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आयत क्या कहती हैं? ईश्वर के अतिरिक्त जिन वस्तुओं की उपासना की जाती है वे न तो लाभ पहुंचा सकती हैं और न ही हानि।

आयत क्या कहती हैं? ईश्वर के अतिरिक्त जिन वस्तुओं की उपासना की जाती है वे न तो लाभ पहुंचा सकती हैं और न ही हानि।

अनेकेश्वरवाद की ऐसी आस्था नहीं है और उसमें अंधविश्वास और पथभ्रष्टता की अनेक बातें होती हैं और ऐसी वस्तुओं की पूजा की जाती है जो न तो मनुष्य को लाभ पहुंचा सकती हैं और न ही हानि।

सूरए यूनुस की आयत क्रमांक 105 व 106 का अनुवादः

और ऐसे धर्म की ओर उन्मुख हो कि जो हर प्रकार के अनेकेश्वरवाद से रिक्त हो और अनेकेश्वरवादियों में से न हो जाना। और ईश्वर के अतिरिक्त ऐसी वस्तुओं को न पुकारो जो न तो तुम्हें कोई लाभ पहुंचा सकती हैं और न ही हानि, और यदि तुम ने ऐसा किया तो तुम अत्याचारियों में से हो जाओगे।

 

संक्षिप्त टिप्पणी:

ईश्वर ने पैग़म्बर को आदेश दिया है, उसके अंतर्गत वे अपनी बात जारी रखते हुए कहते हैं कि पूर्णतः स्पष्ट, सीधे और हर प्रकार की पथभ्रष्टता से रिक्त धर्म की ओर उन्मुख होना और उस पर कटिबद्ध रहना चाहिए।

 

इन आयतों से मिलने वाले पाठ:

  1. वह धर्म स्वीकार्य है जो मनुष्य की पारदर्शी और स्वस्थ प्रवृत्ति के अनुकूल और उससे समन्वित हो।
  2. बुद्धिमान व्यक्ति या तो लाभ की प्राप्ति के लिए काम करता है या फिर हानि को दूर करने के लिए, और ईश्वर के अतिरिक्त जिन वस्तुओं की उपासना की जाती है वे न तो लाभ पहुंचा सकती हैं और न ही हानि, इस आधार पर अनेकेश्वरवाद एक प्रकार की मूर्खता है।


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