‘अरब सबकान्टीनेंट की भौगोलिक,समाजिक और कल्चरल स्थिति

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कुल या गोत्र (नस्ब) का महत्वअनपढ़ अरबों के बीच महानता की मुख्य कसौटी उनका कुल(नस्ब) हुआ करता था जो उनकी निगाह मे बहुत महत्व रखता था यहाँतक कि बहुत सारी अच्छाईयां “कुल या नस्ब” के कारन हुआ करती थीं। क़बाएली अरबों में नस्ल के आधार पर घमण्ड बहुत अधिक पाया जाता था जिसका एक नमूना वह आपसी कंप्टीशंस हैं जो उत्तरी अरब और दक्खिनी अरब के बीच पाए जाते थे। इसी कारन वह लोग अपने कुल की पहचान और सुरक्षा को महत्व देते थे। नोमान बिन मन्ज़र, केसरा के जवाब में कहता है- अरब के अतिरिक्त कोई भी उम्मत अपने कुल को नही पहचानती है और अगर उनके पुरखों के बारे में पूछा जाए तो जवाब नही दे पाते हैं लेकिन हर अरब अपने पुरखों को पहचानता है और परायों को अपने क़बीले का हिस्सा नही मानता और स्वयं दूसरे क़बीले में शामिल नही होता और अपने बाप के अलावा दूसरों से रिश्ता नही जोड़ता।इस प्रकार यह आश्चर्य की बात नही है कि, कुल या नस्ब को पहचानने का इल्म उस वक़्त एक सीमित इल्म था जिसका बहुत महत्व था और इस इल्म के जानकारों को एक विशेष स्थान प्राप्त था। आलूसी जो कि अरब के मामलों का अच्छा जानकार है कहता है- अरब के जाहिल अपने कुल की पहचान और सुरक्षा को बहुत महत्व देते हैं क्योंकि यह पहचान मुहब्बत का एक माध्यम था वह और उनके यहां इसकी अधिक ज़रूरत पड़ती थी क्योंकि उनके क़बाएल बिखरे हुए होते थे और जंग की आग लगातार उनके बीच भड़की हुई थी और लूट मार उनके यहां आम थी। अरब क़बीले किसी ताक़त के अधीन नही रहना चाहते थे जो उनकी मदद करे इसलिए मजबूर होकर अपने कुल की रक्षा किया करते थे जिससे अपने दुश्मन पर कामयाब हो सकें क्योंकि रिश्तेदारों की आपसी मुहब्बत, सपोर्ट और दूसरों से भेदभाव की भावना अपने क़बीले की सहायता और आपसी मेलजोल का आधार बनती थी। इस्लाम हर प्रकार के घमण्ड और अपने आप को दूसरों से ऊंचा समझने की भावना का विरोध करता है, हम जानते हैं कि क़ुरान-ए-करीम क़ुरैश और अरबों के बीच अल्लाह ने भेजा था लेकिन इसका सम्बोधन केवल क़ुरैश या अरब नहीं हैं बल्कि इसका सम्बोधन पूरी इंसालियत है और इसमें मुसलमानों और मोमिनीन की ज़िम्मेदारियां और फ़र्ज़ बयान किए गए हैं। क़ुरान-ए-करीम क़ौमी भिन्नता को नेचुरल मानता है और इस भिन्नता की फ़िलास्फ़ी बताता है कि लोग एक दूसरे को पहचानें और ज़ात-पात या कुल के आधार पर घमण्ड करने की निन्दा करता है और बड़प्पन का पैमाना तक़वा (सदाचार) को बताता है।ऐ लोगों! हमने तुमको एक मर्द और एक औरत से पैदा किया है और फिर तुम में शाखाएं और क़बीले बनाए हैं जिससे कि आपस मे एक दूसरे को पहचान सको बेशक तुम में ख़ुदा के अनुसार अधिक इज़्ज़तदार वही है जो अधिक गुनाहों से बचने वाला है और अल्लाह हर चीज़ को जानने वाला है। पैग़म्बर-ए-इस्लाम ने नस्ली व ख़ानदानी घमण्ड व श्रेष्ठता का बहुत अधिक विरोध किया है। जिसके कुछ नमूने यह हैं-1.मक्के पर जीत के अवसर पर जब क़ुरैश का असली क़िला तबाह हो गया तो आप ने फ़रमाया- ऐ लोगों! ख़ुदावन्दे आलम ने इस्लाम के नूर के माध्यम से, जिहालत के ज़माने मे प्रचलित घमण्ड व अभिमान को समाप्त कर दिया। जान लो कि तुम आदम की नस्ल से हो और आदम मिट्टी से पैदा हुए हैं। ख़ुदा का सबसे अच्छा बन्दा वह है जो मुत्तक़ी (सदाचारी) हो किसी के बाप का अरबी होना कोई महत्व नही रखता, यह केवल ज़बानी बात है, किसी का कुल उसे सम्मानित नही बना सकता।2.हुज्जतुलविदा के अवसर पर एक पैग़म्बर-ए-इस्लाम (स) ने विस्तारपूर्वक अपने उपदेश मे फ़रमाया कोई अरबी अजमी पर श्रेष्ठता नही रखता केवल तक़वे (सदाचार) से ही आदमी सम्मानित कहलाता है।3.एक दिन आपने क़ुरैश के सम्बन्ध में बातचीत के दौरान , जनाब सलमान की बातों का समर्थन किया और क़ुरैश की ग़लत सोच के मुक़ाबले में रूहानी तरक़्की को आधार मानते हुए फ़रमाया, ऐ क़ुरैश! हर इंसान का दीन ही उसका कुल है और हर आदमी का एख़लाक़ और कैरेक्टर ही उसकी मर्दानगी है और हर एक की बुनियाद उसकी अक़्ल और समझदारी है।क़बाएली लड़ाईयांअगर अरबों के बीच किसी की हत्या हो जाती थी तो इसकी ज़िम्मेदारी हत्यारे के निकट सम्बन्धियों पर लागू होती थी और क्योंकि हत्यारे का क़बीला उसके समर्थन में तैयार और आतुर दिखाई देता था, इसलिए बदले के लिए लड़ाईयां होती थीं और बहुत ख़ून बहाया जाता था। और यह लड़ाईयां जो आमतौर पर छोटी छोती बातों पर होती थीं कई सालों तक चलती रहती थीं जैसा कि    “जंग बसूस” जोकि दो क़बीलों बनी बक्र और बनी तग़लब के बीच (यह दोनों क़बीले रबिया से थे) छिड़ी और चालीस साल तक जारी रही और इस लड़ाई की वजह यह थी कि पहले क़बीले का ऊंट जो कि बसूस नाम की औरत का था बनी तग़लब की चराहगाह मे चरने के लिए चला गया तो उसे उन लोगों ने मार डाला। इस प्रकार “दाहिस और ग़बरा नामी” दो ख़ूनी लड़ाईयां क़ैस बिन ज़हीर (क़बीलए बनी क़ैस का सरदार) और हज़ीफ़ा इब्ने बद्र (क़बीलए बनी फ़ज़ारह का सरदार) के बीच एक घुड़दौड़ के सम्बन्ध मे शुरू हुई और लम्बे समय तक चलती रही। दाहिस और ग़बरा नाम के दो घोड़े थे जिसमें से एक क़ैस का और दूसरा हज़ीफ़ा का था। क़ैस ने दावा किया कि उसका घोड़ा दौड़ मे जीता है और हज़ीफ़ा ने दावा किया कि उसका घोड़ा दौड़ मे बाज़ी ले गया है , इसी छोटी सी बात पर दोनों के बीच लड़ाई छिड़ गई और बहुत अधिक ख़ून बहाया गया और लोगों की जानें ली गईं। और इस प्रकार की घटनाएं “अय्यामुल अरब” के नाम से मशहूर हुईं और इनके बारे में किताबें लिखी गई हैं। कभी-कभी कुछ ऊंट मुआवज़े या क्षतिपूर्ति के रूप में देकर मरने वाले के परिवार से सुलह कर ली जाती थी। और हर क़बीले के बड़े बूढ़े इस तरह के विवाद मे रास्ता निकालते और उसको लोगों के सामने पेश करते थे लेकिन वह इसको क़ौम पर थोपते नही थे और अधिकतर क़बीले वाले इन सुझावों को उस समय स्वीकार करते थे जब लम्बी लड़ाईयों से थक जाते और निराश हो जाते थे और मजबूरी में इन सुझावों को स्वीकार कर लेते थे और सुलह कर लेते थे। अगर हत्यारों का गुट, दोषियों को बदले के लिए मारे गए इंसान के सगे सम्बन्धियों के हवाले कर देता तो यह लड़ाई न होती लेकिन उनकी निगाहों में ऐसा करना उनकी इज़्ज़त व सम्मान के ख़िलाफ़ था इसी आधार पर वह अपने लिए ठीक समझते थे कि दोषी को ख़ुद सज़ा दें। क्योंकि उनकी निगाह में इज़्ज़त और सम्मान की सुरक्षा सबसे अधिक ज़रूरी थी और वह अपने सभी कामों में इस बात का दिखावा किया करते थे। उनके बीच जो क़ानून और रिवाज चलन मे थे वह लगभग हिजाज़ के शहरों अर्थात ताएफ़, मक्का और मदीने में भी लागू होते थे। क्योंकि इन शहरों के बाशिन्दे भी अपने समाज में घुमन्तू क़बीलों के जैसे आज़ादी से रहते थे और किसी को फ़ालो नही करते थे। ख़ानाबदोश घुमक्कड़ों में भेदभाव और अपनी नाक ऊंची रखने की आदत हद से बढ़ी हुई थी लेकिन मक्के मे काबे के सम्मान और बिजनेस का केन्द्र होने की वजह से हालात इतने बुरे नही थे।क़ुरान-ए-करीम इस प्रकार के भेदभाव और बदले की भावना का विरोध करता है और मदद और समर्थन का पैमाना, सच्चाई और अदालत रखता है और ज़ोर देता है कि मुसलमानों को चाहिए कि वे वह अदालत और न्याय को पूरी ताक़त से स्थापित करें चाहे यह न्याय या अदालत माता पिता और रिश्तेदारों के ख़िलाफ़ ही क्यों न हो।ऐ ईमान वालों! न्याय और इंसाफ़ के साथ खड़े हो जाओ और अल्लाह के लिए गवाही दो चाहे अपनी आत्मा या अपने मांबाप और रिश्तेदारों के ख़िलाफ़ ही क्यों न हो। जिसके लिए गवाही देना है वह अमीर हो या ग़रीब अल्लाह दोनों के समर्थन का तुमसे अधिक अधिकारी है इसलिए ख़बरदार! इच्छाओं के आगे सर न झुकाना जिससे कि इंस


پیام رهبر انقلاب به مسلمانان جهان به مناسبت حج 1440 / 2019
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