‘अरब सबकान्टीनेंट की भौगोलिक,समाजिक और कल्चरल स्थिति

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अरब सबकान्टीनेंट पच्छिमी एशिया के उत्तर मे स्थित है, इसका आकार उत्तर पच्छिम से दक्खिन पच्छिम तक चौकोर है और इसका एरिया लगभग बाईस लाख वर्ग किलोमीटर है। इस सबकान्टीनेंट के लगभग पैंतालीस पर्सेंट हिस्से पर सऊदी अरब स्थित है और इसका शेष भाग दुनिया की मौजूदा राजनीतिक गुटबन्दी के हिसाब से 6 मुल्कों अर्थात यमन, संयुक्त अरब अमीरात, क़तर, बहरैन, और कोयत मे बंटा हुआ है।

अरब सबकान्टीनेंट पच्छिमी एशिया के उत्तर मे स्थित है, इसका आकार उत्तर पच्छिम से दक्खिन पच्छिम तक चौकोर है और इसका एरिया लगभग बाईस लाख वर्ग किलोमीटर है। इस सबकान्टीनेंट के लगभग पैंतालीस पर्सेंट हिस्से पर सऊदी अरब स्थित है और इसका शेष भाग दुनिया की मौजूदा राजनीतिक गुटबन्दी के हिसाब से 6 मुल्कों अर्थात यमन, संयुक्त अरब अमीरात, क़तर, बहरैन, और कोयत मे बंटा हुआ है।    अरब सबकान्टीनेंट की सीमाएं दक्खिन की ओर से अदन की खाड़ी, हिन्द महासागर और अरब सागर तक पहुंचती हैं। और पच्छिम की ओर से यह लाल सागर तक और पूरब की ओर ओमान की खाड़ी, फ़ारस की खाड़ी और ईराक़ तक फैली हुई हैं। और उत्तर की ओर से एक बड़ा रेगिस्तान जो कि फ़ुरात नदी से सीरिया तक है इस सबकान्टीनेंट को घेरे हुए है।    अरब सबकान्टीनेंट का एरिया योरोप का एक तिहाई, फ़्रांस का छे गुना, पूर्वी व पश्चिमी जर्मनी का नौ गुना, इटली का अस्सी गुना, स्वीज़रलैंण्ड और ईरान का दोगुना है। क्योंकि इस इलाक़े की नदी आदि की कोई नेचुरल सीमा नही है इसलिए जानकार लोग पुराने ज़माने से ही सऊदीअरब की उत्तरी सीमा के बारे मे मतभेद रखते हैं।यद्यपि अरब प्रायद्वीप फ़ारस की खाड़ी, ओमान सागर, लाल सागर और मिडीट्राना के समन्दर से घिरा हुआ है लेकिन केवल दक्खिनी हिससे के अलावा इस पानी से कोई फ़ायदा नही है, और इस इलाक़े की गिनती दुनिया के बहुत अधिक गर्म और सूखे इलाक़ों मे होती है, यहांतक कि इस क्षेत्र मे कोई ऐसी बड़ी नदी भी नही है जिसमे समन्दरी जहाज़ चल सकें बल्कि वहां ऐसी घाटियां मौजूद हैं जिनमे कभी कभार बाढ़ आजाती है।इस इलाक़े मे सूखेपन की वजह इस प्रायद्वीप मे फैले हुए ऐसे पहाड़ हैं जो एक ऊंची दीवार के समान पच्छिम की ओर लाल सागर के साथ साथ फैले हुए हैं और दक्खिन के पच्छिमी भाग से आड़े तिरछे अन्दाज़ मे दक्खिनी व पूर्बी साहिल से फ़ारस की खाड़ी तक फैले हुए हैं, इसी प्रकार सऊदी अरब तीन ओर से ऊंचे पहाड़ों से घिरा हुआ है और यह पहाड़ समन्दर की नमी को इस इलाक़े मे पहुंचने से रोक देते हैं।दूसरे यह कि इस प्रायद्वीप के पड़ोसी मुल्कों मे पानी का भन्डार बहुत कम है, और अफ़रीक़ा और एशिया के इतने बड़े इलाक़े की गर्मी और ड्राईनेस को यहां होने वाली थोड़ी सी बरसात दूर नही कर सकती क्योंकि अरब मे हमेशा चलने वाली मौसमी गर्म हवाएं हिन्द महासागर के दक्खिनी इलाक़ों से उठते हुए मानसून को अरब सबकान्टीनेन्ट मे बरसने से रोक देती हैं।अरब सबकान्टीनेन्ट का विभाजनअरब और अजम के भूगोलविदों और जियोग्राफ़र्स ने अरब प्रायद्वीप को कभी मौसम या जलवायु और कभी ज़ात व नस्ल के आधार पर बांटा है और कुछ भूगोलविदों ने इसको निम्नलिखित तीन मुख्य इलाक़ों मे विभाजित किया है।1.केन्द्रीय भाग जिसका नाम “सहराएअरब” है।2.उत्तरी भाग जिसका नाम “हिजाज़” है।3.दक्खिनी भाग जो “यमन” के नाम से मशहूर है।मुक़तदिसी चौथी सदी ईसवी का मुसलमान स्कालर कहता है कि अरब मुल्क चार बड़े इलाक़ों मे बंटा हुआ है जिनके नाम हिजाज़, यमन, ओमान, और हजर हैं। लेकिन दूसरों का कहना है कि वह पांच हिससे हैं अर्थात तिहामा, हिजाज़, नजद, यमन और उरूज़।मौजूदा दौर मे इस प्रायद्वीप का एक दूसरा बंटवारा भी चलन मे है, यह बंटवारा ज़िन्दगी के उन हालात के आधार पर है जो इस इलाक़े के इंसानों, जानवरों और स्थानों पर असर डालते थे, और ये वहां के रहने वालों के निजी व सामूहिक ख़ासियतों और बदलावों में दिखाई दिए जो इसलाम के आने तक बाक़ी रहे, क्योंकि अरब प्रायद्वीप मे दो एक दूसरे के विरोधी भौगोलिक हालात मौजूद थे और वहां के सामूहिक हालात की निर्भरता पानी की मौजूदगी पर है और पानी का मौजूद होना या ना होना वहां की समाजी ज़िन्दगी पर सबसे अधिक असर डालता है और इसी आधार पर इसका दक्खिनी इलाक़ा अर्थात यमन इसके उत्तरी और केन्द्रीय इलाक़े से अलग हो जाता है। दक्खिनी अरब प्रायद्वीप (यमन) के हालात    अगर हम इस इलाक़े के नक़्शे पर निगाह डालें तो अरब प्रायद्वीप के पच्छिम उत्तर के अन्त मे एक इलाक़ा तिकोने आकार मे दिखाई देता है जिसके पूरब मे अरब सागर का साहिल और पच्छिम मे लालसागर का साहिल है और ज़ोहरान (जो कि पच्छिम मे स्थित है) से हज़्रमूत की वादी (जोकि पूरब मे स्थित है) तक खींची जाने वाली रेखा को तिकोन का तीसरा हिस्सा कहा जा सकता है। इस तिकोन के अन्दर जो इलाक़ा है इसको पुराने ज़माने से “यमन” कहा जाता है। इस इलाक़े मे पानी की बहुलता है और लगातार बरसात होने की वजह से खेती किसानी अच्छी होती है इसलिए यहां आबादी अधिक है। इस कारण यह इलाक़ा उत्तरी या केन्द्री अरब प्रायद्वीप से जलवायु और सामाजिक आधार पर अलग दिखाई देता है। जैसा कि हम जानते हैं कि एक बड़ी आबादी के लिए रहने व ज़िन्दगी गुज़ारने के लिए स्थाई आवास की ज़रूरत पड़ती है और इसी वजह से क़स्बे व शहर बनते हैं और लोग बड़ी संख्या मे वहां बस्ते हैं। और एक दूसरे से मिलते जुलते हैं जिसके नतीजे मे एक तन्त्र या सिस्टम की ज़रूरत पड़ती है इसलिए ज़रूरत के अनुसार एक क़ानून बनाया जाता है (चाहे यह शुरूवाती और आसान ही क्यों न हो) और यह बात साफ़ है की क़ानून के साथ हुकूमत या शासन का होना भी ज़रूरी है क्योंकि क़ानून की पाबन्दी बिना किसी हुकूमत के मुमकिन नही है। यही वजह है कि इस इलाक़े मे हज़रत मसीह के जन्म से सैकड़ों साल पहले ही हुकूमतें स्थापित हुई हैं और इनके माध्यम से सभ्यता और कल्चर का चलन हुआ। जो हुकूमतें इस इलाक़े मे स्थापित हुईं वह यह हैं,1.हुकूमते मुईन- यह हकूमत 1400 से 850 साल ईसा पूर्व तक मौजूद रही और हुकूमते सबा के अधिकार जमाने के बाद समाप्त हो गई।2.हुकूमते हज़रमूत- जो 1020 ईसा पूर्व शुरू हुई और 65 ईसवी के बाद बची रही और हुकूमते सबा के क़ब्ज़ा करने के साथ समाप्त हो गई।3.हुकूमते सबा- जो 850 ईसवी से लेकर 115 ईसापूर्व तक सत्ता मे रही और हुमैरी.सबा व रीदान के सत्तासीन होते ही बिखर गई।4. हुकूमते क़तयान जो 865 से लेकर 540 ईसापूर्व तक सत्तासीन रही और हुकूमतेसबा के आते ही मिट गई।5.हुकूमते सबा, रीदान, हज़रमूत और यमन के आसपास के बादशाहों के सिलसिले को “तबआ” कहा गया है और इनकी हुकूमत 115 साल ईसापूर्व से शुरू हुई और ईसवी के बाद 523 ईसवी तक बची रही और इसकी राजधानी ज़ेफ़ार थी।    यमन की चमकती सभ्यता और कल्चर को इतिहासकारों की सराहना मिली है, जैसा कि हुरविदत (पांचवीं सदी ईसा पूर्व का एक यूनानी इतिहासकार) हुकूमते सबा के काल मे इस इलाक़े के कल्चर और शानदार महलों और हीरे व जवाहरात से सजे हुए दरवाज़ों का बयान करते हुए कहता है कि इनमे सोने चान्दी के बर्तन और महंगी धातुओं से बने हुए बेड मौजूद थे। कुछ इतिहासकारों ने सना के शानदार महल (ग़मदान) का वर्णन किया है जो जो बीस मन्ज़िल का था जिसमे सौ कमरे थे और कमरों की दीवारें बीस हाथ लम्बी और सारी छतें आईने और शीशे से सजी हुई थीं।    सतराबून (रूस का मशहूर सैलानी) ने भी एक सदी ईसापूर्व इस इलाक़े का दौरा किया तो यहां की तहज़ीब के बारे मे हुरविदत की तरह अपने विचारों को सबके सामने रक्खा, उसने कहा, यह अनोखा शहर है जिसकी इमारतों की छतों को हीरे व जवाहरात से जड़ी हुई पटरियों से सजाया गया है। और वहां ऐसे सुन्दर बर्तन देखने को मिले जिनको देखकर इंसान हैरान रह जाए। इस्लामी इतिहासकारों और भूगोलविदों जैसे मसूदी और इब्ने रूस्ता (तीसरी सदी हिजरी के स्कालर्स मे से हैं) ने लोगों की इस्लाम के आने से पहले ख़ुशहाल ज़िन्दगी,इमारतों और आबादियों की विस्तार पूर्वक चर्चा की है।    उन्नीसवीं व बीसवीं सदी मे पुरातत्व विज्ञान के जानकारों की खोजों और इतिहास कारों की रिसर्च से इस इलाक़े का इतिहास सा


پیام رهبر انقلاب به مسلمانان جهان به مناسبت حج 1440 / 2019
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