क़ानून के बारे में पश्चिमी मुल्कों के भौतिक दृष्टिकोण

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जैसा कि हमने पिछले आर्टिकिल्स में बयान किया है कि इस्लाम के दृष्टिकोण से समाज को क़ानून की ज़रूरत होती है वह भी ऐसा क़ानून जो इंसान के दुनिया और क़यामत की सुख, शांति, आनन्द का प्रतिभू हो और क़ानून को लागू करने वाले को भी क़ानून को उसके प्रमाणकों द्वारा समानता देने में पूरी तरह से अवगत, दयालू, सदाचारी, न्यायी और ताक़तवर होना चाहिए जैसा कि प्रबंधन की ज़रूरत भी यही हैं
जैसा कि हमने पिछले आर्टिकिल्स में बयान किया है कि इस्लाम के दृष्टिकोण से समाज को क़ानून की ज़रूरत होती है वह भी  ऐसा क़ानून जो इंसान के दुनिया और क़यामत की सुख, शांति, आनन्द का प्रतिभू हो और क़ानून को लागू करने वाले को भी क़ानून को उसके प्रमाणकों द्वारा समानता देने में पूरी तरह से अवगत, दयालू, सदाचारी, न्यायी और ताक़तवर होना चाहिए जैसा कि प्रबंधन की ज़रूरत भी यही हैं
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हुकूमत के बारे में इस्लाम का यह मौलिक दृष्टिकोण है कि जिसको हमारा समाज विलायते फ़क़ीह के नाम से जानता हैं इस दृष्टिकोण को बयान करते समय हमने बयान किया था कि इंसान का जंगल या घर में ज़िंदगी गुज़ारना संभव है लेकिन कभी भी इंसान की भौतिक और वास्तविक व मअनवी तरक़्क़ियाँ व विकास, समाजी ज़िंदगी के बिना हासिल नहीं हो सकती हैं। सभी इल्म व कला और टेक्नालोजी समाजी ज़िंदगी का ही नतीजा हैं। यहां तक कि जो लोग आत्म सुधार और नैतिकता के मार्गों को तय किए हुए हैं, वह समाजी ज़िंदगी के प्रभावों और अपने नैतिक गुरूओं और शिक्षकों द्वारा ही उस स्थान पर पहुँचे हैं। अगर इंसान के बीच यह सम्बंध व सम्पर्क न होता तो वह कभी भी वास्तविक व मअनवी और भौतिक तरक़्क़ियाँ हासिल नहीं कर सकता था, इस आधार पर इंसान के लिए समाजी ज़िंदगी की ज़रूरत पेश आती है और इसलिए कि लोग इस इलाही कृपा से फ़ायदा हासिल कर सकें, समाजी ज़िंदगी बिताने के लिए उन सब पर हाकिम होने वाले कुछ क़ानूनों का होना ज़रूरी और वाजिब हैं
ज़ाहिर है कि अगर क़ानून न हो तो समाज में दुर्व्यवस्था यानि कुप्रबंध, मतभेद, और अराजकता का माहौल हो जाएगा और इंसानी ज़िंदगी, पाशविक ज़िंदगी में तब्दील हो जाएगी। कुछ रिसर्च करने वाले,शोधार्थी व विचक्षण कहते हैं कि इंसान निजी रूप से एक दूसरे के लिए भेड़िये के समान है और उनको इसी ज़बरदस्ती व ताक़त के द्वारा कंट्रोल करना चाहिए। लेकिन इस तरह का व्यवहार ज़्यादाती करने वाले इंसानों के साथ किया जाता हैं अस्तु इंसान के अंदर बहुत सी ऐसी भावनाएं पाई जाती हैं कि अगर उनको अनुशासन और क़ानून द्वारा क़ाबू में न लाया जाए तो समाज में अशांति व उपद्रव फैल जाए इसके बाद यह सवाल पैदा होता आता है कि इस क़ानून को किस तरह का क़ानून होना चाहिए और उसमें क्या विशेषताएं होनी चाहिए। ताकि वह इंसानी समाज को दुनिया और क़यामत की सुख, शांति और आनन्द की ओर मार्गदर्शन व हिदायत कर सके? सारांशिक रूप से बयान किया जा चुका है कि एक गुट का यक़ीन यह है कि क़ानून को समाज में केवल अनुशासन और सुरक्षा व शांति स्थापित करने वाला होना चाहिए। इसके अलावा क़ानून की और कोई ज़िम्मेदारी व उत्तरदायित्व नहीं हैं दूसरे गुट का यक़ीन यह है कि क़ानून को समाज में अनुशासन और सुरक्षा व शांति के अलावा न्याय व निष्पक्षता को भी स्थापित करने वाला होना चाहिए। इस आधार पर क़ानून की परिभाषा करने में विभिन्न दृष्टिकोण बयान किए गए हैं जैसा कि हमने संक्षेप में बयान किया है, इस बारे में कुछ लोगों का कहना है कि समाज में पब्लिक के स्वाभाविक या नेचुरल अधिकारों के विरूद्ध होने वाले क़ानूनों को लागू नहीं करना चाहिए।
ऊपर ज़िक्र हुए दृष्टिकोण के सपोर्ट में न्यूज़ पेपरों, मैगज़ीनों और विभिन्न तरह के स्टाइल में विभिन्न तरह  के विचार बयान किए जाते हैं और कहा जाता है कि आज़ादी इंसानों के स्वाभाविक या नेचुरल अधिकारों को बयान करने वाली हैं कोई क़ानून इंसानों से उसके इस स्वाभाविक या नेचुरल अधिकार को नहीं छीन सकता हैं हम यह बयान कर चुके हैं कि यह दृष्टिकोण विभिन्न लोगों की ओर से और विभिन्न विचारों के साथ बयान होते हैं। मेरा ख़ुद का उन लोगों के बारे में कोई विचार अभिव्यक्त नहीं हैं कि इन बातों को बयान करने वाले किस गुट से सम्बंध रखते हैं और उनके क्या दृष्टिकोण है और वह क्यों इन बातों को बयान करते हैं? मैं केवल इस कारण कि इल्म और जानकारी का इच्छुक हूँ और पचास साल से मेरा दीनी इल्म से सम्बंध है इसलिए केवल अधिकारों के फ़लसफ़े या सियासत के फ़लसफ़े के बारे में इस्लामी दृष्टिकोण के बारे में बातचीत कर सकता हूँ और अपना दृष्टिकोण पेश कर सकता हूँ और सम्भवतः ज़्यादातर लोगों को मालूम होगा कि मेरा किसी गुट, किसी पार्टी और किसी कमेटी से कोई सम्बंध व सम्पर्क नहीं हैं में केवल दीनी ज़िम्मेदारी के अंतर्गत इन बातों को पेश कर रहा हूँ। अगर कुछ लोग समाज में अशांति व उपद्रव पैदा करना चाहते हैं इसलिए पब्लिक के सामने ग़लत व्याख्याओं को पेश करते हैं या अपनी बातों में अवैध मतलब तब्दीली करते हैं वह उन व्याख्याओं के शुरू या आख़िर से कुछ शब्दों को निकाल देते हैं और एक वाक्य होता किसी का है और उसको किसी ओर से सम्बंध दे कर बयान करते हैं। उनको सूक्ष्मदर्शी यंत्र के सामने रखकर उससे ग़लत फ़ायदा उठाते हैं तो मेरा  ऐसे लोगों से कोई सम्बंध व सम्पर्क नहीं है, समाज में  ऐसे लोग रहे हैं और भविष्य में भी होंगे।
अगर आप को याद हो तो में ने भी बार बार इस बात की आग्रह किया है कि हम कभी कभी  ऐसे शब्द इस्तेमाल करते हैं कि उनका कोई स्पष्ट और सही मतलब नहीं होता है और हर इंसान अपनी समझ की ताक़त के अनुसार  उस से मतलब निकालता है और यही ग़लती का कारण होता है और इस चीज़ का कारण होता है कि सुनने वाला सही तरीक़े से कहने वाले की बात को नहीं समझ पाता हैं कुछ मौक़ों पर यह ग़लत सोच का कारण बन जाता है और कभी तो प्रवंचन का कारण बन जाता है और कभी कोई इंसान जानबूझकर भी धोका देता हैं उन शब्दों में से एक शब्द “स्वाभाविक या नेचुरल अधिकार’ है कि जिसे इस स्थान पर बयान किया गया हैं जब कि सैद्धांतिक रूप से इस तरह बयान होना चाहिए कि अधिकार क्या है और उसके स्वाभाविक या नेचुरल होने के मतलब क्या है?।
स्वाभाविक अधिकारों से सम्बंधित विचार धाराएं
जो लोग अधिकारों के फ़लसफ़े के बारे में जानकारी रखते हैं और यह जानते हैं कि अधिकारों के फ़लसफ़े में से एक स्वाभाविक या नेचुरल अधिकार है, पिछले ज़माने में और जबसे फ़लसफ़े का इतिहास लिखा गया है, कुछ लोगों ने इस विषय के संदर्भ में बातचीत की है।
कुछ प्राचीन दार्शनिक यक़ीन रखते थे कि इंसान स्वाभाविक या नेचुरल अधिकार रखता है जिनको प्रकृति ने उनको प्रदान किया हैं इंसान के स्वभाव में अधिकार रखें गए हैं और कोई इंसान उनको उनसे ले नहीं सकता हैं इसलिए कि इंसानी स्वभाव ने पब्लिक के लिए उन अधिकारों को क़बूल कर लिया है इसी आधार पर वह नतीजे निकालते हैं और देखने में यह नतीजे एक दूसरे के अनुरूप नहीं होते और यही से दार्शनिक अधिकारों और नैतिकता के बारे में एक मशहूर प्रवंचन पैदा हुआ। जिसको स्वाभाविक प्रवंचन कहा जाता हैं क्यों कि कुछ लोग कहते हैं कि इंसान अनेक स्वभाव रखता है जैसे सफ़ेद गोरे इंसानों का एक स्वभाव होता है और काले इंसानों का दूसरा स्वभाव होता हैं काले इंसान शारीरिक हिसाब से गोरे इंसानों से ज़्यादा ताक़तवर और बौद्धिक हिसाब से कमज़ोर होते हैं इसी तरह का दृष्टिकोण अरस्तू से भी नक़्ल हुआ है (यह संदेह न हो जाए कि में उन दृष्टिकोणों को क़बूल नहीं करता हूँ में केवल नक़्ल कर रहा हूँ।) जब काले इंसान जिस्म के हिसाब से ज़्यादा ताक़तवर होते हैं तो उन्हें केवल शारीरिक काम अंजाम देना चाहिए? और गोरे लोगों को बौद्धिक हिसाब से चूँकि वह उस हिसाब से ज़्यादा ताक़तवर हैं इसलिए समाज में बौद्धिक और आफ़िस वाले काम उनके हवाले कर देना चाहिए। नतीजे में कुछ लोग दूसरे इंसानों की सेवा के लिए पैदा हुए हैं, इसी कारण ग़ुलामी एक स्वाभाविक या नेचुरल क़ानून हैं हम अभी इस बातचीत को छेड़ना नहीं चाहते हैं कि क्या काले इंसानों का स्वभाव इस चीज़ का तक़ाज़ा करता है या नहीं? यह ख़ुद एक विस्तार पूर्वक बातचीत है और इसके लिए बहुत ज़्यादा समय की ज़रूरत है
अस्तु इतिहास में स्वाभाविक या नेचुरल अधिकारों के बारे में सबसे ज़्यादा बौद्धिक और सब से ज़्यादा संतुलित व माध्यमिक यह मतलब बयान किया गया है कि अगर कोई चीज़ इंसानों के सर्वीगीण स्वभाव के अनुसार हो तो उसे होना चाहिए। इंसानों को इस तरह के सर्वीगीण स्वभाव के तक़ाज़े से वंचित नहीं करना चाहिए। यहां तक तो बात कुछ क़बूल करने के योग्य है लेकिन इसके तय सबूतों के लिए तर्कों की ज़रूरत है क्यों कि जो चीज़ इंसान के स्वभाव के अनुरूप है उसको अंजाम देना चाहिए और इंसान को उससे वंचित नहीं करना चाहिए। अस्तु मौलिक रूप से यह बात क़बूल योग्य हैं हमारा भी यक़ीन यही है कि जो इंसान का स्वभाव तकाज़ा करता है और स्वाभाविक या नेचुरल रूप से सभी इंसान इस तक़ाज़े के हिसाब से संयुक्त है, तो इंसानों को इस तरह   की ज़रूरतों से वंचित नहीं करना चाहिए। इस बात को साबित करने के लिए बौद्धिक व यथोचित तर्कोपस्थिति या विवेचन भी मौजूद है जिनको हम फ़िलहाल बयान नहीं करना चाहते हैं लेकिन सवाल यह है कि इन ज़रूरतों के प्रमाणक क्या हैं? इंसान के स्वभाव को खाने की ज़रूरत होती है और सभी इंसानों को भोजन की ज़रूरत हैं इस आधार पर किसी इंसान को खाना खाने से वंचित नहीं करना चाहिए। यानि न उसकी ज़बान काटी जाए न उसको कोई  ऐसी दवा पिला दी जाए, जिसके कारण  वह बात करने से वंचित हो जाए या इसी तरह के दूसरे काम, लेकिन इस बात की ओर ध्यान रहना चाहिए कि इस तरह की बातों को बयान करने के उनके ख़ास मक़सद होते हैं।
पश्चिमी मुल्कों में इंसानी अधिकारों का एरिया
आप जानते हैं कि इस ज़माने के आख़िर में इंटर-नेशनल स्तर पर मानवाधिकार के रूप में एक मुद्दे को पेश किया गया। शुरू में इस घोषणा का 46 मुल्कों के, प्रतिनिधियों ने सपोर्ट किया, उसके बाद धीरे धीरे दूसरे मुल्क भी उनसे मिल गए और नतीजे में वह घोषणा इंटर-नेशनल घोषणा के रूप में तब्दील हो गई। इस विज्ञप्ति में इंसानों के लिए अधिकारों को बयान किया गया है जिनमें बयान की आज़ादी, ज़िंदगी बिताने के लिए स्थान चयन करने की आज़ादी, आज़ादाना काम चयन करने की आज़ादी, दीन चयन करने की आज़ादी और बीवी चयन करने की आज़ादी को बयान किया गया हैं
यह अधिकार जिनके लिए उस घोषणा में तर्कोपस्थिति या विवेचन भी पेश नहीं किया गया है कहा। से वुजूद में आए और किस तरह   सभी इंसानों के अधिकारों के रूप में बयान किए गए, इसका एक विस्तार पूर्वक इतिहास हैं अधिकारों के फलसफे से अवगत विद्धानों (ख़ास कर मुसलमान अधिकार स्पेशलिस्ट) की ओर से उस घोषणा में बहुत सी चर्चाएं की गई हैं, जिनमें से एक बातचीत यह है कि वह दार्शनिक बातें जिनको तुम इंसानों के अधिकारों के रूप में बयान करते हो और उनको निरपेक्ष और असीमित जानते हो और तुम्हारा यह यक़ीन है कि उनको किसी को सीमित करने का अधिकार नहीं, वह क्या है और उनके लिए कौन सा तर्क व दलील पाया जाता है?
क्या उनको स्पष्ट और तय करने की कोई हद है या नहीं? और क्या यह अधिकार निरपेक्ष और असीमित रूप से क़ानून से उच्च श्रेणी रखते हैं और किसी क़ानून को उनको सीमित करने का कोई अधिकार नहीं है? क्या कोई क़ानून बयान की आज़ादी की सीमाओं को तय करने की इजाज़त नहीं रखता हैं क्या किसी क़ानून को बीवी के चयन को सीमित करने की इजाज़त नहीं है क्या कोई क़ानून  ऐसा नहीं है जो यह बयान कर सके कि तुमको अपने मुल्क की सीमाओं से बाहर रहने के स्थान का चयन करने का अधिकार नहीं है क्या किसी क़ानून को इन अधिकारों की सीमाओं को स्पष्ट और तय करने की इजाज़त नहीं है?
जब हम यह कहते हैं कि फ़लाँ चीज़ स्वाभाविक या नेचुरल अधिकार है और इंसान के स्वभाव के अनुरूप है और मान लें कि इस पर बौद्धिक व यथोचित तर्क व दलील भी मौजूद हो तो क्या इसका मतलब यह है कि उन अधिकारों की कोई हद नहीं है अगर सीमाकरण है तो कौन उस सीमाकरण को तय करता है वास्तविकता यह है कि ख़ुद घोषणा पत्र को लिखने वाले और उस घोषणा की व्याख्या करने वाले ज़्यादातर लोग (जहां तक मेरी जानकारी में है) भी इन सवालों का सही जवाब देने से कतराते नज़र आते हैं।
अतंतः यह कि आज़ादी क़ानून से बेहतर व श्रेष्ठ है, इससे क्या मुराद है क्या कुछ  ऐसी आज़ादी भी है जिनको सीमित करने का किसी क़ानून को अधिकार नहीं है क्या हम यह सवाल नहीं कर सकते कि उन आज़ादियों की हद कहाँ तक है क्या बयान की आज़ादी का यह मतलब है कि हर इंसान जो कुछ उसका मन चाहे वह सब कह डाले? हम तो यह देखते हैं कि कोई मुल्क ऐसी इजाज़त नहीं देता है और बयान की आज़ादी के लिए सीमाकरण नहीं है जैसे किसी के व्यक्तित्व का अपमान दुनिया में कही भी वैध और क़बूल योग्य नहीं हैं
आज़ादी के सीमाकरण में मतभेद का ज़ाहिर होना
अब यह सवाल पैदा होता है कि स्वतंत्रा का सीमाकरण कहाँ तक हैं और उसको कौन तय करता है इसका संक्षिप्त जवाब यह है कि जब यह कहा जाता है कि आज़ादी क़ानून से बेहतर व श्रेष्ठ है और उसको सीमित नहीं होना चाहिए। इस से मुराद दीनी आज़ादी है, कुछ लोग कहते हैं कि वैध व विधिसम्मत और उचित व संवेदनशील आज़ादी और कुछ दूसरे लोगों ने दूसरी क़ैद की बढ़ोतरी की है, इंसानी अधिकार का ऐलान में उसको नैतिकता से व्यंजना की गई हैं यानि नैतिक मानको के साथ अधिकारों का पालन करना और न्यूनाधिक यह एक अस्पष्ट व भ्रमजनक मतलब रखता है और वैध व विधिसम्मत क़ानून से उनकी मुराद यह नहीं है कि इस्लाम दीन जैसे धार्मिक विधान व शरीअत ने उस क़ानून को वैध क़रार दिया हो हालांकि शब्दकोष के हिसाब से वैध व विधिसम्मत और धार्मिक विधान व शरीअत के लगभग एक ही मतलब हैं लेकिन अधिकारों और सियासत के बारे में वैध व विधिसम्मत से मुराद वह क़ानून है जिसको हुकूमत मान्य, प्रमाणिक व वैध जानता हो न यह कि हर हालत में धार्मिक विधान व शरीअत ने ही उसको इजाज़त दी हों कुछ दीनदार लोगों को यह मतलब शंका और संदेह में न डाल दे कि जब हम यह कहते हैं कि वैध व विधिसम्मत अधिकार या वैध व विधिसम्मत आज़ादी, तो उनको इस्लामी, धार्मिक विधान व शरीअत में तय और स्पष्ट किया गया है, वैध व विधिसम्मत से उनकी मुराद वह अधिकार हैं जो मान्य, प्रमाणिक व वैध और क़ानूनी हैं और अवैध से मुराद दूसरों के अधिकारों से उलंघ्घन करना हैं
लेकिन यह सवाल पैदा होता है कि कौन से अधिकार वैध व विधिसम्मत और उचित व संवेदनशील हैं और कौन से ग़ैरक़ानूनी, अवैध और अनुचित हैं? और किस इंसान को इन्हें। तय करना चाहिए? उनके पास इस जवाब के अलावा और कोई चारा नहीं है कि आज़ादी से सम्बंधित आंशिक बातों और सीमाओं को क़ानून तय करता है और यही। से सबसे पहले टकराव शुरू होता हैं क्यों कि एक और तो वह यह कहते हैं कि यह अधिकार और आज़ादी, क़ानून से ज़्यादा ऊँची श्रेणी रखती हैं और कोई क़ानून उनको सीमित नहीं कर सकता है लेकिन जब हम उनसे कहते हैं कि यह आज़ादी निरपेक्ष और असीमित है या सीमित? तो वह जवाब में कहते हैं कि निरपेक्ष और असीमित आज़ादी नहीं है चूँकि वह सही जवाब नहीं दे सकते, इसलिए कहते हैं कि हमारी मुराद वैध व विधिसम्मत आज़ादी हैं। जब हम उनसे कहते हैं कि वैध व विधिसम्मत से क्या मुराद है तो जवाब देते है कि जिस चीज़ को क़ानून ने पास कर दिया हों यानि क़ानून आज़ादी के सीमाकरण को तय और स्पष्ट करता हैं अभी तो तुमने यह कहा था कि यह आज़ादी, क़ानून से उच्च और श्रेष्ठ हैं संभव है कि आप उसका यह जवाब दें कि वैध व विधिसम्मत और उचित व संवेदनशील स्वतंत्राओं से सभी इंसान और दुनिया के अक़्लमंद अवगत हैं, हम उनसे कहते हैं कि जिस मतलब को सभी इंसान और दुनिया के अक़्लमंद जानते हों तो फिर बातचीत ही ख़त्म हो जाती है चूँकि हम और सभी मुसलमान उन्हीं लोगों में गिने जाते हैं और दुनिया में लगभग एक अरब और कुछ लाख मुसलमान हैं और अक़्लमंद लोग भी उन्हीं में शामिल हैं और सब यह कह सकते हैं कि इस्लाम में किस तरह   की स्वतंत्राओं को क़बूल किया गया है और किस तरह की स्वतंत्राओं को क़बूल नहीं किया गया हैं। हमारी जानकारियों और अध्धयन के अनुसार अभी तक यह सवाल बिना जवाब के हैं और दार्शनिक जो अधिकारों में स्पेशलिस्ट हैं उनके पास इसका कोई तय जवाब नहीं है कि स्वतंत्राओं को कौन सी चीज़ सीमित करती है?
इंसानी अधिकारों में आज़ादी का एरिया
मानवाधिकार का ऐलान व विज्ञप्ति की व्याख्या करने वाले, अधिकारों के विषय पर विशिष्टीकरण करने वाले दार्शनिकों ने अपने फ़लसफ़े की किताबों में आज़ादी के सीमाकरण के बारे में निम्लिखित बातें लिखी हैं।
जिस चीज़ की स्वतंत्राओं को सीमित करने के रूप में व्यंजना की गई है वह दूसरों की आज़ादी हैं यानि हर इंसान वहां तक आज़ाद है जहां तक वह दूसरों के लिए कठिनाई का कारण न हो और दूसरों के अधिकारों को हरण न करें अधिकारों के फ़लसफ़ा ने इस विषय को बहुत ज़्यादा महत्व दिया है और इसके बारे में बहुत ज़्यादा आग्रह किया है और वास्तव में मानवाधिकार के घोषणा पत्र ने जो यूरोप के दार्शनिक अधिकारों की इंजील के समान है इस बात के लिए बहुत ज़्यादा आग्रह करते है कि हर इंसान वहाँ तक आज़ाद है जहां तक दूसरों के लिए कठिनाई का कारण न हों लेकिन अगर निजी आज़ादी से दूसरों को कठिनाई होती हो तो वह इस तरह की आज़ादी से वंचित होगा, और यही पर आज़ादी सीमित हो जाती हैं
यहां पर बहुत से सवाल पैदा होते हैं पहला सवाल, तुम दूसरों के प्रतिरोध की किन वर्गों और इलाक़ों में कल्पना करते हो? क्या प्रतिरोध और कष्ट देना केवल भौतिक कामों में है या वास्तविक व मअनवी कामों को भी शामिल है क्या पब्लिक की दीनी कृतियों का विरोध करना आज़ादी का विरोध करना है या नहीं? यूरोपीय दृष्टिकोण कहता है कि स्वतंत्राओं की सीमाएं वास्तविक व मअनवी बातों को शामिल नहीं होती हैं। और वास्तविक व मअनवी कामों का विरोध आज़ादी को सीमित नहीं करता हैं इसलिए जब यह कहा जाता है कि इस्लाम दीन अल्लाह तआला और पैग़म्बर सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम और पाक स्मृतियों और दीनी कृत्यों के अपमान करने वाले को दीन परित्याग समझता है, जैसे इस्लाम सलमान रूश्दी को इस्लाम की पाक स्मृतियों और दीनी कृत्यों के अपमान करने के कारण उसका क़त्ल वाजिब समझता है तो वह इस बात को क़बूल करने के लिए तय्यार नहीं है और कहते हैं कि बयान, आज़ाद है और वह लेखक है जो चाहे लिख सकता है, तुम भी जो चाहो लिखो, तो हमारा उनसे यह सवाल है कि उस किताब की बातों से दूसरों की पाक स्मृतियों और दीनी कृत्यों का अपमान होता है या नहीं? तो वास्तव में आप यह नहीं कह सकते कि अपमान जनक नहीं हैं
क्या बयान की आज़ादी का एरिया इतना विस्तृत है कि एक इंसान दुनिया के उस कोने से एक अरब से ज़्यादा मुसलमानों के मासूम व दोषरहित व्यक्तित्व यानि रसूले इस्लाम हज़रत मुहम्मद जिनको मुसलमान अपनी जान से ज़्यादा चाहते हैं और प्रिय रखते हैं और अपने हज़ारों प्रिय सम्बंधियों को आप सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम पर फ़िदा करने के लिए तय्यार हैं उनकी शान में गुस्ताख़ी व दुःसाहस करे? क्या इस काम को बयान की आज़ादी कहा जा सकता है और यह वही बात है जिसको सभी लोग समझते हैं कौन सी अक़्ल, तर्क व तर्कशास्त्र और धार्मिक विधान व शरीअत इजाज़त देता है कि एक इंसान दूसरे एक अरब से ज़्यादा मुसलमानों के दोषरहित व्यक्तित्व की शान में गुस्ताख़ी करे? अगर मानवाधिकार के घोषणा पत्र में इंसान की आज़ादी से यही मुराद है तो हम बिना किसी असमंजता के आराम के साथ  ऐसे घोषणा पत्र को क़बूल नहीं करते हैं।
आज़ादी के सीमाकरण पर पश्चिमी मुल्कों के एतेराज़
जो लोग इस घोषणा पत्र को मान्य, प्रमाणिक व वैध समझते हैं और उसका इंजील के समान सम्मान करते हैं उनसे हमारा मौलिक सवाल यह है कि घोषणा पत्र कैसे मान्य, प्रमाणिक व वैध होता है क्या तुम्हारे पास कोई बौद्धिक व यथोचित तर्क व दलील है इस हालत में तुमको उस के वैध होने पर अक़्ल से भी तर्क व दलील पेश करना चाहिए। बड़े आराम से यह नहीं कहा जा सकता कि आज़ादी क़ानून से उच्च श्रेणी रखती है और उसको सीमित नहीं किया जा सकता हैं अगर तुम यह कहते हो कि उसकी मान्यता और यक़ीन इस कारण है कि मुल्कों के प्रतिनिधियों ने उस घोषणा पत्र हस्ताक्षर कर दिए हैं तो मालूम होता है कि उसकी मान्यता और यक़ीन हस्ताक्षर के अधीन हैं अब जिन मुल्कों ने उस घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं या किसी शर्त के साथ हस्ताक्षर किए हैं, उनके बारे में क्या ख़्याल है क्या वह भी किसी बिना किसी असमंजता के उसका अनुसरण करें?
हर समाज एक कल्चर, दोषरहित बातों, पाक कृतियों और ख़ास नियमों पर आधारित होता है और उसी मानवाधिकार के घोषणा पत्र के एक भाग में आया है कि हर इंसान अपना दीन चयन करने में आज़ाद हैं जब इंसान किसी दीन का चयन व चुनाव कर ले तो उसे उसके नियमों का पालन करना चाहिए। किसी दीन के चयन  करने का टार्गेट व मक़सद यह नहीं है कि केवल ज़बान से क़बूल कर लिया जाए बल्कि इंसान को आज़ादाना अपने दीन का पालन करना चाहिए। अब हमने भी इस्लाम को आज़ादाना चयन किया है, इस्लाम का भी हुक्म है कि जो इंसान भी इस्लाम की पाक स्मृतियों का अपमान करेगा उसकी सज़ा मौत हैं यूरोपियन सभ्यता कहती है कि इस्लाम का यह नियम मानवाधिकार के घोषणा पत्र के विरूद्ध हैं इंसानों के स्वाभाविक या नेचुरल अधिकारों के विपरीत व विरूद्ध हैं इसलिए हर इंसान अपने स्वभाव के तकाज़े के अनुसार जो कुछ चाहे कह सकता है और कहने का अधिकार रखता हैं नतीजे में मानवाधिकार के घोषणा पत्र में जो यह दो बातें आई हैं, एक दूसरे के विपरीत हैं।
हम अपनी पहली बातचीत की ओर लौटते हैं के हर इंसान जो चाहे वह कहने का अधिकार रखता है, इस दावे पर कौन सा तर्क व दलील है तो आप अपने मुल्क में हर इंसान को जो कुछ वह कहना चाहे उसकी इजाज़त क्यों नहीं देते हैं? अगर कोई इंसान मिथ्यारोप व दोषारोपण लगाता है तो उसकी शिकायत क्यों करते हैं और जब वह यह कहता है कि बयान आज़ाद है और जो मैंने चाहा वह कहा है तो किस तर्क व दलील के आधार पर उससे यह कहते हैं कि इस तरह की बातें मत करो? मालूम होता है कि निरपेक्ष और असीमित रूप से बयान की आज़ादी नहीं है और कुछ बातों को बयान नहीं करना चाहिए। इस बात को दुनिया के सभी इंसान क़बूल करते हैं कि आज़ादी  निरपेक्ष और असीमित नहीं है वरना इंसानियत और समाज बाक़ी न रहेगा, कि जिसमें कोई क़ानून हाकिम हो और अधिकारों का पालन हों
परिणाम स्वरूप कोई इंसान निरपेक्ष और असीमित आज़ादी को क़बूल नहीं करता है लेकिन सवाल यह है कि उसकी हद कहाँ तक है बयान की आज़ादी को मिसाल के रूप में बयान किया गया और हमने बयान किया कि आज़ादी को असीमित नहीं कह सकते हैं और  ऐसा किसी इंसान ने भी नहीं कहा है और क्रियात्मक रूप से कोई मुल्क इस बात को क़बूल नहीं कर सकता कि हर इंसान का जो मन चाहे वह बयान करे या लिखे। हालांकि वह मिथ्यारोप व दोषारोपण और झूठ ही क्यों न हो और दूसरे लोगों की गुमराही का कारण हो या सुरक्षा सिस्टम व शांति के विरूद्ध हों
अगर वार्तालाप करना आज़ाद है तो हम भी वार्तालाप करते हैं अगर वह हमको इजाज़त दे तो हम भी उनसे एक सवाल करते है और मानवाधिकार के घोषणा पत्र के लिखने वालों की सेवा में आदर और सम्मान के साथ अपना सवाल बयान करते है, हमारा उनसे सवाल यह है कि किस तर्क व दलील के आधार पर इंसान आज़ाद है कि वह जो चाहे कहे? अगर आज़ादी निरपेक्ष और असीमित है तो आप ख़ुद क्यों नहीं क़बूल करते हैं? मिथ्यारोप व दोषारोपण लगाने और झूठ बाँधने व अपमान करने को क्या ख़ुद आप भी क़बूल करते हैं कि आज़ादी निरपेक्ष और असीमित है नतीजे में आपने यह क़बूल कर लिया कि आज़ादी सीमित है लेकिन वह कहाँ तक सीमित है जहां तक आपका मन चाहे, क्या वहाँ तक सीमित है जब आप यह कहते हैं कि दूसरों की आज़ादी में बाधक नहीं बनना चाहिए तो हमारा आप से यह सवाल है कि आप दूसरों की आज़ादी को किस हद तक मान्य, प्रमाणिक व वैध समझते हैं? क्या आज़ादी का सीमाकरण यह है कि जहां तक दूसरों की जानए वित्तीय व आर्थिक और उनकी मान व मर्यादा को नुक़सान न पहुंचती हो? क्या वास्तविक व मअनवी ज़िंदगी की रूह पर, और उनके यक़ीन और उनकी दोषरहित अभिलाषाओं पर जो हमले होते हैं वह निषिद्ध हैं या नहीं? अगर निषिद्ध और मना हैं तो हमारा भी यही दृष्टिकोण है, हम भी यही कहते हैं कि बयान की आज़ादी का सीमाकरण होनी चाहिए, दोषरहित कृतियों का अपमान नहीं करनी चाहिए चूँकि यह दूसरों के अधिकार से खिलवाड़ करने के समान है


پیام رهبر انقلاب به مسلمانان جهان به مناسبت حج 1440 / 2019
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