सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह ख़ामेनाई के बयान की रौशनी में

मौसम ख़ुद को बनाने का

  • News Code : 439965
  • Source : विलायत डाट इन
Brief

हमारी मिसाल कच्चे माल (raw material) जैसी है, अगर हमनें इस पर काम किया और उसे एक शक्ल में बदला और कोई काम की चीज़ बनाई तो फिर हम सफल हैं, हमारी ज़िन्दगी का अस्ली मक़सद भी यही है।

कच्चे माल जैसेहमारी मिसाल कच्चे माल (raw material) जैसी है, अगर हमनें इस पर काम किया और उसे एक शक्ल में बदला और कोई काम की चीज़ बनाई तो फिर हम सफल हैं, हमारी ज़िन्दगी का अस्ली मक़सद भी यही है। अफ़सोस है उन लोगों पर जो इस दुनिया में आने के बाद ख़ुद को बनाते नहीं हैं, न इल्म के लेहाज़ से उनमें कोई बदलाव आता है और न अमल के लेहाज़ से बदलाव, दुनिया की रंगीनियों में इतना खो जाते हैं कि ख़ुद को बनाने के बजाए पहले से ज़्यादा बिगाड़ते हैं और इसी तरह दुनिया से चले जाते हैं। मोमिन के लिये ज़रूरी है कि हमेशा ख़ुद को बनाने की कोशिश में लगा रहे, शायद कोई यह सोचे कि हमेशा ख़ुद को बनाने का मतलब है, क्या ऐसा हो सकता है कि इन्सान हर समय ख़ुद को बनाने ही में लगा रहे, जी हाँ सम्भव भी है और ज़रूरी भी है, ख़ुदा तक पहुँचने के लिये हमें जिस रास्ते पर चलना है वह कभी ख़त्म नहीं होता इसलिये हमेशा आगे बढ़ते रहना है, इन्सान को हमेशा इस बात का ध्यान रखना है कि कोई ऐसा काम न करे जो उसकी मेहनत को बर्बाद कर दे। इसी लिये (बालिग़ होने के बाद) नमाज़ किसी भी सूरत में और किसी भी उम्र में माफ़ नहीं है, मोमिन को हर रोज़, हर महीने, हर साल, ज़िन्दगी की आख़िरी साँस तक नमाज़ पढ़नी है-’’اِیَّاکَ نَعبُدُ وَاِیَّاکَ نَستَعِینَ‘‘कहना है, रुकू करना है, सजदा करना है, तसबीह करनी है, ख़ुदा की हम्द करनी है। हालांकि इस रास्ते में बहुत सी समस्याएं भी हैं, ज़िन्दगी की समस्याएं, काम काज की समस्याएं, रोज़ी रोटी की समस्याएं, निजी कामों की समस्याएं, बीवी बच्चों की समस्याएं और इस तरह की बहुत सी समस्याएं हैं जिनकी वजह से हम ख़ुद को भूल जाते हैं और इस तरह ख़ुद को टाइम नहीं दे पाते जिस तरह देना चाहिये। इसलिये रमज़ान का यह मुबारक महीना बहुत अच्छा अवसर है जिसे हमें गंवाना नहीं चाहिये। अगर हम पूरे साल ख़ुद को टाईम नहीं दे सकते और ख़ुद को नहीं बना सकते तो कम से कम इस महीने में तो कर सकते हैं।रोज़ा एक नेमत और तौफ़ीक़इस महीने में बहुत सी चीज़ों की बरकत से हम ऐसा कर सकते हैं जिनमें से एक यही रोज़ा है जिसे इस महीने में वाजिब किया गया है। यह ख़ुदा की एक बहुत बड़ी तौफ़ीक़ है। तौफ़ीक़ किसे कहते हैं? तौफ़ीक़ यानी यह कि ख़ुदा इन्सान को अवसर दे। ख़ुदा नें रोज़े को वाजिब कर के हमें अवसर दिया है कि थोड़ा बहुत टाईम ख़ुद को भी दे। ख़ुदा नें रोज़े को वाजिब कर के हमें अवसर दिया है कि थोड़ा बहुत टाईम ख़ुद को भी दें। रोज़ा एक बड़ी नेमत है। भूख और प्यास से लड़ना, अपनी इच्छाओं से लड़ना, वह चीज़ें जो ख़ुदा नें हलाल की हैं, हम ख़ुद को उनसे रोकते हैं। बहुत से काम जिनके करने को जी मचलता है, नहीं करते। बहुत सी इच्छाओं का गला घोंटते हैं, यह एक जेहाद है।अपने डाक्टर आप बनेंरमज़ान के महीने को ख़ुदा नें ख़ास महीना बनाया है, इस में कुछ ख़ास चीज़ें और ख़ास बातें हैं। इसकी कुछ ख़ास विशेषताएं हैं। उसकी हर चीज़ में बरकत है। इसके दिन, इसकी रातें, इसके घण्टे, इसकी हर घड़ी, इसमें ज़िक्र करना, थोड़ा सा सदक़ा देना, कोई नेक काम करना, सब में बरकत है। दूसरे दिनों में एक नेक काम के लिये जो सवाब है उसमें वह हज़ार गुना हो जाता है।जब किसी डाक्टर के पास की ऐसा बीमार आता है जिसको एक साथ कई बीमारियां हों तो वह क्या करता है? पहले वह उसकी सारी बीमारियों का पता लगाता है और एक एक कर के उसकी सारी बीमारियों की लिस्ट बनाता है क्योंकि अगर वह ऐसा न करे तो सम्भव है एक बीमारी के लिये उसनें जो दवाई लिखी है वह दूसरी बीमारी के लिये ख़तरनाक हो, इस तरह वह ठीक होने के बजाए और ज़्यादा बीमार हो जाएगा, इसलिये वह पहले सारी बीमारियों की खोज करेगा और उसके बाद जो बीमारी सबसे ज़्यादा ख़तरनाक हो और दूसरी चीज़ों पर उसका असर ज़्यादा हो, उसका इलाज पहले करेगा। इस तरह एक एक कर उसकी सारी बीमारियों को ठीक करेगा।जिस्म और बदन की बीमारियों के अलावा बहुत सी बीमारियाँ ऐसी हैं जिनका सम्बंध जिस्म से नहीं बल्कि रूह और आत्मा से होता है। उन बीमारियों का डाक्टर हमें ख़ुद बनना है। हमारी बीमारियों के बारे में हमसे ज़्यादा कोई नहीं जानता। बहुत सी बीमारियां ऐसी हैं जो मुझसे जोड़ी जाएं तो मुझे बुरा लगेगा। जैसे अगर कोई मुझसे यह कहे कि आपके अन्दर हसद है, तो मुझे बुरा लगेगा। क्या कोई यह बर्दाश्त कर सकता है कि उसे हासिद (jealous) कहा जाए? वह नाराज़ होगा और उलटा जवाब देगा- तुम ख़ुद होगे। हम कभी इस बात पर तैयार नहीं होते कि कोई दूसरा हमें बीमार कहे लेकिन अगर हम ख़ुद अपने गरेबान में झांकें तो हमें पता चलेगा कि हमारे अन्दर इस तरह की बहुत सी बीमारियां हैं। इन्सान दूसरों से यह बीमारियां छिपा सकता है लेकिन ख़ुद से तो नहीं छिपा सकता, इस लिये उन बीमारियों को हमसे ज़्यादा अच्छी तरह से कोई नहीं जान सकता। आइये, काग़ज़ उठाएं और लिखना शुरू कीजिए- हसद, कंजूसी, दूसरे के लिये बुरा सोचना, सुस्ती, ज़िम्मेदारियों से भागना, ख़ुद को चाहना, दूसरों से नफ़रत और इस तरह की दूसरी बीमारियां। इस तरह की जितनी बीमारियां हैं काग़ज़ पर लिखिये और रमज़ान के महीने में एक एक कर के इन्हें कम करने की कोशिश करें। अगर हम नें इन्हें यूँ ही छोड़ दिया तो यह हमें बर्बाद कर देंगी। अगर हमसे कहा जाए कि आपको कोई ख़तरनाक बीमारियां हैं तो हमारा क्या हाल होता है? हमारे होश उड़ जाते हैं, रातों को नींद नहीं आती। सबसे अच्छे डाक्टर के पास जाते हैं ताकि उससे छुटकारा मिले। अगर यह बीमारी ठीक नहीं होगी तो क्या होगा, ज़्यादा से ज़्यादा अपनी ज़िन्दगी से हाथ धो बैठेंगे, जबकि मालूम है एक दिन जाना ही है लेकिन फिर भी हम बीमारियों से डरते हैं। लेकिन रूहानी बीमारियों का क्या नुक़सान है, इन्सान हमेशा के लिये ख़ुदा के अज़ाब में फँस जाएगा। उन सारी नेमतों से महरूम हो जाएगा जो ख़ुदा नें इन्सान के लिये रखी हैं। क़यामत में हम देखेंगे बहुत से वह लोग जिन्हें हम जानते और पहचानते हैं उन्हें बहुत से अच्छे कामों के कारण जन्नत मिलेगी, सारी नेमतें मिलेंगी, अज़ाब से बच जाएंगे लेकिन हम सुस्ती के कारण, ख़ुद को न बनाने के कारण और न बीमारियों का इलाज न करने के कारण उन सब चीज़ों से महरूम हैं जो दूसरों को मिली हैं। उस समय अफ़सोस करने का भी कोई फ़ायदा नहीं होगा। यह रूहानी मौत है।ख़ुद को बनाने के लिये हमें की काम करने हैं-सबसे पहला क़दम- ख़ुलूस (शुद्धता)ख़ुद को बनाने के लिये सबसे पहला और महत्वपूर्ण क़दम ख़ुलूस है। ख़ुलूस यानी हर काम ख़ुदा के लिये हो, शुद्ध हो, उसमें मिलावट न हो। कभी हम मिलावट वाली इबादत करते हैं उसका कोई फ़ायदा नहीं है। इबादत और अमल ख़ालिस होना चाहिये यानी ख़ुदा के लिये होना चाहिये। हम जब कोई अच्छा काम करते हैं तो उसे सबसे कहते हैं जबकि ऐसा नहीं करना चाहिये, अगर हम कोई अच्छा काम करना चाहते हैं या हमनें कोई नेक काम किया है तो उसे दूसरे से नहीं कहना चाहिये (हाँ कुछ काम ऐसे हैं जिन्हें सब के सामने करना चाहिये) कुछ हदीसों में आया है कि जो सदक़ा छिपा कर दिया जाए जितना उसका सवाब है उतना सवाब उस सदक़े का नहीं है जो दूसरों के सामने दिया गया हो। बहुत सी इबादतें जो मिलकर की जाती हैं और जमात के साथ की जाती हैं उन सब के साथ और सबके सामने करनी चाहिये। लेकिन अकसर नेक काम जैसे ज़िक्र, दुआ, नाफ़ेला नमाज़ें, रातों को इबादत करना, किसी की मदद करना और इस तरह के दूसरे काम ख़ुदा और इन्सान के बीच होने चाहिये। कभी कोई नेक काम यह सोचकर नहीं करना चाहिये कि दूसरे भी देखें, जो काम दूसरों को दिखाने के लिये किया जाए वह न करने से भी बुरा है क्योंकि उस काम में शिर्क किया गया और जिस काम में शिर्क हो वह हराम है और ख़ुदा उसे दूर करने व


پیام رهبر انقلاب به مسلمانان جهان به مناسبت حج 1440 / 2019
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