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अरब नैटो से मिस्र के निकल जाने के क्या निहितार्थ हैं? क्या अंकारा की तरह क़ाहेरा ने भी अमरीका को टाटा कहने का मन बना लिया है? क्

अरब नैटो से मिस्र के निकल जाने के क्या निहितार्थ हैं? क्या अंकारा की तरह क़ाहेरा ने भी अमरीका को टाटा कहने का मन बना लिया है? क्

मिस्री राष्ट्रपति अब्दुल फ़त्ताह अस्सीसी ने अमरीका को दो बड़े झटके दिए हैं। पहला झटका उन्होंने मध्यपूर्व के देशों के आर्थिक व सुरक्षा गठबंधन से निकलने का फ़ैसला लेकर दिया है जिसे अरब नैटो भी कहा जाता है और जिसका गठन अमरीका ने ईरान के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए किया था।

दूसरा झटका उन्होंने अमरीका से एफ़-16 और एफ़-35 युद्धक विमानों के बजाए रूस से एसयू-35 युद्धक विमान ख़रीदने का फ़ैसला करके दिया है।

रोयटर्ज़ ने चार महत्वपूर्ण सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट दी कि मस्री सरकार ने अमरीका को सूचना दे दी है और सऊदी अरब की राजधानी रियाज़ में अरब नैटो की रविवार की बैठक में अपना प्रतिनिधिमंडल भेजने से इंकार कर दिया है।

रोयटर्ज़ ने इस फ़ैसले का जो कारण बताया है वह संतोषजनक नहीं है कि मिस्र की सरकार को यह लगता है कि राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प अगला राष्ट्रपति चुनाव नहीं जीत पाएंगे और चूंकि अरब नैटो का पूरा आइडिया उन्हीं का है इसलिए मिस्र नहीं चाहता के इसके लिए अपना समय नष्ट करे। असली कारण यह लग रहा है कि मिस्र नही चाहता कि ईरान से तनाव बढ़े और अमरीका तथा सऊदी अरब के उकसावे में क्षेत्र में सांप्रदायिक टकराव और युद्ध को हवा मिले। क़ाहेरा में तीन सप्ताह पहले जार्डन नरेश अब्दुल्लाह द्वितीय, इराक़ी प्रधानमंत्री आदिल अब्दुल महदी और मिस्री राष्ट्रपति अब्दुल फ़त्ताह अस्सीसी की शिखर बैठक हुई। इस बैठक का आयोजन भी इसी विचार की पुष्टि करता है। इसलिए कि इराक़ को अब ईरान के क़रीब जाने का दरवाज़ा समझा जाता है।

अरब सूत्रों ने हमें बताया कि जार्डन नरेश कई कारणों से अरब नैटो का हिस्सा बनने के लिए उत्साहित नहीं है। पहला कारण है कि सऊदी अरब इस एलायंस के भीतर अपना प्रभुत्व और वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश कर रहा है, दूसरा कारण यह है कि जार्डन को दी जाने आर्थिक सहायता में रुकावट डाल दी गई। सऊदी अरब डील आफ़ सेंचुरी का समर्थन कर रहा है और यह डील फ़िलिस्तीन के साथ ही जार्डन के भी भारी नुक़सान में है क्योंकि इस डील के चलते जार्डन को भी अपनी भूमि का एक भाग गवांना पड़ सकता है साथ ही नए दस लाख फ़िलिस्तीनी शरणार्थियों को जगह देनी पड़ेगी और शायद फ़िलिस्तीनियों को जार्डन में ही बसा देने के लिए भी दबाव डाला जाए। यही नहीं तेल अबीब से संपर्क के लिए अब तब जार्डन को संपर्क पुल के रूप में प्रयोग किए जाने की प्रक्रिया छोड़कर फ़ार्स खाड़ी के अरब देश प्रत्यक्ष रूप से तेल अबीब से संबंध बढ़ा रहे हैं।

कुछ दिन पहले सऊदी नरेश सलमान बिन अब्दुल अज़ीज़ ने जार्डन और फ़िलिस्तीन के लोगों से अपनी मुलाक़ातों में कहा कि उनका देश बैतुल मुक़द्दस के इस्लामी व ईसाई धार्मिक स्थलों पर जार्डन के प्रभुत्व का समर्थन करता है इस तरह उन्होंने उन रिपोर्टों का खंडन करने की कोशिश की जिनमें कहा जा रहा है कि जार्डन की जगह सऊदी अरब बैतुल मुक़द्दस के इस्लामी व ईसाई धार्मिक स्थलों पर अपना प्रभुत्व वाहता है। सऊदी नरेशने यह बयान संयोगवश नहीं दिया है बल्कि उन्होंने जार्डन नरेश का आक्रोश शांति करने की कोशिश की है।

हमें नहीं लगता कि सऊदी नरेश के बयान से जार्डन नरेश की चिंता और आक्रोश में कोई कमी होगी क्योंकि रियाज़ में इस समय असली शासक सऊदी क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान हैं जो डील आफ़ सेंचुरी के मुख्य समर्थकों में हैं क्योंकि वह जेयर्ड कुशनर के क़रीबी साथी हैं जो डील आफ़ सेंचुरी के सूत्रधारों में गिने जाते हैं।

जार्डन, तुर्की इसी तरह जार्डन इराक़ निकटता अब उच्च स्तर पर बढ़ रही है जिससे यह संकेत मिलता है कि जार्डन नरेश को फ़ार्स खाड़ी के अरब देशों के साथ एलायंस का अपना पुराना विकल्प अब भरोसेमंद नहीं लग रहा है। यह अरब देश जार्डन की आर्थिक सहायता करते हैं तो साथ ही उसका अपमान भी ज़रूर कर देते हैं। जार्डन नरेश अब वह नीति अपनाना चाहते हैं जो देश की आम जनता और भावना के क़रीब हो फिर चाहे वह ईरान से क़रीब होने का मामला है या सीरिया से संबंधों को बढ़ावा देने की बात हो। हमें आश्चर्य नहीं होगा अगर जार्डन अचानक यह घोषणा कर दे कि वह अपने इलाक़े कर्क में शीया धार्मिक स्थलों को तीर्थ यात्रियों के लिए खोलने जा रहा है।

अब हम अब्दुल फ़त्ताह अस्सीसी के निर्णय की ओर लौटते हैं। उनको फ़ार्स खाड़ी के अरब देशों से लगभग 50 अरब डालर की रक़म मिल चुकी है अब वह इन अरब देशों ही नहीं अरब अमरीका के भी दबाव से हटकर आज़ाद नीति अपना रहे हैं। मिस्र के कुछ विश्वस्त सूत्रों ने हमें बताया कि राष्ट्रपति अस्सीसी यह नहीं चाहते कि अलजीरिया और सूडान में जिस तरह सड़कों पर निकल पड़ी उसी तरह का माहौल मिस्र में भी पैदा हो।

हथियारों की ज़रूरत पूरी करने के लिए मिस्र के रूस की ओर वापस लौटने की पूरी संभावना है और इसके दो कारण है। पहला कारण यह है कि रूसी रक्षा उपकरण अब अधिक आधुनिक हो गए हैं और इससे बड़ी बात यह है कि इन हथियारों के सौदे में रूस की ओर से वह कठोर शर्तें नहीं लगाई जातीं जो आम तौर पर अमरीका अपने हथियार सौदों में लगाता है। दूसरी बात यह है कि इनकी क़ीमत कम होती है और अदाएगी कि प्रक्रिया को काफ़ी आसान रखा जाता है।

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प अपनी आंख से देख रहे हैं कि उनके घटक इस समय रूसी हथियार ख़रीदने के लिए मास्को की ओर उन्मुख हो चुके हैं। विशेष रूप से एस-400 के तो कई ख़रीदार पैदा हो गए हैं। इसी आक्रोश में ट्रम्प ने तुर्की और मिस्र पर प्रतिबंध  लगाने की धमकी भी दी। मगर सवाल यह है कि ट्रम्प के बस में अब है ही क्या। क्या वह मिस्र को दी जाने वाली आर्थिक सहायता रोकेंगे? यह सहायता डेढ़ अरब डालर सालाना की है और इस रक़म का बड़ा भाग ख़ुद अमरीका की ही हथियार बनाने वाली कंपनियों को चला जाता है। अगर अमरीका यह सहायता रोकता है कि रूस किसी न किसी तरह इसकी भरपाई का रास्ता खोज लेगा।

रूसी विमान एसयू-35 की विशेषता यह है कि वह बहुत आधुनिक युद्धिक विमान है। इस पर हवा से हवा में और हवा से ज़मीन पर मार करने वाले मिसाइल फ़िट हो जाते हैं, इसकी रफ़तार आवाज़ की रफ़तार से दुगना अर्थात 2400 किलोमीटर प्रतिघंटा तक पहुंच जाती है। यह विमान बीच में रिफ़्युलिंग किए बग़ैर 3600 किलोमीटर तक उड़ सकता है। मिस्र को इसकी बहुत ज़रूरत है क्योंकि एक तरफ़ उसे इस्राईल से ख़तरा है और दूसरी ओर अन्नहज़ा बांध के मामले में इथोपिया से उसका तनाव है।

अगर अरब नैटो से मिस्र के बाहर निकलने की रिपोर्ट सही है तो इसका मतलब है कि मिस्र ने अमरीका और अरब देशों को एक साथ ही टाटा कर दिया है। अरब नैटो जिसका सार सांप्रदायिक उन्माद फैलाना और युद्ध की आग भड़काकर इस्राईल को फ़ायदा पहुंचाना है जन्म से पहले ही मौत की हिचकियां लेने लगा है। हमें लगता है कि इस एलायंस में शायद सऊदी अरब और बहरैन के अलावा कोई और देश नहीं रुकेगा, हो सकता है कि इमारात कुछ समय इसमें बना रहे।

 

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार


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