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अमरीका परमाणु समझौते में लौटना चाहता है तो शर्त यह है कि प्रतिबंध हटाए, हम किसी के दबाव में नहीं आएंगे, अपनी स्वाधीनता की रक्षा करेंगेः सुप्रीम लीडर के सलाहकार का महत्वपूर्ण इंटरव्यू

अमरीका परमाणु समझौते में लौटना चाहता है तो शर्त यह है कि प्रतिबंध हटाए, हम किसी के दबाव में नहीं आएंगे, अपनी स्वाधीनता की रक्षा करेंगेः सुप्रीम लीडर के सलाहकार का महत्वपूर्ण इंटरव्यू

​​​​​​​ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह ख़ामेनई ने 8 जनवरी 2021 के अपने भाषण में परमाणु समझौते के बारे में ईरान की नीति और अमरीका की ज़िम्मेदारियों के बारे में बात करते हुए कहा कि हमारा कोई आग्रह नहीं और हमें कोई जल्दबाज़ी नहीं है कि अमरीका परमाणु समझौते में लौटे।

यह हमारा मसला ही नहीं है कि अमरीका परमाणु समझौते में लौटे या न लौटे। हमारी तर्कसंगत मांग है कि प्रतिबंध हटाए जाएं। यह ईरानी राष्ट्र का अधिकार है जिसे हड़पा गया है। सुप्रीम लीडर ने ईरान के आख़िरी फ़ैसले के रूप में यह बात कही।

सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह ख़ामेनई की वेबसाइट KHAMENEI.IR ने अंतिम फ़ैसला के शीर्षक के तहत सुप्रीम लीडर के अंतर्राष्ट्रीय मामलों के सलाहकर डाक्टर अली अकबर विलायती से बात की।

पश्चिमी देशों की क्यों यह ज़िम्मेदारी है कि ईरानी राष्ट्र पर लगे प्रतिबंध हटाएं? प्रतिबंध ख़त्म किए जाने को परमाणु डील में अमरीका की वापसी पर प्राथमिकता देने की क्या वजह है?

अमरीकियों ने हमें यह प्रस्ताव दिया कि अगर आप अपनी सिविल परमाणु गतिविधियों को सीमित करेंगे तो हम प्रतिबंध हटा लेंगे। हमने निर्धारित समयसीमा के भीतर और परमाणु समझौते में अपनी प्रतिबद्धता के तहत अपना काम पूरा कर दिया है। लेकिन अमरीकियों ने कुछ समय के लिए कुछ प्रतिबंध हटाए और प्रतिबंधों के निलंबन को थोड़े थोड़े समय के लिए बढ़ा देते थे। यानी वह शुरू से इस कोशिश में थे कि प्रतिबंधों का निलंबन अस्थायी रहे।

अमरीका में नई सरकार आई तो उसने परमाणु समझौते का बिल्कुल पालन नहीं किया।

अन्य तीन पश्चिमी देशों यानी फ़्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन ने जो पूरे यूरोपीय संघ का प्रतिनिधित्व कर रहे थे अमरीका की राह पर चलते हुए हमारे ख़िलाफ़ कड़ाई शुरू कर दी। एक तरह से उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से प्रतिबंध लगा दिए। अलबत्ता रूस और चीन ने जहां तक संभव था मदद की और अपनी प्रतिबद्धताओं का पालन किया। जब प्रतिबद्धताओं के बारे में अमरीका का यह रिकार्ड है तो हमें संदेह करने का पूरा अधिकार है। अगर अमरीकी पिछली प्रतिबद्धताएं पूरी किए बग़ैर परमाणु समझौते में लौटना चाहते हैं तो हमें स्वीकार नहीं होगा। इसलिए जितनी जल्दी हो इन प्रतिबंधों को हटाया जाना चाहिए। हमें प्रतिबंधों से जो नुक़सान पहुंचा है उसका हरजाना भी अदा किया जाना चाहिए।

अमरीका परमाणु समझौते में लौटता है तो इसका कुछ फ़ायदा भी होगा?

हमारा न आग्रह है और न हमें कोई जल्दबाज़ी है कि अमरीका वापस आए। अगर अमरीका समझौते में लौटना चाहता है तो इसकी कुछ शर्तें हैं। सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह है कि प्रतिबंध हटाए ताकि यह साबित हो कि नई सरकार परमाणु समझौते का पालन करना चाहती है। पहले यह तय हुआ था कि तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा कमिटमेंट करें और ईरान के सुप्रीम लीडर की शर्त यह थी कि अमरीकी राष्ट्रपति लिखित वादा करें ताकि बाद में उससे मुकर न सकें। मगर अमरीकियों ने कहा कि हम ज़बानी वादा कर रहे हैं और यही काफ़ी है। सुप्रीम लीडर इस पर तैयार नहीं थे। मगर खेद की बात है कि मौखिक वादे तक ही मामला सीमित रह गया और फिर अमरीका ने इस वादे पर अमल नहीं किया। ट्रिगर मेकैनिज़्म पर शुरू से ही सुप्रीम लीडर को आपत्ति थी। यह प्रावधान उनकी मर्ज़ी के बग़ैर शामिल किया गया। अब अगर दोबारा वार्ता होती है को इस तर्कहीन प्रावधान को हटाया जाना चाहिए।

आप सुप्रीम लीडर के सलाहकार की हैसियत से परमाणु डील के बारे में ईरान की रणनीति को किस नज़र से देखते हैं? इस रास्ते पर अभी कितना आगे चलना चाहिए?

इस ज़माने में कोई भी देश ख़ुद को नागरिक परमाणु ऊर्जा से वंचित नहीं कर सकता। देर सवेर हर देश को इस ऊर्जा की ज़रूरत पड़ने वाली है। अगर इस मैदान में ईरान आत्म निर्भर नहीं होता है तो उस पर परमाणु ऊर्जा संपन्न देशों का दबाव रहेगा।

हमने परमाणु समझौते के तहत कुछ कमिटमेंट किए जिसके आधार पर परमाणु क्षेत्र में हमारी गतिविधियां कुछ हद तक सीमित रहेंगी मगर 2025 के बाद यह सीमितताएं ख़त्म हो जाएंगी।

हम स्वाधीन देश हैं और अपनी स्वाधीनता के लिए हमने बड़ी क़ीमत चुकाई है। हम अपने हितों की रक्षा के लिए हर संभव रास्ता अपनाएंगे, न अमरीका के दबाव में आएंगे और न किसी और का दबाव स्वीकार करेंगे। 


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