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स्वामी लक्ष्मी शंकाराचार्यः

इस्लाम आतंक नहीं आदर्श है

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भारत का विश्‍वगुरू बनना अब कितना आसान ? एक ऐसी सच्‍चाई जिसे जानता हर कोई है लेकिन मानने के लिये वही तैयार होता है जिसका ज़मीर जिन्‍दा है, इस्‍लाम मारकाट आतंकवाद की शिक्षा देता है इस बात का प्रचार होने से अच्‍छे भले दिमाग में गलतफहमियां जड़ पकड़ चुकी हैं, जिसने हिन्‍दू मुस्लिम एकता को कमजोर ही किया है, स्‍वामी लक्ष्मीशंकराचार्य जी ने उन सभी गलतफहमियों के मूल पर प्रहार करके हिन्‍दू मुस्लिम एकता को मजबूत किया है, जिस दिन दोनों समुदायों के बीच से गलत फहमियों और नफरतों का सफाया सचमुच हो जायेगा भारतीय जाति उसी दिन विश्‍व नायक पद पर आसन हो जायेगी,

 जब मुझे सत्य का ज्ञान हुआ 

कई साल पहले दैनिक जागरण में श्री बलराज बोधक का लेख ' दंगे क्यों होते हैं?' पढ़ा, इस लेख में हिन्दू-मुस्लिम दंगा होने का कारण क़ुरआन मजीद में काफिरों से लड़ने के लिए अल्लाह के फ़रमान बताये गए थे.लेख में क़ुरआन मजीद की वह आयतें भी दी गयी थीं.
इसके बाद दिल्ली से प्रकाशित एक पैम्फलेट ( पर्चा ) ' क़ुरआन की चौबीस आयतें, जो अन्य धर्मावलम्बियों से झगड़ा करने का आदेश देती हैं.' किसी व्यक्ति ने मुझे दिया. इसे पढने के बाद मेरे मन में जिज्ञासा हुई कि में क़ुरआन पढूं. इस्लामी पुस्तकों कि दुकान में क़ुरआन का हिंदी अनुवाद मुझे मिला. क़ुरआन मजीद के इस हिंदी अनुवाद में वे सभी आयतें मिलीं, जो पैम्फलेट में लिखी थीं. इससे मेरे मन में यह गलत धारणा बनी कि इतिहास में हिन्दू राजाओं व मुस्लिम बादशाहों के बीच जंग में हुई मार-काट तथा आज के दंगों और आतंकवाद का कारण इस्लाम है. दिमाग भ्रमित हो चुका था.इस भ्रमित दिमाग से हर आतंकवादी घटना मुझे इस्लाम से जुड़ती दिखाई देने लगी.
इस्लाम, इतिहास और आज कि घटनाओं को जोड़ते हुए मैंने एक पुस्तक लिख डाली ' इस्लामिक आतंकवाद का इतिहास ' जिसका अंग्रेजी अनुवाद 'The History of Islamic Terrorism' के नाम से सुदर्शन प्रकाशन,सीता कुंज,लिबर्टी गार्डेन,रोड नंबर 3, मलाड (पशचिम) मुंबई 400 064 से प्रकाशित हुआ.
मैंने हाल में इस्लाम धर्म के विद्वानों ( उलेमा ) के बयानों को पढ़ा कि इस्लाम का आतंकवाद से कोई सम्बन्ध नहीं है. इस्लाम प्रेम सदभावना व भाईचारे का धर्म है.किसी बेगुनाह को मारना इस्लाम के विरुद्ध है। आतंकवाद के खिलाफ़ फ़तवा भी जरी हुआ है।
इसके बाद मैंने क़ुरआन मजीद में जिहाद के लिए आई आयतों के बारे में जानने के लिए मुस्लिम विद्वानों से संपर्क किया,जिन्होंने मुझे बताया कि क़ुरआन मजीद कि आयतें भिन्न -भिन्न तत्कालीन परिस्तिथियों में उतरीं। इसलिए क़ुरान मजीद का केवल अनुवाद ही देखकर यह भी देखा जाना ज़रूरी है कि कौनसी आयत किस परिस्तिथियों में उतरी तभी उसका सही मक़सद पता चल पाएगा ।
साथ ही ध्यान देने योग्य है किक़ुरआन इस्लाम के पैग़म्बर मुहम्मद ( सल्लल्लाहु  अलैहि व सल्लम ) पर उतरा गया था। अत: क़ुरआन को सही मायने में जानने के लिए पैग़म्बर मुहम्मद ( सल्लल्लाहु  अलैहि व सल्लम ) कि जीवनी से परिचित होना भी ज़रूरी भी है।
विद्वानों ने मुझसे कहा -" आपने क़ुरआन माजिद की जिन आयतों का हिंदी अनुवाद अपनी किताब में लिया है, वे आयतें अत्याचारी काफ़िर मुशरिक लोगों के लिए उतारी गयीं जो अल्लाह के रसूल ( सल्ल०) से लड़ाई करते और मुल्क में फ़साद करने के लिए दौड़े फिरते थे। सत्य धर्म की रह में रोड़ा डालने वाले ऐसे लोगों के विरुद्ध ही क़ुरआन में जिहाद का फ़रमान है।
उन्होंने मुझसे कहा कि इस्लाम कि सही जानकारी न होने के कारण लोग क़ुरआन मजीद कि पवित्र आयतों का मतलब समझ नहीं पाते। यदि आपने पूरी क़ुरआन मजीद के साथ हज़रात मुहम्मद ( सल्लालाहु अलैहि व सल्लम )  कि जीवनी पढ़ी होती, तो आप भ्रमित न होते ।"
मुस्लिम विद्वानों के सुझाव के अनुसार मैंने सब से पहले पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद कि जीवनी पढ़ी। जीवनी पढ़ने के बाद इसी नज़रिए से जब मन की शुद्धता के साथक़ुरआन मजीद शुरू से अंत तक पढ़ी, तो मुझे क़ुरआन  मजीद कि आयतों का सही मतलब और मक़सद समझ आने लगा ।
सत्य सामने आने के बाद मुझे अपनी भूल का अहसास हुआ कि मैं अनजाने में भ्रमित था और इसी कारण ही मैंने अपनी किताब ' इस्लामिक आतंकवाद का इतिहास ' में आतंकवाद को इस्लाम से जोड़ा है जिसका मुझे हार्दिक खेद है ।
मैं अल्लाह से, पैग़म्बर मुहम्मद ( सल्ल०) से और सभी मुस्लिम भाइयों से सार्वजानिक रूप से माफ़ी मांगता हूँ तथा अज्ञानता में लिखे व बोले शब्दों को वापस लेता हूं। सभी जनता से मेरी अपील है कि ' इस्लामिक आतंकवाद का इतिहास ' पुस्तक में जो लिखा है उसे शुन्य समझें ।