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अफ़ग़ानिस्तान में अमरीका का डर्टी गेम, काबुल एयरपोर्ट की सुरक्षा के बहाने तुर्की को बनाया बड़ा मोहरा, तीन अहम देशों के ख़िलाफ़ साज़िशों का पर्दा फ़ाश...

अफ़ग़ानिस्तान में अमरीका का डर्टी गेम, काबुल एयरपोर्ट की सुरक्षा के बहाने तुर्की को बनाया बड़ा मोहरा, तीन अहम देशों के ख़िलाफ़ साज़िशों का पर्दा फ़ाश...

अफ़ग़ानिस्तान से अमरीका के तेज़ी से निकलने और काबुल एयरपोर्ट की रक्षा के लिए वाशिंग्टन की तुर्की से बातचीत के बाद टीकाकार इस परिणाम पर पहुंचे हैं कि अमरीकी राष्ट्रपति, सीरियाई और लीबियाई आतंकवादियों को अफ़ग़ानिस्तान में झोंकना चाहते हैं।

काबुल एयरपोर्ट की रक्षा के लिए काबुल में तुर्की की सैन्य छावनी के प्रयोग के लिए वाशिंग्टन और अंकारा के बीच हतोने वाली बातचीत से यह बात सामने आती है कि अमरीकी राष्टपति जो बाइडन ने इस काम के लिए तुर्की की ओर हाथ क्यों हाथ बढ़ाया है।

अलमयादीन चैनल ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में लिखा कि अफ़ग़ानिस्तान के पड़ोसी दूसरे देशों या उन देशों ने जो इस देश में सत्तासीन शक्ति का लोहा मानते हैं, वह अफ़ग़ानिस्तान की वर्तमान स्थिति और तालेबान के फैलाव के समय बहुत ही सावधानीपूर्वक प्रतिक्रियाएं व्यक्त कर रहे हैं।

अलमयादीन का कहना है कि अफ़ग़ानिस्तान की स्थिति पर नज़र रखने वालों के मन में यही सवाल पैदा हो रहा है कि क्यों अमरीका ने काबुल एयरपोर्ट पर तुर्की से सैनिकों की विशेष छावनी खोलने की अपील और अंकारा ने भी फ़ौरन वाशिंग्टन की अपील का सकारात्मक जवाब दे दिया और इस काम के लिए अपनी तैयारी का एलान तक कर दिया।

तालेबान ने तुर्की की इस कार्यवाही का विरोध किया, विरोध केवल इसलिए नहीं किया कि तालेबान की तुर्की से नहीं पटती बल्कि विरोध का कारण यह था कि अमरीका ने इसकी अपील की और निश्चित रूप से इस कार्यवाही में अमरीका की चाल यक़ीनी तौर पर होगी।

इस लेबनानी चैनल का कहना है कि सही है कि अमरीका ने ग्यारह सितम्बर से पहले ही अफ़ग़ानिस्तान की ज़्यादातर छावनियों को ख़ाली कर दिया लेकिन यह कहा जा सकता है कि अमरीका के अफ़ग़ानिस्तान में बहुत ज़्यादा कूटनयिक हैं और इस लेहाज़ से वाशिंग्टन के सबसे ज़्यादा डिप्लोमेट इस देश में मौजूद है और उनकी सुरक्षा के लिए सुरक्षाकर्मियों की एक बड़ी टीम है।  

सुरक्षाकर्मियों की यह टीमन केवल काबुल में अमरीकी दूतावास की इमारात में है बल्कि कर्मियों की आवाजाही के लिए भी सुरक्षाबलों को लगाया गया है, ऐसा महसूस हो रहा है कि अमरीका, अफ़ग़ानिस्तान में बाहरी देशों के साथ कुछ मुद्दों और साज़िशों पर काम कर रहा है ताकि इस देश की राजनैतिक और कूटनयिक स्थिति पर कड़ी नज़र रख सके।

चैनल लिखता है कि काबुल एयरपोर्ट की सुरक्षा अपने हाथ में लेने और उसकी सीधी रक्षा करना अमरीका के लिए कोई कठिन बात नहीं थी और इस बात के दृष्टिगत कि वह इसकी क्षमता रखता है और अफ़ग़ानिस्तान के निकट जार्जिया, फ़ार्स की खाड़ी और हिन्द महासागर जैसे क्षेत्रों से अपनी छावनियों से फ़ौरन का कार्यवाहियां कर सकता है।

अलमयादीन का कहना है कि रोचक बात यह है कि अमरीका की बीस साल से अफ़गानिस्तान में सैन्य उपस्थिति थी और वह सुरक्षा, ख़ुफ़िया और सारे मामलों पर नज़र रखता था और उसके बाद उसने अफ़ग़ान सैनिकों को ट्रेनिंग दी और इस देश की सेना को आधुनिक हथियारों से लैस किया लेकिन अब मानो वाशिंग्टन उनसे कह रहा है कि आप काबुल एयरपोर्ट की सुरक्षा की ताक़त नहीं रखते इसीलिए हम तुर्की से इस काम में मदद चाहते हैं और तुर्की भी केवल 500 सैनिकों और सैन्य अधिकारियों की मदद से काबुल एयरपोर्ट की रक्षा करेगा जबकि अफ़ग़ानिस्तान के हज़ारों सैनिकों की उनके सामने कोई हैसियत नहीं रहेगी।

लेबनान की इस वेबसाइट का कहना है कि क्या मालूम कि वाशिंग्टन को इस बात की ख़बर है या नहीं या वह यह छिपाने की कोशिश कर रहा है कि तालेबान का पूरे अफ़ग़ानिस्तान पर नियंत्रण हो जाएगा और उस स्थिति में काबुल एयरपोर्ट की रक्षा उसी से होगी जिसे तालेबान धार्मिक और राजनैतिक दृष्टि से स्वीकार करता हो और तुर्क ही वह पक्ष हो सकता जो इस शर्त पर पूरी तरह खरा उतरता होगा।

इस रिपोर्ट में आया है कि सही है कि वाशिंग्टन ने रात के अंधेरे में अफ़ग़ानिस्तान से निकलकर दुनिया और क्षेत्र के देशों को हैरान कर दिया लेकिन यही वाशिंग्टन है जो चीन, रूस और ईरान जैसे तीन पड़ोसी देशों के संबंध में तालेबान के विदेशी रूख़ से हैरान रह गया क्योंकि अमरीका अफ़ग़ानिस्तान से निकलकर इन तीनों देशों को निशाना बनाने के प्रयास में था।

इस लेबनानी चैनल का आगे लिखना है कि वाशिंग्टन, अफ़ग़ानिस्तान से तो निकल गया लेकिन वह देख रहा था कि तालेबान रूस,चीन और ईरान की ओर पेंग बढ़ा रहे हैं और ऐसा लगता भी है कि तालेबान अपनी बातों में सच्चा भी है और वह इन तीनों देशों के साथ अच्छे संबंध चाहता है, इसी चीज़ ने अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडन की चिंता बढ़ा दी जो ईरान और तालेबान के बीच धार्मिक, वैचारिक और सीमावर्ती विवाद को लेकर काफ़ी ख़ुश थे जबकि अमरीका को अपनी इस साज़िश में नाकामी मिलती है तो वह काबुल एयरपोर्ट की सुरक्षा के बहाने तुर्की को मैदान में कुदा देता है लेकिन तालेबान ने भी तुर्की को खुली धमकी देकर अपनी मंशा ज़ाहिर कर दी है, अब समय ही बताता है कि अफ़गानिस्तान में ताक़त का क्या संतुलन होता है और कौन सिकन्दर बनता है। 


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