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अरफ़ा दिवस पर विशेष कार्यक्रम

अरफ़ा दिवस पर विशेष कार्यक्रम

आज ज़िलहिज्जा महीने की नवीं तारीख़ है।

आज के दिन को रोज़े अरफ़ा कहा जाता है। यानी आज स्वयं और अपने दयालु व कृपालु ईश्वर को पहचानने का दिन है। हम इस बारे में सोचें कि हम सिर से  पैर तक मोहताज हैं और हम इस बारे में चिंतन- मनन करें कि महान ईश्वर असीम दयालु व कृपालु है। हमें सोचना और यह जानना चाहिये कि हम बंदे के सिवा कुछ भी नहीं हैं। जब हम यह समझ जायेंगे कि बंदे के अलावा हम कुछ भी नहीं हैं तो समस्त शहीदों के सरदार इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की आध्यात्मिक दुआ से लाभ उठा सकते हैं और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम द्वारा पढ़ी गयी दुआ को पढ़कर अपने पालनहार और मूल स्वामी की ओर ज़रूरत का हाथ फैला सकते हैं और उससे इस बात की प्रार्थना कर सकते हैं कि हमें अपनी अंतरआत्मा को कुर्बान करने का सामर्थ्य प्रदान कर।

आज ज़िलहिज्जा महीने की नौ तारीख़ है। आज के दिन ईश्वर के पावन घर का दर्शन करने वाले काबे की परिक्रमा करने के बाद अरफ़ात नामक विशालकाय मैदान की ओर रवाना होते हैं। अरफात बहुत बड़ा व विशाल मरुस्थल है। यह मरुस्थल जबलुर्रहमत नामक पहाड़ के दामन में और पवित्र नगर मक्का से 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। अरफ़ा दिवस पर हाजी महान व सर्वसमर्थ ईश्वर के पावन घर का दर्शन करने के बाद सूखे और तपते हुए मरुस्थल में ठहरते हैं और अपने पालनहार से प्रार्थना करते हैं और महान ईश्वर की नेअतमों को देखकर उसके बारे में चिंतन- मनन करते हैं और महान व सर्वसमर्थ ईश्वर की पहचान की राह में क़दम उठाते हैं।

महान ईश्वर के पवित्र घर का दर्शन करने वालों के अलावा बहुत से मुसलमान अरफ़ात के मैदान में उपस्थित नहीं हो सकते। इसलिए वे इस ज़मीन पर जहां भी हैं इस दिन अरफ़ा दुआ को पढ़ते हैं और अपने पालनहार से प्रार्थना करते हैं किन्तु अरफ़ा दिवस दुआ व प्रार्थना से बढ़कर है। अरफ़ा स्वयं और महान ईश्वर को पहचानने का दिन है। आज के दिन हमें यह सोचना चाहिये कि हमारा पूरा अस्तित्व मोहताज है और हमें उस महान व कृपालु ईश्वर के बारे में सोचना चाहिये जिसकी दया व असीम कृपा से ही हमारा अस्तित्व है। इस चिंतन- मनन के परिणाम में इंसान पैग़म्बरे इस्लाम के प्राणप्रिय नाती इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की आध्यात्मिक दुआ से लाभ उठा सकता है।

जो इंसान स्वयं को पहचान जाये वह निश्चित रूप से अपने पालनहार को पहचान जायेगा और इस बात का पूर्ण विश्वास हो जायेगा कि इस ब्रह्मांड का रचयिता है और इस ब्रह्मांड का रचयिता महान, सर्वसमर्थ और तत्वदर्शी ईश्वर है और इंसान उसे पहचाने के लिए अधिक प्रयास करता है और उसे पहचानने के लिए जो क़दम उठाता है महान ईश्वर की नेअमतों से अधिक अवगत व परिचित होता है और इन सबको देखकर उसके विश्वास में वृद्धि होती है। जो ईश्वर को पहचान गया वह उसकी महानता को समझ जायेगा। वह महान ईश्वर के समक्ष नतमस्तक हो जायेगा। जो इंसान यह समझ जायेगा कि वह जो कुछ भी है महान ईश्वर की वजह से है और जो कुछ भी उसके पास है वह महान ईश्वर की अमानत है। इसी कारण जब कोई चीज़ उसके हाथ से चली जाती है तो वह उस व्यक्ति की भांति अमल करता है जिसने अमानत को उसके मालिक के हवाले कर दिया है और वह अपनी भावनाओं व आभासों को स्वयं पर हावी नहीं होने देता। साथ ही अगर उसे धन -सम्पत्ति मिल जाती है तो उसे महान ईश्वर की समझता है अतः वह बेकार का घमंड नहीं करता है।

वास्तव में जो इंसान महान ईश्वर को सही तरह से पहचान जाता है तो वह अपने बल्कि समस्त चीज़ों के अस्तित्व को समझ जाता है और स्वयं को दूसरे से बेहतर व श्रेष्ठ समझने का विचार कभी भी उसके मन में नहीं आता है और दूसरों को उतना ही महत्वपूर्ण समझता है जितना महान ईश्वर ने उसे महत्व दिया है।

अरफ़ा का विशाल मैदान वह मरुस्थल है जिसे अरफ़ा की वह प्रसिद्ध दुआ आज भी याद है जिसे लगभग 1400 साल पहले इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने पढ़ा है। अरफा दुआ का आधार प्रेम और परिज्ञान है। वास्तव में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम इस दुआ के आरंभ में महान ईश्वर का गुणगान करते हैं। वास्तव में हर दुआ के आरंभ में महान ईश्वर का गुणगान एकेश्वरवाद की स्वीकारोक्ति का सूचक है और यह स्वीकारोक्ति महान ईश्वर की असीम दया व कृपा प्राप्त करने की कुंजी है। पैग़म्बरे इस्लाम के हवाले से आया है कि मोमिन इंसान ब्रह्मांड के रचयिता का गुणगान करके अपने लिए अत्यधिक नेतमतों को प्राप्त करने की भूमि प्रशस्त करता है"

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम भी अपनी दुआ को इस प्रकार आरंभ करते हैं। समस्त प्रशंसा ईश्वर से विशेष है, उसका हुक्म सब पर लागू है, और वह कुछ किसी को प्रदान करना चाहे तो कोई भी चीज़ उसके मार्ग में रुकावट नहीं बन सकती, किसी की भी रचना उस जैसी नहीं हो सकती और वह इतना प्रदान करने वाला है कि कोई भी उसकी तरह दानी नहीं हो सकता। ईश्वर सुनने और देखने वाला है। ईश्वर कृपालु है। महान ईश्वर की इन विशेषताओं को बयान करने के बाद इमाम हुसैन अलैहिस्लाम कहते हैं कि बौद्धिक व धार्मिक दृष्टि से समस्त इंसानों पर उसका अनुपालन अनिवार्य है और लोगों को चाहिये कि उसके आदेशों को व्यवहारिक बनाने की दिशा में प्रयास करें।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की जो दुआये अरफ़ा है वह उन अनगिनत नेअमतों को याद दिलाती है जिसे महान ईश्वर ने अपने बंदों को प्रदान किया है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम इस दुआ में उन नेअमतों को बयान करते हैं जिसे महान ईश्वर ने इंसानों को प्रदान किया है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने महान ईश्वर द्वारा प्रदान की गयी नेअमतों का बहुत ही सुन्दर ढंग से वर्णन किया है और उसमें जो चीज़ ध्यान योग्य है वह इमाम द्वारा इंसान के शरीर के अंगों और उसकी विशेषताओं का बयान किया जाना है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम फरमाते हैं" मेरे नेत्रों के प्रकाश, मेरे माथे के चिन्ह, मेरे कान के पर्दे, मेरा मुंह, मेरे दांत उगने के स्थान, भोजन के स्वाद चखने के स्थान, मेरे पीने के स्थान, मेरे सिर, मेरी गर्दन से जुड़ी नली, जो कुछ मेरे सीने और ठठरी में है, मेरे दिल की धमनियां, मेरा यकृत, मेरी हड्डियों के जोड़, मेरी उंगलियों की पोर, मेरा मांस, मेरा ख़ून, मेरे सिर के बाल, मेरे चमड़े, मेरा स्नायुतंत्र, मेरी नाड़ियां व धमनियां और मेरे शरीर के समस्त अंग और जो कुछ मां का दूध पीने के समय से बना है। हे मेरे मौला व मालिक! क्या मेरा मांस, मेरी आंख, मेरी ज़बान, मेरे हाथ, या मेरे पैर क्या ये सबके सब तेरी नेअमत नहीं हैं? जो मेरे पास हैं और इन सबसे मैंने तेरी अवज्ञा की! हे मेरे मालिक! तो मुझे दंडित करने का तुझे अधिकार है।"

आंख, कान, नाक, दांत, सांस, मुंह, दिल, हड्डी आदि का वर्णन सब इस बात के सूचक हैं कि ये चीज़ें महान ईश्वर की नेअमत हैं और इनका आभार व्यक्त करना असंभव है।

हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम दुआये अरफ़ा के एक भाग में उस इंसान का परिचय कराते हैं जो महान ईश्वर से प्रार्थना कर रहा है ताकि उसकी कृपा व दया अधिक हो जाये। हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम महान ईश्वर को संबोधित करते हुए फरमाते हैं” हे वह जिसने बड़ाई और महानता को अपनी विशेषता करार दिया है और उसके दोस्त भी उसकी छत्रछाया में प्रतिष्ठित हैं! उसके बाद इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम इस बात की ओर संकेत करते हैं कि वह महान ईश्वर के मुक़ाबले में कितने छोटे हैं। वह फ़रमाते हैं” मैं वह हूं जिसने तेरी नेअमतों की रक्षा नहीं की, मैंने ग़लती की, मैंने निश्चेतना बरती, मैंने अज्ञानता से काम लिया, मैंने तेरी अवज्ञा का इरादा किया, मैं तुझे भूल गया था मैंने अपने ऊपर भरोसा किया मैंने जानबूझ कर पाप किया मैंने वादा किया था कि वादा खिलाफ़ी नहीं करूंगा किन्तु मैंने अपने वादे की उपेक्षा की और तेरी जो नेअमतें हमारे पास थीं मैंने उनसे लाभ नहीं उठाया।

इमाम इसी प्रकार अपनी दुआ में महान ईश्वर की अवज्ञा की ओर संकेत करते हुए कहते हैं मेरे पालनहार तूने मुझे अच्छाई का आदेश दिया और बुराई से रोका था परंतु मैंने तेरी अवज्ञा की अब मेरे पास कोई बहाना नहीं है कि मैं उस चीज़ के लिए क्षमा मांगू जो मेरे हाथ से जा चुकी है। इस तरह पाप की स्वीकारोक्ति महान ईश्वर के प्रति हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के गूढ़ ज्ञान की सूचक है। हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने दूसरे समस्त मासूमों की भांति ईश्वर की महानता को अच्छी तरह समझा है।

स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के इस बयान के बारे में कहते हैं” जी हां वे ईश्वर की महानता को भलीभांति जानते हैं, वे जानते हैं कि अगर जीवन भर ईश्वर की उपासना की जाये, उसका गुणगान किया जाये तब भी उसकी नेअमतों का हक़ अदा नहीं किया जा सकता और उसकी प्रशंसा तो अलग बात है यानी उसकी प्रशंसा का जो हक है उसे अदा ही नहीं किया जा सकता। मासूमों ने वास्तव में अपनी कमी और महान ईश्वर की परिपूर्णता को देखा और समझ लिया।“

यही वजह है कि हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपनी दुआ के एक भाग में कहते हैं हे सबसे अधिक सुनने वाले, हे सबसे अधिक देखने वाले, हे सबसे जल्द हिसाब लेने वाले, हे सबसे अधिक कृपालु व दयालु, मोहम्मद और संतान पर दुरूद व सलाम भेज। मैं तुझसे प्रार्थना करता हूं कि अगर तूने मेरी हाजत मुझे दे दी तो जो तूने नहीं दी है उससे मुझे कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा और अगर तू मेरी हाजत मुझे नहीं देता है तो जो तूने पहले से दे रखा है उससे मुझे कोई फायदा नहीं होगा और वह नरक की आग से आज़ादी है।

समस्त ईश्वरीय धर्मों का उद्देश्य इंसान की मुक्ति व कल्याण है। इसी कारण हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपनी दुआ का आधार भी इसी विषय को बनाया है। रोचक बात यह है कि अरफ़ा दिवस ईदे कुरबान से एक दिन पहले है। यानी महान ईश्वर का सामिप्य प्राप्त करने और पापों से दूरी के समस्त मार्गों को प्रशस्त करना चाहिये। आज अरफ़ा दिवस है। अपने बंदों पर महान ईश्वर की कृपा की बरसात का दिन है। दुआये अरफ़ा के एक भाग में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम इस प्रकार कहते हैं” हे पालनहार मैं तुझसे प्रेम करता हूं और मैं गवाही देता हूं कि तू मेरा पालनहार है हे जारी सोते प्रेम व दया में तेरा कोई उदाहरण नहीं है। मेरे पालनहार! जिस दिन को तूने स्वयं महानता प्रदान की है और उस दिन की कसम जब समस्त हाथ तेरे अर्श की ओर फैले होंगे और तेरी महानता की सौगंध मुझे अपनी अता व नेअमत से लाभांवित होने वालों में करार दे।


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