रमज़ानुल मुबारक-३

  • News Code : 440364
  • Source : विलायत डाट इन
Brief

रमज़ानुल मुबारक दुआ मांगने का महीना है इंसान का अपने गुनाहों के माफ करवाने का महीना है, रसूले इस्लाम स.अ ने फरमायाः रमज़ान वह महीना है जिसकी शुरुआत रहमत, बीच के दिन मग़फिरत और गुनाहों की माफ़ी और आखिरी दिन जहन्नम की आग से आज़ादी के दिन हैं।

रमज़ानुल मुबारक दुआ मांगने का महीना है इंसान का अपने गुनाहों के माफ करवाने का महीना है, रसूले इस्लाम स.अ ने फरमायाः रमज़ान वह महीना है जिसकी शुरुआत रहमत, बीच के दिन मग़फिरत और गुनाहों की माफ़ी और आखिरी दिन जहन्नम की आग से आज़ादी के दिन हैं।रमज़ान के इस पाक महीने में आइए हम क़ुरआन के सूरे हम्द की छठी और सूरए बक़रह की आयत नंबर २८६ के शब्दों में अल्लाह से दुआ करें- ऐ अल्लाह सीधे रास्ते पर हमारा मार्गदर्शन कर। ऐ परवरदिगार, अगर हम भूल गए हैं या हमने ग़लत क़दम उठाए हैं तो हमसे पूछताछ न कर।हमारे लिए सख़्त ज़िम्मेदारी तय न कर, जैसा कि गुनाह और उग्रता के कारण तूने हमसे पहले वाले लोगों के लिए निर्धारित किये थे। ऐ परवरदिगार, जिस चीज़ को हम सहन नहीं कर सकते उसे हमारे लिए निर्धारित न कर। गुनाह के प्रभावों को हमसे दूर कर दे और हमें माफ़ कर दे और हमें अपनी रहमत का पात्र बना। तू हमारा परवरदिगार है इसलिये हमें काफ़िरों पर विजयी बना।रोज़े के जिस्म और रूह पर पड़ने वाले फ़ायदेमंद प्रभावों के अतिरिक्त इंसानी समाज पर भी इसके अनेक सकारात्मक प्रभाव देखने में आते हैं। इन प्रभावों में से एक, इंसानी भावनाओं का बेदार होना है। रोज़े के आधार पर इंसान को भूखों और ग़रीबों के दुख-दर्द का एहसास होता है। भूख और प्यास सहन करके बड़ी आसानी से समझा जा सकता है कि समाज के ग़रीब और बेसहारा लोगों पर क्या बीतती है और इस तरह उसमें दीन-दुखियों की मदद की भावना भी पैदा हो सकती है। यही कारण है कि रमज़ान के पाक महीने में मुस्लिम समाजों में दीन-दुखियों की मदद बहुत ज़्यादा देखने में आती है। एक धनवान और समझदार रोज़ा रखने वाला इंसान यह भी सोचता है कि समाज का यह वंचित और ग़रीब वर्ग जो अपनी सहनशीलता और सज्जनता के कारण ज़रूरत होते हुए भी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाता तो अल्लाह की निगाह में वह कितना महत्वपूर्ण है और अगर किसी कारणवश इसे अपने आत्मसम्मान को किनारे लगाकर हाथ फैलाने पड़ जाएं तो अल्लाह हमसे कितना नाराज़ होगा कि हमने समय रहते उसकी मदद क्यों नहीं की? समाज के वंचित और ग़रीब वर्ग की मदद की भावना इस्लामी समाज के वातावरण को मुहब्बत और कृपा से मालामाल कर देती है।सामाजिक समरस्ता और एकता की भावना पैदा करना भी रमज़ान महीने के प्रभावों में से एक है। इस्लाम की निगाह में अल्लाह की कुरबत और उसकी इबादत केवल नमाज़ और रोज़े में निहित नहीं है बल्कि इसके साथ-साथ सामाजिक ज़िम्मेदारियों को पूरा करना और अल्लाह के बंदों की सेवा तथा उनकी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए कोशिश करना भी बहुत ज़्यादा ज़रूरी है। रमज़ानुल मुबारक की हर दिन से ख़ास दुआ में भी दुखी, ग़रीब और ज़िंदगी की कठिनाइयों से जूझते लोगों की मदद पर ख़ास ध्यान दिया गया है।इंसान पर अल्लाह की एक महान अनुकंपा, बात करने की क्षमता है। इंसान शब्दों की मदद से अपनी भावनाओं और उद्देश्यों को बयान कर सकता है। क़ुरआने करीम की आयतों में आया है कि बात करने की क्षमता व ताक़त, अल्लाह द्वारा प्रदान की गई एक महान विशेषता है और इसको अमली बनाने के लिए विभिन्न भावनाओं और शब्दावलियों ने जन्म लिया है। अब हम देखेंगे कि क़ुरआने करीम ने इंसानों के बीच प्रभावी संपर्क पैदा करने के लिए किस तरह की कारकर्दगी की बात की है कि उसकी मदद से इंसान अपने उद्देश्य तक आसानी से पहुंच सकता है अर्थात अपना संदेश पूरी तरह से दूसरों तक पहुंचा सकता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि किस तरह बात की जाए? क़ुरआने करीम की निगाह में वह संपर्क स्वस्थ्य और सार्थक होता है जिसमें एक दूसरे के व्यक्तित्तव का आदर किया जाए, भावनाओं को महत्व दिया जाए और परस्पर सम्मान को निरंतर मद्देनज़र रखा जाए। ज़ाहिर सी बात है कि जब बात करने वाला पक्ष, बुरे और अप्रशंसनीय शब्दों से किसी को संबोधित करेगा तो उस इंसान पर न केवल यह कि कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा बल्कि संबन्धों के टूटने की स्थिति भी पैदा हो जाएगी। अगरचे लोगों के बीच संपर्क कृपा और सम्मान तथा घृणा और अपमान के आधार पर बनते हैं लेकिन इंसान की फ़ितरत बुरे शब्दों को पसंद नहीं करती बल्कि उसका झुकाव भले और ख़ूबसूरत शब्दों की ओर होता है। यही कारण है कि अल्लाह अपनी पाक किताब क़ुरआन के सूरए बक़रह की आयत नंबर ८३ में कहता है, "लोगों से भली बात करो"एक दूसरे स्थान पर क़ुरआने करीम स्पष्ट शब्दों में अपने मानने वालों से कहता है कि वह लोग जो अल्लाह के स्थान पर किसी और को पुकारते हैं उन्हें भी बुरा भला न कहो। (क्योंकि इस तरह) कहीं वह भी अत्याचार और जेहालत के आधार पर अल्लाह के लिए बुरा भला इस्तेमाल न करने लगें। इंसान की मार्गदर्शक किताब क़ुरआन, लोगों को बुरा भला इस्तेमाल करने और बुरी बातें करने से रोकते हुए सूरए इस्रा की ५३वीं आयत में कहती है कि "मेरे बंदों से कहो अच्छी बातें करें क्योंकि शैतान बुरे शब्दों द्वारा उनके बीच लड़ाई-झगड़े फैलाता है। शैतान हमेशा ही इंसान का खुला हुआ दुश्मन रहा है।हमारे समाज में ज़्यादातर गुनाहों की ज़िम्मेदार ज़बान होती है। कभी किसी के लिए अपमान जनक शब्द कहकर उसकी भावनाओं को उत्तेजित कर देती है जिससे लड़ाई-झगड़े ही नहीं बल्कि हत्याएं तक हो जाती हैं। कभी ऐसे कड़े और सख़्त शब्दों का दूसरों के लिए इस्तेमाल किया जाता है कि उसके दिल पर तलवार से ज़्यादा गहरा घाव लग जाता है। पीठ पीछे बुराई करके तो लोगों पर आरोप लगाना और उनके कैरेक्टर को गिराना तो समाज की दिनचर्या बन गया है। रमज़ान के महीने में लोगों को ऐसी बातों से बचने के लिए इस सीमा तक ज़ोर दिया गया है कि अगर कोई इंसान रोज़ा रखकर इस तरह की बातें करता है तो उसका रोज़ा, रोज़ा ही नहीं है।इस महीने में, एक महीने तक खाने-पीने से दूरी के अतिरिक्त ज़बान पर कंट्रोल रखने पर ज़ोर देकर इंसान को इस बात की ट्रेनिंग दी जाती है कि वह बाक़ी ग्यारह महीनों में किस तरह ज़िंदगी बिताए और अपनी बुरी आदतों को छोड़कर किस तरह समाज में अच्छे संबन्ध स्थापित करे। इस महीने में रोज़े की हालत में सोने को शायद इसलिए भी सवाब और इबादत कहा गया है क्योंकि सोया हुआ इंसान अपनी ज़बान, कान और आंखों को गुनाहों और बुराइयों से दूर रखता है।


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