क़ानून के बारे में पश्चिमी मुल्कों के भौतिक दृष्टिकोण 2

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अब इस बातचीत को जारी रखने में यह सवाल पैदा होता आता है कि इस्लामी दृष्टिकोण से आज़ादी का आधार क्या है और उसकी सीमाएं और एरिया क्या है क़ानून के लिए पहले बयान की गई विशेषता से यह मालूम होता है कि इंसानी समाज में ज़िंदगी के टार्गेट और मक़सद और भौतिक व वास्तविक व मअनवी हितों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए क़ानून का मौजूद होना वाजिब हैं
भौतिक व आध्यात्मिक हितों के बारे में इस्लामी क़ानून की कृपादृष्टि
अब इस बातचीत को जारी रखने में यह सवाल पैदा होता आता है कि इस्लामी दृष्टिकोण से आज़ादी का आधार क्या है और उसकी सीमाएं और एरिया क्या है क़ानून के लिए पहले बयान की गई विशेषता से यह मालूम होता है कि इंसानी समाज में ज़िंदगी के टार्गेट और मक़सद और भौतिक व वास्तविक व मअनवी हितों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए क़ानून का मौजूद होना वाजिब हैं अगर समाजी ज़िंदगी न हो तो लोगों के भौतिक और वास्तविक व मअनवी हितों को पूरा नहीं किया जा सकता हैं समाजी ज़िंदगी के अंतर्गत इंसान इस बात का प्रतीक्षक रहता है कि वह अल्लाह तआला की दी हुई नेमतें जैसे इल्म, टेक्नालोजी, उद्धोग और उच्च श्रेणी के गुरूओं से कौशलता के संदर्भ में जैसा फ़ायदा उठाना चाहिए वैसा फ़ायदा हासिल कर सकें इन इल्म का केवल समाजी ज़िंदगी में ही हासिल करना संभव हैं नतीजे में क़ानून ऐसा होना चाहिए जो इंसानी तरक़्क़ियाँ का भौतिक और वास्तविक व मअनवी दोनों दिशाओं में प्रतिभू हो, क़ानून का केवल समाज में अनुशासन स्थापित करना ही काफ़ी नहीं हैं जैसे अगर दो लोग यह तय करें कि वह दूसरों को कोई नुक़सान पहुँचाए बिना और समाज के अनुशासन में बाधा डाले बिना एक दूसरे को हत्या कर डालेंगे तो क्या वह सही काम अंजाम देंगे?
अगर आपको याद हो तो कुछ दिन पहले अमरीका के एक शहर में इंसानों के एक गुट को जला दिया गया और यह घोषणा कर दी गई कि यह वह लोग थे जो अपने रस्म व रेवाज में आत्महत्या को कौशलता समझते थे। हालांकि दिमाग़ में सवाल पैदा होता है कि संभव है कि ख़ुद अमरीका के हुकूमत के ऑफ़ीसर ने जब उन लोग को अपनी हुकूमत सिस्टम के विरूद्ध देखा तो सबको निरस्तित्व कर दिया हों मान लीजिए कि अगर उस गुट ने अपने दीनी दृष्टिकोणों के अनुसार इस काम को अंजाम दिया हो तो क्या उनका ऐसा करना सही है क्या यह कहा जा सकता है कि उन्होंने किसी को कोई कष्ट नहीं पहुंचाया है और ख़ुद एक दूसरे की सहमति हासिल करके एक दूसरे का क़त्ल कर दी तो उन्होंने सही काम अंजाम दिया है क्या हुकूमत को ऐसे क़ानून की इजाज़त दे देनी चाहिए? अगर केवल अनुशासन और सुरक्षा व शांति को लागू करना ही आधार है तो अनुशासन और सुरक्षा व शांति कुछ लोगों की एक साथ हत्या से भी बाक़ी रहती है और क़ानून दूसरा कोई और ज़िम्मेदारी व उत्तरदायित्व नहीं रखता हैं
उदारवादी दृष्टिकोण में हुकूमत की ज़िम्मेदारी व उत्तरदायित्व केवल अनुशासन और शांति स्थापित करना है और क़ानून का काम अराजकता को रोकने के अलावा कुछ और नहीं हैं इस विचार का नतीजे वही चीज़ है जिसका यूरोपीय मुल्कों में प्रत्यक्ष रूप से दर्शन किया जाता हैं जैसे नैतिक, यौन सम्बंधी और समाजी अशांति व उपद्रव आदि यह सभी समस्याएं उनके इस दृष्टिकोण का नतीजे है कि हुकूमत को पब्लिक के अधिकारों और उनके ज़िंदगी में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं हैं और हुकूमत को तो केवल अनुशासन स्थापित रखना चाहिए, हुकूमत को केवल हथियार के साथ पुलिस के समान स्कूलों में रहना चाहिए ताकि बच्चे एक दूसरे को या अपने गुरूओं का क़त्ल न कर दें, वहाँ पर अनुशासन और सुरक्षा व शांति इसी हद तक हैं क्या क़ानून की ज़िम्मेदारी व उत्तरदायित्व केवल यही है या दूसरे ज़िम्मेदारी जैसे इंसानों के अंदर तरक़्क़ी भी क़ानून की ज़िम्मेदारी है और क्या क़ानून को नैतिक बुराईयों से भी रोकना चाहिए?
जो कुछ हमने बयान किया उसका नतीजे यह है कि क़ानून को वास्तविक व मअनवी हितों को भी मद्देनज़र रखना चाहिए। इस आधार पर जो कुछ इंसानों के वास्तविक व मअनवी हितों और उनके व्यक्तित्व, इलाही आत्मा, इलाही प्रतिनिधित्व के पद और इंसानियत के लिए बाधा पैदा करे और इसी तरह जो भौतिक हितों और इंसानों की सुरक्षा व शांति व कुशलता को नुक़सान व नुक़सान पहुंचाए, वह भी निषिद्ध होना चाहिए। क्या समाज इसलिए नहीं होता कि इंसान अपनी इंसानियत के कारण तरक़्क़ियाँ करे और केवल अपने भौतिक टार्गेट ही नहीं बल्कि वास्तविक व मअनवी लक्ष्यों को भी हासिल करें? तो क़ानून को भौतिक और वास्तविक व मअनवी दोनों हितों का प्रतिभूत होना चाहिए। इसलिए किसी की मान मर्यादा और लोगों की दीनी व पाक कृतियों से जंग करना यह मानवों की वास्तविक व मअनवी तरक़्क़ी को रोकता है, यह भी निषिद्ध होना चाहिए। जिस तरह से नशीली औषधि का इस्तेमाल करना या विषैला इंजेक्शन लगाना मना हैं क्यों कि वह इंसान को बीमार करता है और पूरी तरह से नष्ट कर देता है और उसके भौतिक हितों को ख़तरे में डाल देता हैं
अब अगर कोई विष का आदी हो जाए और उसके कामों में कोई बाधा पैदा न हो और वह देखने में सही और स्वस्थ हो लेकिन उसकी विवेक वाला ताक़त ख़त्म हो गई हो तो क्या यह उसके लिए वैध हो जाएगा? अगर दूसरे तरह की आफ़तों और ज़हेर का इस्तेमाल किया जाए जो उसकी आंतरिक कुशलता और यक़ीन के ख़त्म हो जाने का कारण हो तो क्या उन कामों को अंजाम देना निषिद्ध नहीं है क्या इस काम से मानव की इंसानियत को नुक़सान व नुक़सान नहीं पहुँचती है अगर कुछ लोग समाज में ऐसी शर्तें संग्रहित करें जो पब्लिक को दीनदारी से दूर करे तो क्या उनको आज़ाद होना चाहिए? क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता हैः कि %
और (यह भी याद रहे) कि अल्लाह तआला के रास्ता से रोकना और अल्लाह तआला से इंकार और मस्जिदे हराम
(काबा) से रोकना उससे बढ़कर पाप हैं
जो चीज़ तरक़्क़ी व विकास और मानवों को दीन की वास्तविकताओं से अवगत होने के रास्ता को बंद कर दे और दीन को जवानों के सामने संदेह जनक होने का कारण हो वह मना हैं चूँकि यह काम मानव की इंसानियत को नुक़सान पहुंचाता हैं कैसे जो चीज़ मानव की पशुता यानि पाशविकता को नुक़सान पहुंचाती है तो वह निषिद्ध होती हैं लेकिन जो चीज़ मानव की इंसानियत को नुक़सान पहुंचा, वह आज़ाद होती है! दुनिया कहती है हाँ। लेकिन दीन कहता है कि नहीं,। हमारा यह यक़ीन है कि समाज में उस क़ानून को लागू होना चाहिए जो मानवों की वास्तविक व मअनवी हितों की रक्षा करे और वास्तविक व मअनवी हितों की रक्षा करना, भौतिक हितों की रक्षा से ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं (इस बात का ख़्याल रहे, कि जो कुछ हमने बयान किया उसका अकैडमिक बातचीत से सम्बंध है और संभव है उसका मिसाल न मिल सके इसलिए इसका मतलब यह न समझ लें कि हमने वित्तीय समस्याओं की उपेक्षा की हैं)
दीनी व आध्यात्मिक हितों की भौतिक हितों पर प्राथमिकता
अगर कोई ऐसा अवसर आ जाए कि हमारी आर्थिक स्थिति तो अच्छी हो लेकिन हमारे दीन पर आँच आती हो या दीनी स्थिति तो सुधरती हो लेकिन आर्थिक स्थिति पर आँच आती हो तो हमको दोनों में से कौन सी दशा का चयन करना चाहिए? हमारा तो यह यक़ीन है कि इस्लाम की तरक़्क़ी व विकास आर्थिक विकास की भी प्रतिभू है मगर एक दीर्घकालीन प्रोग्राम के अंतर्गत और अगर पूरी तरह से उसका पालन किया जाए लेकिन कभी यह संभव है कि आर्थिक फ़ायदा थोड़े समय के लिए ख़त्म हो जाए और पब्लिक के लिए कुछ कठिनाई का कारण बने अगर इस तरह की स्थिति पैदा हो जाए तो बयान की गई बातों और तर्कों को मद्देनज़र रखते हुए दीनी हितों को प्रमुखता दी जानी चाहिए या दुनियावी और भौतिक हितों को प्राथमिक दी जानी चाहिए? जैसा कि नहजुल बलाग़ा में हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया है कि
अगर तुम्हारी जान ख़तरे में पड़ जाए तो तुम अपने दौलत को अपनी जान पर फ़िदा कर दो और अगर जान और दौलत के बीच ख़तरा हो तो दौलत बलिदान कर दो। लेकिन अगर जान और दीन के बीच ख़तरा है यानि ज़िंदगी नास्तिकता की दशा में मरने और ईमान व यक़ीन की दशा में वीरगति हासिल होने के बीच टकराव हो तो फिर अपनी जान और दौलत को दीन पर बलिदान कर देना चाहिए। इस अवसर पर अगर इंसान मर जाए तो उसको कोई नुक़सान नहीं होगा।
क्यों कि कुरआने मजीद में अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता हैः कि
(ऐ पैग़म्बर) तुम मुनाफ़िक़ों। से कह दो कि तुम तो हमारे लिए (विजय, उपलब्धि या वीरगति) दो भलाईयों में से एक के प्रतिक्षक हो
जो इंसान इस्लाम दीन की सेवा में वीरगति को हासिल हो जाए तो उसकी क्या नुक़सान हो सकता है वह सीधा जन्नत में जाएगा, लेकिन मान लीजिए अगर कोई विधर्मी इंसान सौ साल तक ज़िंदा रहे तो दिन प्रतिदिन उसकी सज़ा में ज़्यादाती होने के अलावा उसका और क्या फ़ायदा होगा? पर इस्लामी दृष्टिकोण से दीनी हित, भौतिक हितों से महत्वपूर्ण हैं इस आधार पर क़ानून को दीनी हितों की रक्षा के अलावा उनको प्रमुखता भी देना चाहिए, हमारी बातचीत तर्कोपस्थिति या विवेचन से परिपूर्ण है और हम अपने तर्कोपस्थिति या विवेचन को किसी दूसरे पर नहीं थोपना चाहते हैं। जो इंसान क़बूल करना चाहते हैं वह क़बूल कर लें और जो नहीं चाहते हैं वह उसे क़बूल नहीं कर सकते हैं। हमने इन तर्कोंपहालात या विवेचनों के आधार पर किसी तरह की तर्कहीन बातों को पेश नहीं किया हैं
आज़ादी के एरिये और सीमाकरण के बारे में इस्लामी व लेब्रालिज़्म दृष्टिकोणों के बीच अंतर
पूरे दुनिया के सभी अक़्लमंद इंसानों के समान हमारी निगाह में भी आज़ादी सीमित हैं लेकिन उन के और हमारे बीच यह अंतर है कि उन के यहां आज़ादी के सीमित होने का मतलब दूसरों की आज़ादी को नुक़सान पहुंचाना है और हमारे यहां आज़ादी के सीमित होने का मतलब समाजी हितों को निरापद व सुरक्षित करना हैं मानव अपनी ज़िंदगी में आज़ाद है वह बात करे, खाए, काम करे, व्यापार करे, आर्थिक दशा सुधारे, बातचीत करे, सफ़र करे, अनुबंध पर हस्ताक्षर करे, सारांश रूप में यह कहा जाए कि उसको हर काम करने की इजाज़त हासिल है लेकिन किस हद तक? जहां तक समाज के भौतिक और वास्तविक व मअनवी हित नष्ट व बर्बाद न होते हों। जहां आज़ादी भौतिक हिसाब से समाज के हितों को नुक़सान पहुँचाना शुरू कर दे, वह निषिद्ध है और इसी तरह जहां पर स्वतंत्राओं से फ़ायदा उठाना, समाज के वास्तविक व मअनवी हितों से टकरा जाए तो ऐसी स्वतंत्राएं निषिद्ध हैं। उपर्युक्त दोनों अवस्थाओं में आज़ादी से फ़ायदा हासिल करना हैं यह हमारा तर्क व दलील है और अगर किसी के पास हमसे बेहतर तर्क व दलील है तो हम उसको सुनने और उस से फ़ायदा उठाने के लिए तय्यार हैं। अधिकारों के फ़लसफ़े के विशेषज्ञों से मेरा निवेदन है कि वह और ज़्यादा मनन चिंतन से काम लें। जहां तक हमें मालूम है आज तक अधिकारों और सियासत के फ़लसफ़ियों ने इस सवाल का कोई तय और तार्किक व तर्क व दलील पूर्ण जवाब नहीं दिया कि आज़ादी का सीमाकरण है क्या? अगर हमारे मौलिक क़ानूनों में या सार्वजनिक क़ानूनों में विश्वविख्यात लोगों  यहां तक कि अगर इमामे ख़ुमैनी के वक्तव्यों में कोई संदिग्ध व समरूप व्यंजना मौजूद हो तो उसकी व्याख्या, उसके योग्य और स्पेशलिस्ट से पूछी जानी चाहिए। हम भी क़ानून के लागू होने के समर्थक हैं इस्लामी मुल्क में क़ानूनों के पालन में हमारे ज़िम्मेदारी दूसरों से कहीं ज़्यादा हैं। लेकिन हमारा दूसरों से यह अंतर है कि हम क़ानून को इसलिए मान्य, प्रमाणिक व वैध समझते हैं कि वली-ए-फ़क़ीह ने उन पर हस्ताक्षर किए हैं और चूँकि इमामे ख़ुमैनी ने फ़रमाया है इस्लामी हुकूमत का अनुसरण करना वाजिब हैं कुछ लोग कहते हैं कि चूँकि पब्लिक ने अपने वोट भी दिए हैं अब कौन से क़ानून बेहतर है, किस का प्रभाव ज़्यादा है जब किसी इंसान से कहा जाए कि पब्लिक ने वोट दिए हैं इसलिए इस क़ानून का पालन करना वाजिब है तो संभव है वह इंसान जवाब दे कि मैने उस प्रत्याशी या प्रतिनिधि को वोट नहीं दिया है या में इस क़ानून से संतुष्ट व  सहमत ही नहीं हूँ। लेकिन इमामे ख़ुमैनी ने फ़रमा दिया है कि अगर इस्लामी हुकूमत कोई हुक्म प्रचारित करे और संसद किसी क़ानून को पास कर दे तो दीनी ज़िम्मेदारी के रूप में उसका अनुसरण करनी चाहिए। अब हम क़ानून के पाबंद हैं या वह? यहां तक कि अगर किसी मौलिक क़ानून में भी कोई संदिग्धता पाई जाती हो तो उसकी व्याख्या के लिए किसी प्रभुत्तशाली व सत्तावान ज्ञानी से सम्पर्क करना चाहिए किसी ओर से नहीं।
तो नतीजा यह निकला कि सभी राष्ट्रों और सभी बुद्धिमानों के निकट आज़ादी सीमित हैं लेकिन इस्लामी दृष्टिकोण से समाज की भौतिक और वास्तविक व मअनवी हित उसकी हद हैं, सभी इंसान वहाँ तक आज़ाद हैं जहां तक समाज और समाज के भौतिक और वास्तविक व मअनवी हितों को नुक़सान न पहुँचती हो
अल्लाह का पैग़म्बरों व नबियों को भेजने का टार्गेट यही है कि लोग सच्चाई पहचानते हुए अपने लिए सुख सुकून और आनन्द का रास्ता चुनें और अपनी इच्छा से सच्चे दीन को क़बूल करें न यह कि अल्लाह तआला उनको क़बूल करने पर मजबूर करे, वह यक़ीन जो विवशता पूर्वक और बल इस्तेमाल से हासिल हो उसका कोई मूल्य, मान और महत्व नहीं है और आप का काम केवल हमारे संदेश को पहुँचाना था इसलिए आप उन अनेकेश्वरवादियों के यक़ीन न लाने के कारण चिंतित न हों। क्या आप सोचते हैं कि आपने अपनी नुबूव्वत के ज़िम्मेदारी का पालन नहीं किया आपकी नुबूव्वत की ज़िम्मेदारी यह नहीं है कि पब्लिक को बल इस्तेमाल और विवशता पूर्वक मुसलमान करें, क्यों कि हमने आपको नास्तिकों के लिए चयन नहीं किया है कि ताक़त के इस्तेमाल द्वारा उनको मुसलमान करें। आयतों के पहले समूह के मुक़ाबले में आयतों का दूसरा समूह उन लोगों के बारे में है कि जिन्होंने जानकारी के साथ अपनी इच्छा से इस्लाम को क़बूल किया हैं इन आयतों में उन लोगों को संदेश दिया जा रहा है कि इस्लामी नियमों का पालन करें और उस पैग़म्बर का अनुसरण करें जिस पर यक़ीन रखते हैं कि यह पैग़म्बर और उसके सभी नियम अल्लाह तआला की ओर से है और उस पैग़म्बर के मत के सामने अपने झुका दें और लोग रसूले इस्लाम रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लमके हुक्म पर  विकल्पों के निर्वाचन का अधिकार भी नहीं रखते हैं।
इस्लाम क़बूल करने से पहले इंसान को निर्वाचन का अधिकार है लेकिन इस्लाम को क़बूल करने के बाद सारे दीनी नियमों को मानना पड़ेगा इस आधार पर वह लोग जो अल्लाह तआला के कुछ नियम पर यक़ीन रखते हैं अल्लाह तआला उनकी आलोचना करता हैं
निःसंदेह जो लोग अल्लाह तआला और उसके पैग़म्बरों का इंकार करते हैं अल्लाह तआला और उसके पैग़म्बरों में भेदभाव करते हैं और कहते हैं कि हम कुछ “पैग़म्बरों’ पर यक़ीन लाए है और कुछ का इंकार करते हैं और चाहते हैं कि इस “नास्तिकता और विश्वास’ के बीच एक दूसरा रास्ता निकालें यही लोग वास्तव में मुश्रिक व नास्तिक हैं।
कुछ नियमों को क़बूल करना और कुछ दूसरे नियमों क़बूल न करना इसी तरह कुछ हुक्मों को क़बूल करना और दूसरे हुक्मों से इंकार करना मानो अस्ल दीन से इंकार करने समान हैं क्योंकि दीन को क़बूल करने का आधार अल्लाह तआला के हुक्मों को मानना है तो इलाही हुक्म के अनुसार अमल किया जाए और अल्लाह तआला के सारे नियम और क़ानून क़बूल करने के लिए है यहां तक के अगर दीन क़बूल करने का आधार मसालेह यानि हित व अच्छाई और मफासिद यानि उपद्रव हो कि जिनको अल्लाह तआला जानता है और अपने नियमों में उनकी ओर ध्यान देता है और इसमें कोई शंका नहीं के अल्लाह तआला सारे मसालेह यानि हित व अच्छाई और मफासिद यानि उपद्रव को जानता है इसलिए फिर क्यों कुछ नियमों को क़बूल किया जाए और कुछ को छोड़ दिया जाए तो नतीजे यह निकला कि वही इंसान अल्लाह तआला पर यक़ीन रखता है जो पैग़म्बर पर भी यक़ीन रखता हो और उनके उत्तराधिकारियों के फ़ैसला और उनके हुक्म को भी क़बूल करे और दिल से भी इस पर संतुष्ट रहे और ज़रा भी कुरूद्धता और नाख़ुशी का आभास न करे।
तो ऐ रसूल’ तुम्हारे प्रतिपालक व मालिक की क़सम यह लोग सच्चे मोमिन न होंगे जब तक अपने आपसी झगड़ों में तुमको अपना मध्यस्थ न बनाए। फिर “यही नहीं बल्कि’ जो कुछ तुम फ़ैसला लो उस से किसी तरह दुखी भी न हों बल्कि ख़ुशी व हर्ष से उसको मान लें।
वास्तव में मोमिन रसूले इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम के फ़ैसले को दिल से क़बूल करता है और कुरूद्धता व नाख़ुशी का आभास नहीं करता इस का कारण यह है कि उसको पूरा यक़ीन है कि यह रसूल, अल्लाह तआला का भेजा हुआ है उनका हुक्म अल्लाह तआला का हुक्म है और यह रसूल अपनी ओर से कुछ नहीं कहता।
“ऐ रसूल’ हमने तुम पर सच्चाई पर आधारित किताब इस लिए नाज़िल (अवतीर्ण) की है कि जिस तरह अल्लाह तआला ने तुम्हें रास्ता बताया है तुम पब्लिक के बीच मध्यस्थ बन कर फ़ैसला लो।
अगर कोई इस्लाम को क़बूल करने के बाद कहे कि में इस्लामी नियम का पालन करने के बारे में आज़ाद हूँ चाहूँ पालन करूँ या न करूँ तो यह उस हुकूमत की तरह है कि जो डेमोक्रेसी और आज़ाद है और वह लोग अपनी इच्छा से इस हुकूमत के चयन व चुनाव में शामिल होते हैं और अपने वोटों द्वारा प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और मिम्बर आफ पारलिमेंट को चयन करते हैं लेकिन जब यही हुकूमत क़ानून बनाता है तो उस का पालन करने से इंकार कर देते हैं।
और जब यह हुकूमत कर लगाता है तो क्या किसी को कहने का अधिकार है कि में नहीं दूँगा, हम हुकूमत के निर्वाचन और इसके वोट देने में आज़ाद थे इसलिए अब भी हम आज़ाद हैं कि इसके क़ानून का पालन करें या न करें “इन बातों को कोई भी अक़्लमंद क़बूल नहीं कर सकता।
जी हाँ इस्लाम को क़बूल करने में किसी को मजबूर नहीं किया जा सकता क्यों कि इस्लाम दिल में यक़ीन का नाम है और ताक़त के ज़ोर पर अगर किसी ने इस्लाम क़बूल कर लिया तो जिस समय उससे कहा जाएगा कि नमाज़ पढ़ो और अगर कोई कहे कि में नमाज़ नहीं पढ़ूंगा या अगर उससे कहा जाए धर्मादाय दो लेकिन वह धर्मादाय देने से इंकार करे, तो कोई भी इंसान इसको क़बूल नहीं कर सकता अगर किसी ने इस्लाम क़बूल कर लिया तो उसके सारे नियमों को भी क़बूल करना पड़ेगा यह नहीं हो सकता कि इस्लाम तो क़बूल करे लेकिन इसके नियमों  को क़बूल न करे और अपनी इच्छा के अनुसार काम अन्जाम दे कोई भी हुकूमत इस बात को मानने को तय्यार नहीं हो सकता है कि आदमी उसको वोट दे लेकिन क्रियात्मक मैदान में उस हुकूमत के नियमों को क़बूल न करे, समाजी ज़िंदगी में मौलिक और सबसे मूल ज़िम्मेदारी व उत्तरदायित्व प्रतिज्ञा व वचन पर निष्ठावान होना है और इसके अलावा समाजी ज़िंदगी बिल्कुल ही वुजूद नहीं पा सकता हैं
इसलिए अगर कोई यह कहे। कि में इस्लाम को क़बूल करता हूँ और पैगम्बर पर यक़ीन रखता हूँ लेकिन इस्लाम के नियमों और हुक्मों का पालन नहीं करता हूँ और उसके हुकूमत अधिकार और स्वामित्व को क़बूल नहीं करता तो  ऐसे इस्लाम का कोई फ़ायदा नहीं हैं क्यों कि इस्लाम और पैगम्बर को क़बूल करना और उनके अनुसरण व अनुसरण न करने में ज़ाहिरी टकराव निहित हैं हमारी वार्तालाप से यह बात स्पष्ट हो गई कि अगर कोई न्याय व निष्पक्षता की निगाह से आयात का अध्ययन करे और उनके विवेचन स्वर, और पहले और बाद की आयतों को ध्यान से देखे तो क़ुरआन में टकराव नहीं मिलेगा और उल्लिखित संदेहों के अनुसरण और आज़ादी में जो टकराव है वह बिल्कुल ख़त्म हो जाएगा जैसा कि क़ुरआन ने भी इसको सही कहा हैं
लेकिन जिनके दिल अस्वस्थ है वह कुर्आने करीम को सच्चाई, सच्चाई और न्याय व निष्पक्षता से नहीं देखते अगर वह क़ुरआन का अध्ययन करते तो इस कारण कि अपने ग़लत विचार और विमुखता की मज़बूती के लिए कोशिश करें और इसी कारण क़ुरआन की आयात के कुछ हिस्से को चयन करते हैं और उसके पहले और बाद की आयतों को नहीं देखते और क़ुरआन के अनुसार मोहकमात क़ुरआन यानि स्पष्ट नियमों को छोड़ देते हैं और संदेहजनक व संदिग्ध नियमों का अनुसरण करते हुए दिखाई देते हैं जैसा कि कुरआने मजीद में अल्लाह तआला फ़रमाता हैं
पर जिन लोगों के दिल में टेढ़ापन है वह इन्हीं आयतों के पीछे पड़े रहते हैं जो संदेहजनक व संदिग्ध हैं, ताकि अशांति व उपद्रव करें इस ख़्याल से कि उन से अपनी इच्छा अनुसार मतलब निकालें हालांकि अल्लाह तआला और उन अल्लाह तआला भक्तों के अलावा जो इल्म में बड़े पद पर पदासीन हैं उन का मूल मतलब कोई नहीं जानता।
संदेहजनक व संदिग्ध आयतों के अनुसरण के अलावा आयात को टुकड़े टुकड़े करते हैं और आयात के एक वाक्य को ले लेते हैं और उसके पहले और बाद के वाक्यों को छोड़ देते हैं, जिसके नतीजे में इनको कुरआने मजीद में टकराव निगाह आता है जैसा कि उल्लिखित संदेहों में उन लोगों ने आयात के पहले और बाद के वाक्यों को छोड़ते हुए संदेह पैदा किया है कि पैग़म्बरों का स्वामित्व अधिकार आज़ादी के विरूद्ध हैं
वह आयात जिनमें रसूल सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम के जबरन क़ब्ज़े और स्वामित्व का इंकार किया गया है वह नास्तिकों के इस्लाम क़बूल करने से पहले नाज़िल हुई थी जिनमें। कहा गया है कि रसूल उनको ताक़त के ज़ोर पर इस्लाम क़बूल न करवाएं यानि रसूले इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम नास्तिकों पर जबरन क़ब्ज़े नहीं रखते। वास्तव में इन आयात के अनुसार इलाही नियम के पालन की आज़ादी इस्लाम लाने से पहले हैं वरना तो इस्लाम क़बूल करने वाले हर मुसलमान के लिए ज़रूरी और वाजिब है कि वह पैग़म्बर और दूसरे इस्लामी नियमों का अनुसरण करे और इस्लामी हुकूमत की ज़िम्मेदारी है कि सारे इस्लामी नियमों का पालन करा ऐ, इस्लामी और इलाही क़ानूनों का अपमान या दीन का अपमान या सार्वजनिक रूप से पाप करने वालों का सख़्ती से मुक़ाबला करे, यह वास्तव में समाज पर इस्लामी शासकों की स्वामित्व ही तो है जो उसको आबद्ध करती है कि यक़ीन और इस्लाम के सारे सिद्धांतों का पालन करें, जो ख़ुद उन्होंने अपनी इच्छा से क़बूल किया हैं



پیام رهبر انقلاب به مسلمانان جهان به مناسبت حج 1440 / 2019
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