इस्लाम में औरत का महत्व (2)

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Brief

उसकी निशानियों में से एक यह है कि उसने तुम्हारा जोड़ा तुम ही में से पैदा किया है ताकि तुम्हे उससे ज़िन्दगी का सुकून हासिल हो और फिर तुम्हारे बीच मुहब्बत व रहमत की भावना बताया है।
आयते करीमा में दो अहम बातों की तरफ़ इशारा किया गया है

औरत की हैसियत
و من آیاته ان خلق لکم من انفسکم ازواجا لتسکنوا الیها و جعل بینکم مودہ و رحمه (سوره روم آيت ۲۱
उसकी निशानियों में से एक यह है कि उसने तुम्हारा जोड़ा तुम ही में से पैदा किया है ताकि तुम्हे उससे ज़िन्दगी का सुकून हासिल हो और फिर तुम्हारे बीच मुहब्बत व रहमत की भावना बताया है।
आयते करीमा में दो अहम बातों की तरफ़ इशारा किया गया है
1. औरत इंसानियत का ही एक हिस्सा है और उसे मर्द का जोड़ा बनाया गया है। उसकी हैसियत मर्द से कमतर नही है।
2. औरत के वुजूद का उद्देश्य मर्द की सेवा नही है मर्द की ज़िन्दगी का सुकून है और मर्द व औरत के बीच दोतरफ़ा मुहब्बत और रहमत ज़रुरी है यह एकतरफ़ा मामला नही है।
و لهن مثل الذی عليهن بالمعروف و للرجال عليهن درجه (بقره آيت ۲۲۸)
औरतों के लिये वैसे ही अधिकार है जैसे उनके ज़िम्मे कर्तव्य हैं मर्दों को उनके ऊपर एक और दर्जा हासिल है।
यह दर्जा उस पर शासन का नही है बल्कि ज़िम्मेदारी का है, मर्दों में यह क्षमता रखी गई है कि वह औरतों की ज़िम्मेदारी संभाल सकें और इसी आधार पर उन्हे रोटी - कपड़ा और ख़र्च का ज़िम्मेदार बनाया गया है।
فاستجاب لہم ربہم انی لا اضیع عمل عامل منکم من ذکر و انثی بعضکم من بعض (سورہ آل عمران آیت ۱۹۵)
तो अल्लाह ने उनकी दुआ को क़बूल कर लिया कि हम किसी अमल करने वाले के अमल को बर्बाद नही करना चाहते चाहे वह मर्द हो या औरत, तुम में कुछ कुछ से हैं।
ولا تتمنوا ما فضل اللہ بعضکم علی بعض للرجال نصیب مما اکتسبوا و للنساء نصیب مما اکتسبن (سورہ نساء آیہ ۳۲)
और देखो जो ख़ुदा ने कुछ को कुछ से अधिक दिया है उसकी तमन्ना न करो, मर्दों के लिये उसमें से हिस्सा है जो उन्होने हासिल कर लिया है और इसी तरह से औरतों का हिस्सा है। यहाँ पर भी दोनो को एक तरह की हैसियत दी गई है और हर एक को दूसरे पर वरीयता से रोक दिया गया है।
و قل رب ارحمهما کما ربيانی صغيرا (سوره اسراء آيت ۲۳)
और यह कहो कि परवरदिगार उन दोनो (मां बाप) पर उसी तरह से उन पर रहम कर जिस तरह उन्होने मुझे पाला है।
इस आयते करीमा में माँ बाप दोनो को बराबर की हैसियत दी गई है और दोनो के साथ दयालुता भी आवश्यक बताई गई है और दोनो के हक़ में रहमत की भी ताकीद की गई है।
يا ايها الذين آمنوا لا يحل لکم ان ترثوا النساء کرها و لا تعضلوهن لتذهبوا ببعض ما آتيتموهن الا ان ياتين بفاحشه مبينه و عاشروهن بالمعروف فان کرهتموهن فعسی ان تکرهوا شیءا و يجعل الله فيه خيرا کثيرا (نساء ۱۹)
ईमान वालो, तुम्हारे लिये वैध नही है कि औरत को ज़बरदस्ती वारिस बन जाओ और न यह अधिकार है कि उन्हे अक़्द से रोक दो कि इस तरह जो तुम ने उनको दिया है उसका एक हिस्सा ख़ुद ले लो जब तक वह कोई खुल्लम खुल्ला बदकारी न करें और उनके साथ उचित व्यवहार करो कि अगर उन्हें नापसंद करते हो तो शायद तुम किसी चीज़ को नापसंद करो और ख़ुदा उसके अंदर बहुत अधिक अच्छाई व ख़ैर क़रार दे।
و اذا طلقتم النساء فبلغن اجلهن فامسکوا هن بمعروف او سرحوين بمعروف ولا تمسکوهن ضرارا لتعتقدوا و من يفعل ذالک فقد طلم نفسه (سوره بقره آيت ۱۳۲)
और जब औरतों को तलाक़ दो और उनकी मुद्दते इद्दा क़रीब आ जाएँ तो उन्हे नेकी के साथ रोक लो वर्ना नेकी के साथ आज़ाद कर दो और ख़बरदार नुक़सान पहुचाने के उद्देश्य से मत रोकना कि इस तरह से ज़ुल्म करोगे और जो ऐसा करेगा वह अपने ही ऊपर ज़ुल्म करेगा।
ऊपर बयान होने वाली दोनो आयतों में सम्पूर्ण आज़ादी का ऐलान किया गया है। जहाँ आज़ादी का मक़सद ऑनर और शराफ़त की सुरक्षा है और जान व माल दोनो के ऐतेबार से अधिकार रखने वाला होना है और फिर यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि उन पर ज़ुल्म वास्तव में उन पर ज़ुल्म नही है बल्कि अपने ही ऊपर ज़ुल्म है इस लिये कि इससे केवल उनकी दुनिया ख़राब होती है और इंसान उससे अपनी आख़ेरत खराब कर लेता है जो दुनिया ख़राब कर लेने से कहीं अधिक बदतर बर्बादी है।
الرجال قوامون علی النساء بما فضل اللي علی بعض و بما انفقوا من اموالهم (سوره نساء آيت ۴)
मर्द, औरतों के संरक्षक हैं और इस लिये कि उन्होने अपने माल को ख़र्च किया है।
आयते करीमा से बिलकुल साफ़ स्पष्ट हो जाता है कि इस्लाम का मक़सद मर्द को शासक व स्वामी बना देना और औरत से उसकी आज़ादी छीन लेना नही है बल्कि उसने मर्द को उसकी कुछ विशेषता की वजह से घर का ज़िम्मेदार बनाया है और उसे औरत के जान माल और प्रतिष्ठा का संरक्षक बनाया है। इसके अलावा इस ज़िम्मेदारी को भी मुफ़्त नही किया है बल्कि उसके मुक़ाबले में उसे औरत के तमाम ख़र्चों का ज़िम्मेदार बना दिया है और ज़ाहिर सी बात है कि जब दफ़्तर का आफ़िसर या कारखाने का मालिक केवल तन्ख़वाह देने की वजह से सत्ता के अनगिनत अधिकार हासिल कर लेता है और उसे कोई इंसानियत का अपमान नही बताता है और दुनिया का हर मुल्क इसी पालिसी पर अमल कर लेता है तो मर्द ज़िन्दगी की तमाम ज़िम्मेदारियाँ क़बूल करने के बाद अगर औरत पर पाबंदियाँ लगा दे कि वह उसकी अनुमति के बिना घर बाहर न जाये और घर ही में उसके लिये सुकून के साधन उपलब्ध कर दे ताकि उसे बाहर न जाना पड़े और दूसरे की तरफ़ वासना व हवस भरी निगाह से न देखना पड़े तो कौन सी हैरत की बात है यह तो एक तरह का बिलकुल साफ़ और सादा इंसानी मामला है जो शादी की शक्ल में सामने आता है और मर्द का कमाया हुआ माल औरत का हो जाता है और औरत की ज़िन्दगी की पूंजी मर्द की हो जाती है मर्द औरत की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये घंटों मेहनत करता है और बाहर से पूंजी लाता है और औरत मर्द के संतोष के लिये कोई कष्ट नही करती है बल्कि उसके जीवन की पूंजी उसके वुजूद के साथ है इंसाफ़ किया जाये कि इस क़दर प्राकृतिक पूंजी से इस क़दर मेहनती पूंजी की अदला-बदली क्या औरत के हक़ में ज़ुल्म और अनन्याय कहा जा सकता है जबकि मर्द की संतोष में भी औरत बराबर की शरीक और हिस्सेदार बनती है और यह भावना एक तरफ़ा नही होता है और औरत के माल ख़र्च करने में मर्द को कोई हिस्सा नही मिलता है। मर्द पर यह ज़िम्मेदारी उसकी मर्दाना विशेषता और उसकी प्राकृतिक क्षमता की आधार पर रखी गई है वर्ना या अदला बदली मर्दों के हक़ में ज़ुल्म हो जाती और उन्हे यह शिकायत होती कि औरत ने हमें क्या सुकून दिया है और उसके मुक़ाबले में हम पर ज़िम्मेदारियों का किस क़दर बोझ लाद दिया गया है यह ख़ुद इस बात की दलील है कि यह जिन्स और माल का सौदा नही है बल्कि क्षमताओं के आधार पर काम का बटवारा है। औरत जिस क़दर सेवा मर्द के हक़ में कर सकती है उसका ज़िम्मेदार औरत को बना दिया गया है और मर्द जिस क़दर औरत की सेवा कर सकता है उसका उसे ज़िम्मेदार बना दिया गया है और यह कोई सत्ता व निर्दयता या तानाशाही नही है कि इस्लाम पर अनन्याय का आरोप लगा दिया जाएँ और उसे औरत के हक़ का बर्बाद करने वाला बता दिया जाये।
यह ज़रुर है कि दुनिया में ऐसे मर्द बहरहाल पाये जाते हैं जो स्वभाविक तौर पर ज़ालिम, बेरहम और जल्लाद हैं और उन्हे अगर जल्लादी के लिये कोई अवसर नही मिलता है तो उसकी संतोष का सामान घर के अंदर उपलब्ध करते हैं और अपने ज़ुल्म का निशाना औरत को बनाते हैं कि वह औरत होने के आधार पर मुक़ाबला करने के क़ाबिल नही है और उस पर ज़ुल्म करने में उन ख़तरों का अंदेशा नही है जो किसी दूसरे मर्द पर ज़ुल्म करने में पैदा होते हैं और उसके बाद अपने ज़ुल्म की वैधता क़ुरआने मजीद के इस ऐलान में तलाश करते हैं और उनका ख़्याल यह है कि क़व्वामियत निगरानी और ज़िम्मेदारी नही है बल्कि शासन और जल्लादियत है। हालाँकि क़ुरआने मजीद ने साफ़ साफ़ दो कारणों की तरफ़ इशारा कर दिया है जिसमें से एक मर्द की व्यक्तिगत विशेषता और भिन्न व विशेष हातल है और उसकी तरफ़ से औरत के ख़र्च की ज़िम्मेदारी है और खुली हुई बात है कि दोनो कारणों में न किसी तरह की हुकूमत पाई जाती है और न जल्लादियत बल्कि शायद बात उसके विपरीत नज़र आये कि मर्द में प्राकृतिक अंतर था तो उसे उस अंतर से फ़ायदा उठाने के बाद एक ज़िम्मेदारी का केंद्र बना दिया गया और इस तरह उसने चार पैसे हासिल किये तो उन्हे अकेले खाने के बजाए उसमें औरत का हिस्सा भी है और अब और औरत वह मालिक है जो घर के अंदर चैन से बैठी रहे और मर्द वह सेवक है जो सुबह से शाम तक परिवार की रोटी की तलाश में मेहनत करता रहे। यह वास्तव औरत की औरत होने की क़ीमत है जिसके मुक़ाबले में किसी दौलत, शोहरत, मेहनत और हैसियत की कोई क़दर व क़ीमत नही है।


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