इस्लाम के राजनीतिक दृष्टिकोण

धार्मिक दृष्टि से राजनीति का महत्व (1)

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इस्लाम के राजनीतिक दृष्टिकोणों के अंतर्गत हमने इस्लामी स्रोत अर्थात कुरआने मजीद, हदीस सुन्नते रसूल (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम) और बुद्धि के अंतर्गत बयान किया कि इस्लाम ने आंतरिक जीवन और विभिन्न सामाजिक एंव व्यक्तिगत समस्याओं को बयान किया है।..........

1.पिछली बातों पर एक सारांशिक दृष्टिइस्लाम के राजनीतिक दृष्टिकोणों के अंतर्गत हमने इस्लामी स्रोत अर्थात कुरआने मजीद, हदीस  सुन्नते रसूल (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम) और बुद्धि के अंतर्गत बयान किया कि इस्लाम ने आंतरिक जीवन और विभिन्न सामाजिक एंव व्यक्तिगत समस्याओं को बयान किया है। इसका अर्थ यह है कि इस्लाम सांसारिक जीवन में भी हस्तक्षेप का अधिकार रखता है और हमने पहले भी बयान किया है कि विभिन्न दृष्टिकोण रखने वालों से चर्चा की शैली और तरीक़ा भी अलग होना चाहिए। जो लोग हमारे साथ कुछ दृष्टिकोणों में शरीक हैं, उनसे चर्चा का तरीक़ा अलग है परन्तु जिन लोगों के दृष्टिकोण हमारे दृष्टिकोणों के विरूद्ध हैं उनसे चर्चा का तरीक़ा भी अलग है। हमने यह भी बयान किया था कि विपक्षियों को संतुष्ट करने के लिए कभी तर्कों और सिद्धांतों को आधार बनाया जाता है और कभी वाद विवाद वाला तरीक़ा अपनाया जाता है। हम यहाँ दोनों तरीक़ों से लाभांवित होंगे। हमने यह भी बयान किया है कि इस्लाम राजनीति के बारे में विशेष दृष्टिकोण रखता है और हमारे लिए आवश्यक है कि इस दृष्टिकोण को पहचानें और उसका पालन करें। इस्लामी क्रान्ति के स्तंभों अथवा मूलतत्वों में से एक मसला यही था कि इस्लाम राजनीतिक समस्याओं में हस्तक्षेप का अधिकार रखता है या नहीं? इसी कारण हमारी यह क्रांति, इस्लामी क्रान्ति के नाम से प्रसिद्ध हुई। इस क्रान्ति द्वारा हमने यह बताने का प्रयास किया है कि वह इस्लाम वास्तव में इस्लाम ही नहीं है, जो राजनीतिक समस्याओं में हस्तक्षेप का अधिकार न रखता हो।इसी तरह इस्लाम के राजनीतिक दृष्टिकोण और उसके राजनीतिक कोणों की रक्षा करने में हमारे सामने दो गुट हैं। पहला गुट उन लोगों का है जो या तो इस्लाम को स्वीकार नहीं करते हैं या किसी भी धर्म को नहीं मानते हैं। उन लोगों के उत्तर के लिए कुरआने मजीद की आयात और रिवायतों से तर्क लाने में कोई लाभ नहीं है, बल्कि उनसे तर्क वितर्क के लिए बौद्धिक तरीक़ा अपनाना पड़ेगा और सबसे पहले इस्लाम की सत्यता सिद्ध करना पड़ेगी अर्थात ईश्वर, धर्म, पैग़म्बर (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम) और परलोक और महाप्रलय के आस्तित्व को सिद्ध करना होगा। यह बात भी निश्चित है कि इस गुट से जो धर्म से अपरिचित है चर्चा केवल सैद्धांतिक होगी।दूसरा गुट उन लोगों का है, जो मुसलमान हैं और धर्म को स्वीकार करते हैं या अगर इस्लाम पर विश्वास न भी रखते हों मगर मुसलमानों की ओर से वार्ता करते हों और यह दावा करते हों कि मुसलमानों का इस्लाम राजनीति से अपरिचित है और इस्लाम का राजनीति से कोई सम्बंध नहीं है। इस गुट के सम्मुख हमें चाहिए कि उस इस्लाम की छानबीन करें जिस पर मुसलमान विश्वास रखते हैं और यह देखें कि उनका इस्लाम राजनीतिक दृष्टिकोण रखता है या नहीं, इस गुट के सम्मुख हमें केवल बौद्धिक तरीक़ा नहीं अपनाना चाहिए बल्कि इस्लाम के राजनीतिक दृष्टिकोणों की शिनाख़्त के लिए इस्लामी सिद्धांतों पर ध्यान देना चाहिए और इस्लामी स्रोत अर्थात कुरआने मजीद, सुन्नते रसूल (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम) और बौद्धिक तर्कों द्वारा सिद्ध करना चाहिए कि क़ुरआन, सुन्नत, रसूले इस्लाम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम) की सीरत और अइम्मा अलैहिमुस्सलाम के कथन और सीरत के अनुसार इस्लाम के राजनीतिक दृष्टिकोण क्या हैं? या यह कि इस्लाम के राजनीति में हस्तक्षेप करने के अधिकार पर धर्म के बुज़ुर्गों की सीरत मौजूद है या नहीं?2.राजनीति की परिभाषा और इस्लामी दृष्टिकोण से तीनों बलों अर्थात सरकार, लोकसभा और न्यायालय का महत्वकुरआने मजीद में राजनीति के बारे में चर्चा मौजूद है या नहीं? इसके उत्तर से पहले हम राजनीति की साफ़ सुथरे शब्दों में परिभाषा करते हैं, राजनीति अर्थात समाज को और आगे बढ़ाने का तरीक़ा या राष्ट्र और समाज का इस तरह प्रशिक्षण करना कि समाज की उन्नति, प्रगति  व विकास का कारण बने। या आसान शब्दों में यह कहें कि राजनीति अर्थात राजपाठ की कार्यप्रणाली अथवा राज्य विधान और राजनीति से हमारी मुराद यह नहीं है कि राजनीति अर्थात जिसके लक्षण नकारात्मक हों और धोखा धड़ी, छल कपट से काम लिया जाए।राजनीति और राष्ट्रीय संविधान के बारे में मानटिस्कियो के युग से शासन करने वाले गुटों को तीन शक्तियों में विभाजित किया गया है1). क़ानून बनाने वाली शक्ति (लोक-सभा)2).क़ानून को लागू करने वाली शक्ति (कार्य-परिषद)3).  न्याय-पालिकाक़ानून बनाने वाली शक्ति का कर्तव्य व उत्तरदायित्व है कि राष्ट्र को चलाने और जनता के उचित और अच्छे जीवन के लिए क़ानून बनाए ताकि न्याय  व निष्पक्षता स्थापित रहे और समाज और राष्ट्र पर क़ानून शासन करे ताकि एक दूसरे के अधिकार नष्ट न हों और पूर्ण रूप से राष्ट्र उन्नति  व विकास और सफलता की ओर क़दम बढ़ाए। क़ानून को लागू करने वाले का कर्तव्य व उत्तरदायित्व यह है कि पार्लियामेन्ट में बनाए गए क़ानूनों को लागू करे और यही गुट शासन के रूप में सामने आता है। न्यायालय का कर्तव्य व उत्तरदायित्व यह है कि जनता के मध्य मतभेद और झगड़ों में क़ानून के अनुसार निर्णय ले।उल्लिखित विभाजन के अंतर्गत जो कर्तव्य व उत्तरदायित्व तीनों शक्तियों के लिए निर्धारित किये गए हैं उनके बारे में क़ुरआन के दृष्टिकोण क्या हैं और धार्मिक रूप से उनका महत्व किया है इस बारे में कुरआने मजीद और इस्लाम ने कुछ विशेष नियम और क़ानून बयान हैं। यद्धपि ध्यान रहे कि नियमों से हमारी मुराद सामाजिक नियम हैं जो धर्म की दृष्टि में स्वीकृत व सिद्ध हैं। और सामाजिक क़ानून, नागरिकता के क़ानूनों, न्यायिक नियमों, व्यापारिक क़ानूनों, शासन के जनता से सम्बंध और इसके अतिरिक्त अंतर-राष्ट्रीय क़ानूनों पर आधारित हैं। वास्तव में अगर इनमें से हर एक पर दृष्टि डाली जाए तो हमें सभी उल्लिखित क़ानून कुरआने मजीद में मिल जाएंगे, कुरआने मजीद में नागरिकता के नियम, विवाह और पत्नी परित्याग अर्थात विवाह विच्छ़ेद के नियम, व्यापार और दूसरे मामलों के बारे में क़ानून, ऋण, रहेन और न्याय  व निष्पक्षता की समस्याओं का समाधान मौजूद है। यह सभी नियम इस बात को बयान करते हैं कि इस्लाम ने समाज को चलाने के लिए यह सारे नियम प्रस्तुत किये हैं, इसके अतिरिक्त कुरआने मजीद में रसूले इस्माल (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम) को आदेश दिए गए हैं ताकि विभिन्न अवसरों पर समय और क्षेत्र की ओर ध्यान देते हुए कुछ नए नियम को बनाया जाए और आस्तिकों को भी आदेश दिया गया है कि वह रसूल का आज्ञापालन और अनुसरण करें जैसा कि कुरआने करीम की खुली हुई घोषणा हैःकिसी मोमिन और मोमिना को यह अधिकार नहीं है कि जब ईश्वर और उसका रसूल किसी काम का आदेश दें तो उसमें संकोच करे। इस आयत में मोमिनों को यह अधिकार नहीं है कि ईश्वर और उसके रसूल के उस निश्चय की उपेक्षा करें, तो मालूम हुआ कि ईश्वर के स्थिर क़ानूनों के अतिरिक्त इस्लामी शासन में जीवन व्यवतीत करने वालों के लिए रसूल के बनाए हुए क़ानूनों पर अमल करना अनिवार्य है और किसी को भी यह अधिकार नहीं है कि वह उनकी उपेक्षा करे।और जो रसूले इस्लाम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम) को ईश्वर का रसूल नहीं मानता है, उससे हमारा कोई सम्बंध नहीं है। हमारी बात तो उससे है जो रसूले इस्लाम को ईश्वर का रसूल मानता हो और इस बात पर भी विश्वास रखता हो कि रसूले इस्लाम को


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