिया के प्रधानमंत्री निकोल बाशीनियान रूस से तत्काल मदद की मांग कर रहे हैं और उन्होंने अपना अपात संदेश रूसी रूष्ट्रपति व्लादमीर पुतीन को भेजा है तो इसका मतलब साफ़ है कि कराबाख़ के इलाक़े पर आज़रबाइजान के साथ जारी उनकी जंग निर्णयक चरण में पहुंच चुकी है जिसमें किसी भी समय बड़ी ताक़तों के कूद पड़ने की संभावना बढ़ गई है।

आज़रबाइजान के राष्ट्रपति इलहाम अलीएफ़ ने तुर्की के विदेश मंत्री मौलूद चावुश ओग़लू से मुलाक़ात में कहा कि आर्मीनिया के प्रधानमंत्री अगर रूस से मदद मांग रहे हैं तो इसी से यक़ीन हो जाना चाहिए कि वह जंग हार चुके हैं क्योंकि अब तक दो सौ से अधिक गांव और शहर कराबाख़ के इलाक़े में आज़ाद कराए जा चुके हैं।

आर्मीनिया से मदद की अपील प्राप्त हो जाने के बाद रूसी राष्ट्रपति पुतीन की प्रतिक्रिया बहुत सावधानीपूर्ण रही और उन्होंने कहा कि रूस तब इस विवाद में हस्तक्षेप करेगा जब जंग आर्मीनिया की धरती तक पहुंच जाएगी। इसका साफ़ मतलब यह है कि रूस कराबाख़ के इलाक़े को आर्मीनिया का हिस्सा नहीं मानता जिसको लेकर विवाद है और दोनों देशों के बीच जंग चल रही है। कम से कम बयान से तो यही मतलब निकलता है।

यह बात सही है कि रूस और आर्मीनिया के बीच रक्षा समझौता है मगर इस जंग में रूस के कूद पड़ने का मतलब यह होगा कि मास्को पर बहुत बोझ पड़ जाएगा क्योंकि यह जंग लंबी खिंच सकती है। आज़रबाइजान भी मास्को का मित्र देश समझा जाता है और दूसरी बात यह है कि उसे तुर्की और इस्राईल का समर्थन हासिल है। इस्राईल आज़रबाइजान से तेल और गैस लेता है और इस देश में इस्राईल की इंटैलीजेन्स भी मौजूद है।

कराबाख़ में जंग की आग भड़कने से ईरान को गहरी चिंता है क्योंकि यह इलाक़ा ईरान की उत्तरी सीमा के क़रीब है। ईरान के विदेश मंत्री जवाद ज़रीफ़ ने रविवार को अपने देश की गहरी चिंता बयान भी की। उन्होंने कहा कि ईरान के सीमा के क़रीब आज़रबाइजान के इलाक़े में आतंकी मौजूद हैं जबकि वहां इस्राईल के सैनिक और जासूस भी मौजूद हो सकते हैं।

ईरान की यह चिंता पूरी तरह जायज़ है। केवल इसलिए नहीं कि ईरान में लगभग 2 करोड़ आज़री जाति के लोग बसते हैं बल्कि इसलिए भी कि इस्राईल अलग अलग मोर्चों पर ईरान को नुक़सान पहुंचाने की कोशिश कर रहा है। इमारात और बहरैन से समझौते के बाद इस्राईल ने इन देशों में अपने ठिकाने बनाने की प्रक्रिया यक़ीनन शुरू कर दी होगी। यही काम उसने सऊदी अरब में भी किया है हालांकि सऊदी अरब के साथ इस्राईल का समझौता अभी ख़ुफ़िया है।

पुतीन बहुत सावधानी से और गहरे अध्ययन के बाद ही कोई क़दम उठाते हैं इसलिए इस विवाद में उनके कूद पड़ने की संभावना तो नहीं लगती मगर यह भी तय है कि कराबाख़ की वर्तमान स्थिति को वह बदलने भी नहीं देंगे। लीबिया में अपनी रणनीति से पुतीन ने साबित कर दिया है कि वह बड़े संयम और सहनशीलता के साथ काम करते हैं और कामयाबी भी ज़रूर हासिल कर लेते हैं।

कराबाख़ को वर्तमान स्वायत्त स्थिति रूस के राष्ट्रपति जोज़फ़ स्टालिन ने 1923 में दी थी और यह नहीं लगता कि पुतीन इस निर्णय से पीछे हटने वाले हैं।

अब तक इस लड़ाई को रोकने के लिए तीन बार किया जाने वाला संघर्ष विराम टूट चुका है और आने वाले हफ़्तों में टकराव का दायरा बढ़ने की संभावना है जिसके नतीजे में क्षेत्रीय ताक़तों का इस विवाद में हस्तक्षेप बढ़ना तय है। हमारा इशारा ईरान और रूस की ओर है।

स्रोतः रायुल यौम


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