इस्लाम के राजनीतिक दृष्टिकोण

धार्मिक दृष्टि से राजनीति का महत्व (3)

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हमारे व्यवहार व चरित्र और कामों के स्वीकारात्मक और नकारात्मक महत्व के अनुसार अर्थात हमारे कार्य, व्यवहार और चरित्र के लिए महत्व को सिद्ध करना या नकारना, कभी इतना स्पष्ट व रौशन होता है कि जिस को बुद्धि सरलता से समझ लेती है और शास्त्र नियामक की ओर से बयान करने की आवश्यकता नहीं होती है..........

5). व्यवहारों और कर्मों के महत्व को समझने में मानसिक क्षमताओं की सीमाएंहमारे व्यवहार व चरित्र और कामों के स्वीकारात्मक और नकारात्मक महत्व के अनुसार अर्थात हमारे कार्य, व्यवहार और चरित्र के लिए महत्व को सिद्ध करना या नकारना, कभी इतना स्पष्ट व रौशन होता है कि जिस को बुद्धि सरलता से समझ लेती है और शास्त्र नियामक की ओर से बयान करने की आवश्यकता नहीं होती है बल्कि बुद्धि स्वंय ही ईश्वर के आदेश को समझ लेती हैं इसी कारण सिद्ध व निश्चित बौद्धिक सिद्धांतों के संदर्भ में माननीय धर्मविधिज्ञों का कहना हैः कुछ मुद्दों में बुद्धि दृढ़ एंव स्थायी रूप से निर्णय कर लेती है और कामों के अच्छे या बुरे होने को निर्धारित कर लेती है और हम बुद्धि द्वारा समझ लेते हैं कि ईश्वर का संकल्प इस काम के अंजाम देने या त्याग देने से सम्बंधित है। हम बुद्धि द्वारा यह पता लगा लेते हैं कि ईश्वर इस काम से सहमत है या नहीं। हमारी बुद्धि इस बात को समझती है कि किसी अनाथ का धन हड़पना बुरा है। और इस बारे में शास्त्र नियामक की ओर से बयान करना आवश्यक नहीं है, बुद्धि के समझ लेने के बाद क़ुरआन व हदीस में भी इस बारे में बयान करना बुद्धि के निर्णय के समर्थन के लिए है परन्तु अधिकांश अवसरों पर हमारी बुद्धि हमारे कार्यों, व्यवहार व चरित्र के महत्व और उन कामों का हमारी दुष्टता व पाषाण हृदयता और सुख शांति व आनन्द में प्रभाव की मात्रा को समझने में असमर्थ है। इस तरह कि हम अपने कार्यों के वाजिब, हराम, मुस्तहब व मकरूह होने को बुद्धि द्वारा पहचानने मंत असमर्थ हैं। इस लिए ऐसे अवसरों पर धर्म को हस्तक्षेप करने का अधिकार है और ऐसे अवसर पर धर्म को हमारे कार्यों को अंजाम देने के लिए नियम बयान करना होंगे।6). धर्म का क्षेत्रफल अथवा सीमाएंजैसा कि मालूम हो चुका है कि वह चीज़ें जो हमारी सर्वकालिक सुख शांति, आनन्द या दुष्टता व पाषाण हृदयता में प्रभाव रखती हैं, वह केवल उन समस्याओं तक सीमित नहीं हैं जो ईश्वर से सम्बंध रखती हैं बल्कि धर्म, इबादत अर्थात उपासना से सम्बंधित समस्याओं के अतिरिक्त लौकिक व सांसारिक कार्यों में भी हस्तक्षेप करने का अधिकार रखता है, इसी कारण धर्म ने कुछ खाने पीने वाली वस्तुओं के हलाल या हराम होने को भी बयान किया है।जब हम धार्मिक नियमों को देखते हैं तो इस परिणाम पर पहुँचते हैं कि धार्मिक सीमाएं व्यक्तिगत समस्याओं तक सीमित नहीं हैं बल्कि सामाजिक समस्याएं उदाहरण स्वरूप घरेलू समस्याएं, विवाह, पत्नी परित्याग और व्यापार आदि को भी सम्मिलित हैं। और चीज़ों का हलाल या हराम होना, उन के महत्व को बयान करता है। वास्तव में धर्म उन कार्यों की वास्तविकता को बयान करके उनके हराम होने को स्पष्ट करता है कि उनके द्वारा किस तरह ईश्वर की ओर मनुष्य हरकत कर सकता है और कौन से काम शैतान की ओर जाने के कारण बनते हैं।ज्ञान कुछ वस्तुओं को बयान करने में असमर्थ है, ज्ञान केवल यह बयान करता है कि किसी वस्तु को बनाने के लिए किन वस्तुओं का किस मात्रा में होना आवश्यक है, ज्ञान, भौतिक विज्ञान और रसायन शास्त्र से सम्बन्धित विशेषताओं को तो बयान करता है परन्तु यह बयान नहीं करता कि उन वस्तुओं को किस तरह उपयोग किया जाए, ताकि मनुष्य वास्तविक कौशलता और सुख शांति और आनन्द तक पहुँच सके।  ऐसे अवसरों पर धर्म को फ़ैसला करना होता है, इसलिए जिस तरह हमारे व्यक्तिगत कार्य हमारी सुख शांति व आनन्द और दुष्टता व पाषाण हृदयता में प्रभावकारी सिद्ध होते हैं उसी तरह राजनीतिक और सामाजिक कार्यों में भी हमारी भूमिका हमारी सुख शांति एंव आनन्द या दुर्दशा व दुर्भाग्य में प्रभावकारी सिद्ध होती है, बल्कि यहाँ उनका प्रभाव और अधिक होता है।अब रही हमारी मौलिक चर्चा अर्थात सामाजिक काम, क्या यह कहा जा सकता है कि समाज को चलाने की शैली हमारी सुख शांति या दुर्दशा व दुर्भाग्य में किसी प्रकार का प्रभाव नहीं डालती है और समाज के लोग समाज को आगे बढ़ाने के लिए जिस शैली को भी जिस तरह चाहें चुन लें, वह स्वतंत्र हैं और उन समस्याओं में धर्म को हस्तक्षेप करने का अधिकार नही है? कौन है जो नहीं जानता कि समाज में न्याय व निष्पक्षता का पालन मनुष्य की सुख शांति और सफलता में अत्यन्त प्रभावकारी सिद्ध होता है अगर इस बारे में कोई आयत या हदीस न भी होती तब भी हमारी बुद्धि इस बात को समझती है कि न्याय व निष्पक्षता का पालन मनुष्य की कौशलता और सफलता में अत्याधिक प्रभावकारी है। जो लोग इन समस्याओं को समझने के लिए बुद्धि को काफ़ी नहीं समझते हैं, वह क़ुरआन और हदीस से सम्पर्क बनाएं, यद्धपि हमारा मानना तो यह है कि बहुत सी राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं के महत्व को बुद्धि समझती है परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि जो भी बुद्धि समझे, वह धर्म के क्षेत्रफल से बाहर है।जैसा कि हमने बयान किया कि जो चीज़ ईश्वर की प्रसन्नता का कारण बनती है और जो चीज़ ईश्वर की नीति और उसके संकल्प को बयान करती है और हमें अवगत करती है कि ईश्वर की इच्छा क्या है इसमें कोई अंतर नहीं है कि उस को किस रास्ते द्वारा प्राप्त करें बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि हम ईश्वर के संकल्प को ज्ञात कर सकें। चाहे यह क़ुरआन व सुन्नत द्वारा प्राप्त हो या बुद्धि के द्वारा, क्यों कि यह तीनों मार्ग, ईश्वर के नियमों और धार्मिक क़ानूनों को बयान करते हैं। इसी कारण बुद्धि को ईश्वरीय नियमों के स्रोतों में गिना जाता है और माननीय धर्मविधिज्ञों ने बुद्धि को धार्मिक नियमों को सिद्ध करने वाले तरीक़ों में गिना है। इसी लिए धार्मिक समस्याओं के समाधान के लिए बुद्धि से भी सहायता लेते हैं। अतः ऐसा नहीं है कि बुद्धि और धार्मिक विधान  व धर्मशास्त्र के बीच कोई सीमा मौजूद हो कि कुछ समस्याएं बुद्धि से सम्बंध रखती हों और कुछ समस्याएं धार्मिक विधान व धर्मशास्त्र से, बल्कि बुद्धि  ऐसा दीपक है जिसकी रौशनी में ईश्वर की इच्छा और उसके संकल्प को तलाश किया जा सकता हैं अतः इस संदर्भ में हर वह वस्तु जो बुद्धि द्वारा प्राप्त हो, वह धार्मिक है।7). धर्म का सत्ता से सम्बंधहमने जो कुछ राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं के संदर्भ में, धर्म के हस्तक्षेप करने के अधिकार को बयान किया, उस को ध्यान में रखते हुए और उन विभिन्न प्रकार के शासनों के दृष्टिगत जो अब तक इस संसार में स्थापित हो चुके हैं विशेष रूप से वह शासन जो इस्लाम के नाम से या इस्लामी युग में दूसरे नामों से जाने जाते थे, यह नहीं कहा जा सकता कि इस्लाम उनके बारे में स्वीकारात्मक या नकारात्मक दृष्टि नहीं रखता है। अगर हम यज़ीद के विचारजनक  व विकृत और अत्याचारी शासन का माननीय हज़रत अमीरूल मोमिनीन अली अलैहिस्सलाम के न्यायोचित शासन से मुक़ाबला करें तो क्या यह कहा जा सकता है कि इस्लाम इन दोनों शासनों को एक दृष्टि से देखता है और माननीय श्रीमान अली अलैहिस्सलाम और यज़ीद के शासन में कोई अंतर नहीं है?क्या यह कहा जा सकता है कि हर मनुष्य स्वतंत्र है कि अपनी इच्छा के अनुसार अपने शासन की शासन प्रणाली को अपनाए और उसमें धर्म को हस्तक्षेप करने का अधिकार न हो और मनुष्य के व्यवहार व चरित्र की उसकी सुख शांति या दुर्दशा व दुर्भाग्य में कोई भूमिका नहीं है अर्थात क्या यह कहना सही है कि न माननीय हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम का शासन, मनुष्य के परलोक के जीवन के लिए प्रभावकारी है और न ही मुआविया का व्यवहार व चरित्र मनुष्य के परलोक के जीवन में कोई प्रभाव रखता है क्यों कि शासन के काम का तरीक़ा संसा


پیام رهبر انقلاب به مسلمانان جهان به مناسبت حج 1440 / 2019
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