इस्लाम में आज़ादी 4

  • News Code : 420203
  • Source : विलायत डाट इन
Brief

एक दूसरा संदेह यह पैदा किया जाता है कि इंसान क़ुरआन के अनुसार इलाही प्रतिनिधि है और इसका मतलब यह हैं कि इंसान ज़मीन पर अल्लाह तआला का उत्तराधिकारी है और अल्लाह तआला की तरह काम करता है जिस तरह अल्लाह तआला ने इस दुनिया को पैदा किया है उसी

एक दूसरा संदेह यह पैदा किया जाता है कि इंसान क़ुरआन के अनुसार इलाही प्रतिनिधि है और इसका मतलब यह हैं कि इंसान ज़मीन पर अल्लाह तआला का उत्तराधिकारी है और अल्लाह तआला की तरह काम करता है जिस तरह अल्लाह तआला ने इस दुनिया को पैदा किया है उसी तरह इंसान की भी ज़िम्मेदारी है कि बहुत सी चीज़ों को पैदा करे और जिस तरह अल्लाह तआला अपनी इच्छा के अनुसार काम करता है इंसान भी कि दुनिया जिसके अधिकार में है , अपनी इच्छा के अनुसार काम करेंइस संदेह का उत्तरइस बारे में अल्लाह तआला फ़रमाता हैःयाद कीजिए उस समय को जब आपके प्रतिपालक व मालिक ने फ़रिश्तों से कहा कि में ज़मीन पर अपना उत्तराधिकारी  बनाने वाला हूँ तो उस समय फ़रिश्तों ने कहा कि क्या तू  ऐसे को अपना उत्तराधिकारी और प्रतिनिधि बनाएगा जो ज़मीन पर खून बहाए और अशांति  व  उपद्रव करे , हम तेरी ही तस्बीह करते हैं , उस समय अल्लाह तआला ने कहा कि जो मैं जानता हूँ वह तुम नहीं जानते।यह पद सारी आदम अ. की संतानों के लिए नहीं है क्यों कि क़ुरआन आदम अ. की संतानों में से कुछ को शैतान कहता है और फ़रमाता है।और ऐ रसूल जिस तरह यह नास्तिक तुम्हारे दुश्मन हैं उसी तरह मानो हमने स्वंय परिक्षा के लिए उपद्रवी आदमियों और दानवों को हर पैग़म्बर का दुश्मन बनाया, इस में कोई शक नहीं के शैतान उन इंसानों में नहीं है कि जिनको फ़रिश्तें सज्दा करते हैं इस अवसर पर अल्लाह तआला फ़रमाता हैऔर ऐ रसूल वह समय याद करो जब तुम्हारे प्रतिपालक व मालिक ने फ़रिश्तों से कहा कि में एक आदमी को गुंधी हुई मिट्टी से जो सूख कर खन खन बोलने लगी , पैदा करने वाला हूँ तो जिस समय में इसको हर तरह से बना लूँ और इसमें अपनी ओर से आत्मा फूक दूँ तो सब के सब इसके सामने सज्दे में गिर पड़ना।इलाही प्रतिनिधि होने के लिए बहुत सी महत्वपूर्ण विशेषताएं हैं जिनमें से कुछ विशेषताएं नीचे बयान की जा रही हैं।1- असमाँ का इल्मऔर आदम को सारे असमाँ का इल्म दे दिया।2-अल्लाह का उत्तराधिकारी ज़मीन पर न्याय  व  इंसाफ़ को लागू करने की क्षमता रखता हो, इसलिए वह इंसान जिसकी आदत हत्या, विनाश और खून बहाना हो और किसी तरह  के अत्याचार करने से न घबराता हो वह इलाही प्रतिनिधि नहीं हो सकता नऊज़ुल बिल्लाह क्या अल्लाह तआला अत्याचारी है कि उसका उत्तराधिकारी भी अत्याचारी हो? अल्लाह तआला का उत्तराधिकारी वह है जो अपने निजी और समाजी ज़िंदगी में इलाही गुणों को ज़ाहिर करे, न यह कि जो दो पैरों से चलता हो वह इलाही प्रतिनिधि हैं इसलिए जो इंसान पब्लिक को गुमराह करने और इस्लामी हुकूमत को बर्बाद करने में लगा हो वह न यह कि सर्वोत्तम मख़लूक़ नहीं हैं, बल्कि इंसानी रूप में शैतान हैं , जिनको अल्लाह तआला जानवरों से भी बदतर कहता हैं इन लोगों के बारे में अल्लाह फ़रमाता हैइस में शंका नहीं कि ज़मीन पर चलने वाले सभी प्राणियों में सब से बदतर अल्लाह तआला के नज़दीक वह बहरे और गूँगे नास्तिक हैं जो कुछ नहीं समझते।संदेह पैदा करने वाले का कहना है क्यों कि इंसान की महानता और महत्ता का सम्बंध उसके व्यवहार व कैरेक्टर से है और जो चीज़ भी इंसान की आज़ादी में रुकावट का कारण हो वह क़बूल करने योग्य नहीं हैं यह एक धोखा देने वाला नारा है , जो पश्चिम की ज़मीन पर लगाया जाता है और दूसरे मुल्कों में भी इसे क़बूल किया जाता है जब कि उसकी निशानियों पर ध्यान नही दिया जाता केवल नारेबाज़ी पर ज़ोर दिया जाता है, निःसंदेह इस नारे के जवाब में जिसमें बहुत से टार्गेट और मक़सद छुपे हैं एक विस्तार पूर्वक चर्चा की ज़रूरत है और अगर अल्लाह तआला ने चाहा तो बाद में इस बारे में चर्चा की जाएगी। लेकिन इस समय सारांशिक रूप से यह सवाल करते हैं कि क्या इंसान के लिए कोई भी क़ानून ज़रूरी नहीं है?इसको कोई भी अक़्लमंद इंसान क़बूल नहीं कर सकता, क्यों कि इसका मतलब यह है कि इंसान हर काम में आज़ाद है और जो आज़ाद है वह किसी की हत्या भी कर सकता है, किसी का बलात्कार भी कर सकता है ,पब्लिक में अशांति और आतंक भी फैला सकता हैं इस में कोई शंका नहीं कि सबसे ज़्यादा नुक़सान ख़ुद यह दृष्टिकोण रखने वाले को पहुँच सकती हैं क्या  ऐसी आज़ादी रखने वालों के बीच ज़िंदगी गुज़ारी जा सकती है इसलिए नतीजा यह निकला कि इंसान की आज़ादी की कोई हद नहीं है जबकि इंसान ऐसा आज़ाद प्राणी नहीं है कि जो भी चाहे उसे अंजाम दे  जबकि साबित हो चुका है कि आज़ादी सीमित और अनुबंधित है तो अब सवाल यह पैदा होता है कि आज़ादी की सीमाओं को कौन तय करेगा? और आज़ादी की हद कहाँ तक हैं?अगर यह तय हो कि हर इंसान आज़ादी के एरिया को ख़ुद तय करेगा तो इसका नतीजे भी आपके सामने है कि हर इंसान अपनी इच्छा से काम करेगा। यहां पर वही संदेह पैदा होता है कि जो निरंकुश आज़ादी के संदर्भ में पैदा होता है इसलिए वाजिब है कि आज़ादी के एरिया को तय करने के लिए एक क़ानूनी सेंटर हों इस सूरत में अगर कोई क़बूल करता है कि अल्लाह तआला है और इंसान के फ़ायदा और नुक़सान को अल्लाह तआला उससे बेहतर जानता है और इंसान के ज़िंदगी से अल्लाह तआला को कोई फ़ायदा नहीं पहुँचता है और वह तो केवल अपने भक्तों की भलाई चाहता है तो  ऐसे इंसान के लिए आज़ादी की हद को बयान करने के लिए अल्लाह तआला के अलावा दूसरा कौन हो सकता है नतीजा यह निकला कि मुसलमानों की सैद्धांतिक और विचारजनक समस्याओं में कोई टकराव नहीं है क्यों कि मुसलमान उस अल्लाह को मानते हैं जो कि इंसान के फ़ायदे और नुक़सान को उससे बेहतर समझता हैं वह उत्तम रूप से जानता है कि इंसान की भलाई किस चीज़ में है इसलिए वह इस आज़ादी की हद को बयान करता है , लेकिन अगर कोई अल्लाह तआला पर यक़ीन न रखता हो या अगर अल्लाह तआला पर यक़ीन तो हो लेकिन इसको आज़ादी का एरिया तय करने वाला न माने और यह कहे कि इंसान ख़ुद आज़ादी की सीमा को तय कर सकता है तो  ऐसी सूरत में हज़ारों कठिनाईयों में पड़ जाएगा क्यों कि सारे इंसान एक दृष्टिकोण पर सहमत नहीं हो पाएंगे और अगर अधिकांश लोगों ने आज़ादी के एरिये को तय किया और अल्पसंख्यक ने इसको क़बूल न किया तो वह किस तरह अपने अधिकार तक पहुँच सकते हैं इसलिए मानना पड़ेगा कि हालांकि आज़ादी एक सुंदर और दिल को लुभाने वाला शब्द है, लेकिन निरपेक्ष और असीमित नहीं है , इस लिए कि कोई भी निरपेक्ष और असीमित आज़ादी को क़बूल नहीं कर सकता।


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