ईरान का इस्लामी इंक़ेलाब सुप्रीम लीडर की ज़बानी

  • News Code : 390374
  • Source : विलायत डाट इन
ईरान के इस्लामी इंक़ेलाब के सुप्रीम लीडर हज़रत आयतुल्लाहिल उज़्मा ख़ामेनई ने 14 जनवरी 1984 को इस्लामी इंक़ेलाब की सालगिरह के दस दिवसीय समारोह "अशरए फ़ज्र" के दिनों में एक प्रेस रिपोर्टर को इंटरव्यू देते हुए इस्लामी इंक़ेलाब की कामयाबी के दिनों की यादों का ताजा करते हुए कहा:
ईरान के इस्लामी इंक़ेलाब के सुप्रीम लीडर हज़रत आयतुल्लाहिल उज़्मा ख़ामेनई ने 14 जनवरी 1984 को इस्लामी इंक़ेलाब की सालगिरह के दस दिवसीय समारोह "अशरए फ़ज्र" के दिनों में एक प्रेस रिपोर्टर को इंटरव्यू देते हुए इस्लामी इंक़ेलाब की कामयाबी के दिनों की यादों का ताजा करते हुए कहा:
मैं एक दिलचस्प बात बताऊं आपको सुनकर आश्चर्य होगा:
22 बेहमन (इस्लामी इंक़ेलाब की कामयाबी का दिन) के कुछ दिन गुजरने के बाद इस सोच में था कि क्या मैं सो रहा हूँ या जाग रहा हूँ और मैं कोशिश कर रहा था कि अगर सो रहा हूँ तो उठ जाऊँ। एक ऐसे सुखद सपने की तरह जिसे इंसान चाहता है कि देखता रहे अगर जग गया तो वह दृश्य नहीं देख
पाएगा। यह मुद्दा इतना ज़्यादा आश्चर्यजनक था।

शुक्र का सज्दा
उस समय जब रेडियो ने पहली बार कहा, इस्लामी इंक़ेलाब की आवाज़, तो मैं गाड़ी में था कारखाने से इमाम ख़ुमैनी र.ह. के घर की तरफ़ जा रहा था, एक कारख़ाना था जिसमें कुछ उपद्रवी लोग जमा थे और वहाँ एक हंगामा खड़ा कर रखा था, इंक़ेलाब के शुरुआती दिन थे शायद सत्तरहवाँ अठ्ठारहवाँ दिन था, समस्याएं बहुत ज़्यादा थीं। अभी कोई भी काम अंजाम नहीं पाया था। कुछ ब्लैकमेल करने वाले लोग वहां कारखाने में जमा थे और कुछ हंगामा खड़ा करने जा रहे थे, हम वहाँ गए ताकि उन्हें समझा बुझा कर इधर उधर करें। तो वापसी में गाड़ी में था ड्राइवर ने रेडियो चलाया तो एक बार 'इस्लामी इंक़ेलाब की आवाज़' रेडियो से सुनाई दी। मैंने तुरंत गाड़ी को रुकवाया और नीचे उतर कर शुक्र का सज्दा किया। यानी इतना ज़्यादा हमारे लिए या मुद्दा अविश्वसनीय था। उस समय का हर पल एक यादगार है जैसे अगर मैं चाहूँ कि इंक़ेलाब के पहले बीस दिनों की यादों को बयान करूँ तो मैं बयान नहीं कर पाऊँगा, इस एहसास को बयान नहीं कर सकूँगा जो एहसास उन दिनों हमारे वुजूद में पाया जाता था।

इमाम ख़ुमैनी र.ह का ईरान आना
जिस दिन इमाम ख़ुमैनी र.ह को आना था हम युनिवर्सिटी में बंद थे हम वहाँ से निकले और रास्ते में गाड़ी में लोग खुश हो रहे थे हंस रहे थे लेकिन मैं इमाम ख़ुमैनी को लेकर परेशान था कि कभी कोई बुरी दुर्घटना उनके साथ न घट जाए इसलिए कि कुछ लोगों ने धमकी दी थी इसलिए मेरी आंखों से आंसू जारी थे।
हम एयरपोर्ट में दाखिल हुए इमाम ख़ुमैनी उस महान ऐतिहासिक स्वागत के साथ ईरान में दाखिल हुए जब इमाम ख़ुमैनी को मैंने आराम व सुकून के साथ आते हुए देख लिया तो मैं भी संतुष्ट हो गया और मेरी चिन्ता भी समाप्त हो गई और शायद बहुत सारे दूसरे लोग जो परेशान थे संतुष्ट हो गए होंगे।
कई साल बाद भी जब इमाम की ज़ियारत करता था तो वह क्षण मेरी आँखों के सामने रूक जाते थे।
जब एयरपोर्ट से शहर में दाखिल हुए तो वह कैसा दृश्य था जो सबको याद होगा कोई भी उसे भूल नहीं सकता है फिर बहिशते ज़हरा में गए और इमाम ख़ुमैनी के भाषण के बाद आकाए नातिक़ नूरी उन्हें आराम करने के लिए एक नामालूम जगह ले गए क्योंकि इमाम ख़ुमैनी पिछली रात से लगातार जाग रहे थे उन्होंने बिल्कुल भी आराम नहीं किया था।

इमाम मदरस-ए-रेफ़ाह में
हम मदरसा-एःरेफ़ाह में कुछ मैनेजमेंट के मक़सद से पहले से गए हुए थे इमाम ख़ुमैनी के आने से पहले हम वहाँ दोस्तों के साथ बैठे हुए थे और इमाम ख़ुमैनी के आने के बाद के प्रोग्राम सेट कर रहे थे, उन दिनों में एक अजीब सा एहसास था।
उन दिनों में हम एक मैगज़ीन निकालते थे जिसमें कुछ समाचार छापते थे औऱ उसी मदरसा-ए-रेफ़ाह से यह मैगज़ीन निकलती थी। मैं वापस आया कि देखूँ क्या खबर है हालात को देखूँ और इस मैगज़ीन में खबर दूँ। इमाम ख़ुमैनी आराम करने के लिए गए हुए थे रात के दस बज रहे थे मैं समाचार निखने में बिज़ी था इतने में देखा कि इस मदरसा-एःरेफ़ाह के सामने गली के सिरे से हुल्लड़ हंगामे की आवाज़ें आ रही थीं मैंने सोचा ख़ुदा न करे कोई दुर्घटना हो गई क्या? मैं और एक और साहब उठकर खिड़की से देखने लगे इतने में देखा कि इमाम ख़ुमैनी अकेले मदरसे में दाख़िल हुए कोई उनके साथ नहीं था। कुछ सिपाही जो वहाँ खड़े थे उन्होंने जैसे ही इमाम ख़ुमैनी को देखा तो वह भी सक्ते में आ गए कि क्या करें? उन्होंने केवल इमाम खुमैनी को चारों ओर से घेर लिया। इमाम खुमैनी पूरे दिन की थकावट के बावजूद उनसे खड़े होकर बातें कर रहे थे उन्होंने इमाम खुमैनी के हाथ चूमे। शायद वह दस पन्द्रह लोग थे। 
इमाम खुमैनी इसी तरह मदरसे में दाखिल हुए और पहली मंजिल की सीढ़ियों पर पहुंचे सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद पहला वही कमरा था जहां मैं काम कर रहा था मैं कमरे से निकल कर हॉल में आया जहां कुछ मदरसे के लड़के थे और इमाम खुमैनी उन्हें देखकर उनकी ओर चले गए सबने इमाम खुमैनी के हाथ चूमना शुरू कर दिए।
मैं भी करीब जाकर हाथ चूमना चाहता था लेकिन यह सोच कर कि ज्यादा उनके लिए मुश्किल हो जाएगी पास नहीं गया। मैं एक किनारे खड़ा हो गया और इमाम खुमैनी मेरे सामने से गुजर गए।
मैं पास नहीं गया क्योंकि देखा कि इमाम खुमैनी को पहले से लड़कों ने घेरे में ले रखा है मैंने अपने आप को रोक लिया कि इमाम खुमैनी को ज्यादा डिस्टर्ब न करूँ दूसरों को भी पास जाने से रोक रहा था।
इमाम खुमैनी सीढ़ियों से चढ़ कर ऊपर जाना चाहते थे लेकिन वहीं जमीन पर बैठ गए और तीस चालीस लोग जो आसपास में थे सब बैठ गए छात्रों ने उनका स्वागत किया क्योंकि इमाम खुमैनी बिना प्रोग्राम के अचानक मदरसे में आ गये थे कोई सोच भी नहीं सकता था इसलिए स्वागत समारोह बहुत संगठित नहीं था इसके बाद कुछ मिनट इमाम ने बातचीत की और फिर ऊपर चले गये।

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