इस्लामी शासन में जनता की भूमिका और कुछ अन्य प्रश्न

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आज के युग में इन्हीं आवश्यक और अनिवार्य प्रश्नों में से एक प्रश्न यह है कि इस्लामी शासन में जनता की भूमिका क्या है? जनता के अधिकार और उनके कर्तव्य क्या हैं? इन्हीं प्रश्नों में से एक प्रश्न यह भी है कि इस्लामी ईशदूत हज़रत मुहम्मद सल्ल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम, माननीय हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम और माननीय हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम के शासनकालों की रूपरेखाएं क्या थीं?..........

आज के युग में इन्हीं आवश्यक और अनिवार्य प्रश्नों में से एक प्रश्न यह है कि इस्लामी शासन में जनता की भूमिका क्या है? जनता के अधिकार और उनके कर्तव्य क्या हैं? इन्हीं प्रश्नों में से एक प्रश्न यह भी है कि इस्लामी ईशदूत हज़रत मुहम्मद सल्ल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम, माननीय हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम और माननीय हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम के शासनकालों की रूपरेखाएं क्या थीं? इसी तरह इस्लामी क्षेत्रों में बनी उमय्या और बनी अब्बास आदि के शासन किस सीमा तक इस्लामी थे? जब हम इस्लामी शासन की बात करते हैं तो हम उल्लिखित शासनों में से किन शासनों को इस्लामी शासन कह सकते हैं? इतिहास में इस्लामी शासनों की स्थापना किस प्रकार हुई? इस्लामी शासनों की रूपरेखाएं क्या थीं कि परिणाम स्वरूप ईरान में इस्लामी क्रान्ति के उपलक्ष्य में जिस शासन की स्थापना हुई वह इस प्रकार है?  परन्तु उल्लिखित प्रश्नों के संदर्भ में और दूसरे छोटे छोटे प्रश्न भी उत्पन्न होते हैं उनमें से एक प्रश्न यह है कि क्या हमारा शासन सौ प्रतिशत इस्लामी शासन हैं? क्या इसमें इस्लामी शासन के समस्त सिद्धांत और नियम मौजूद हैं? और अगर उसमें वह समस्त सिद्धांत, शासन प्रणालियां और नियम मौजूद हैं तो क्या इस शासन ने उनका पालन किया है और इसी प्रकार यह प्रश्न भी उत्पन्न होता है कि इस शासन में कौन से विशेष अभाव हैं?7. इस्लाम के राजनीतिक दृष्टिकोणों को पहचानने की विधियांइससे पहले कि हम उल्लिखित प्रश्नों और संदेहों के उत्तर दें इस चीज़ की आवश्यकता का आभास करते हैं कि उन नीतियों को बयान करें जिनको उल्लिखित चर्चा के अनुसंधान व अन्वेषण में अपनाएंगे या पारिभाषिक भाषा में इस चर्चा की मेथेडलोजी (विशिष्ठ सिद्धांतों और विधियों पर आधारित कार्यप्रणाली) क्या है?वास्तव में यह एक प्रारंभिक चर्चा है जिसका समाधान आरम्भ में कर लेना ही उचित है कि क्या हमारी यह चर्चा एक बौद्धिक चर्चा है जिसके द्वारा हम बौद्धिक तर्कों के साथ इस्लाम के दृष्टिकोणों को बयान करें या क़ुरआन व सुन्नत के अधीन है अर्थात इस शासन के कुछ सिद्धांत और कार्य प्रणालियां क़ुरआन और हदीसों (इस्लामी ईशदूत माननीय श्रीमान मुहम्मद सल्लललाहो अलैहे व आलिही वसल्लम और ईश्वर की ओर से प्रमाणित उनके निर्दोष वंश से प्रचारित पवित्र कथन) से लिए गए हैं या यह कि इस्लामी राजनीति एक अनुभव के समान है कि जिसके सही या ग़लत होने को अनुभव ही सिद्ध कर सकता है और इस स्थिति में हमारे बयान करने की नीति अनुभव पर ही निर्भर होगी और चूँकि हमारी चर्चा बौद्धिक शैली पर आधारित है इस कारण इस बात की ओर इशारा करना आवश्यक है कि बौद्धिक चर्चा कम से कम दो प्रकार से संभव है।1. वाद विवाद पर आधारित शैली   2. तर्क वितर्क पर आधारित शैलीजिस समय हम किसी चर्चा को प्रारम्भ करते हैं और बौद्धिक शैली से समस्या का समाधान करना चाहते हैं तो कभी कभी  ऐसे सिद्धांतों के अनुसार चर्चा करके परिणाम तक पहुंचते हैं कि जिनको हम और हमारा विरोधी दोनों स्वीकार करते हैं इसके मुक़ाबले में तर्क वितर्क पर आधारित शैली है जिसमें समस्त वादों पर चर्चा होती है और परिणाम स्वरूप उन सिद्धांतों द्वारा निश्चित एंव स्पष्ट परिणाम तक पहुंचते हैं और निःसंदेह इस शैली का निर्वाचन चर्चा के विस्तीर्ण होने का कारण बनता है उदाहरण स्वरूप अगर हम तर्कों द्वारा यह सिद्ध करना चाहें कि इस्लामी शासन में न्याय की ओर ध्यान देना चाहिए तो सबसे पहले हमें न्याय के अर्थ को स्पष्ट करना पड़ेगा इस के बाद इस प्रश्न का उत्तर देना होगा कि न्याय व निष्पक्षता पर किस तरह ध्यान दिया जाए? इसी तरह यह प्रश्न भी उत्पन्न होगा कि न्याय व निष्पक्षता और स्वतंत्रता एक स्थान पर एकत्रित हो सकते हैं या नहीं? और इसी तरह यह प्रश्न भी उत्पन्न होगा कि न्याय व निष्पक्षता के आधारों को कौन सुनिश्चित करेगा? न्याय व निष्पक्षता के आधारों को ईश्वर निर्धारित करेगा या मानव बुद्धि?ऊपर बयान हुए प्रश्नों के उत्तर मिलने के बाद यह प्रश्न उठता है कि इस बारे में बुद्धि किस सीमा तक हस्तक्षेप करने का अधिकार रखती है क्या बुद्धि के निर्णय लेने की एक विशेष सीमा है और इसी तरह यह चर्चा जारी रहती है यहां तक कि सिद्धांतों और ईश्वर की पहचान के तरीक़ों के बारे में प्रश्न होगा कि इसको भी स्पष्ट होना चाहिए फिर यह कि बुद्धि है क्या? और इसके विवेचन की शैली किया है बुद्धि किस तरह तर्क अथवा विवेचन करती है और बुद्धि का एतेबार और उसका आदेश किस हद तक स्वीकृति है और ज़ाहिर है कि अगर हम इस तरह की समस्याओं पर अनुसंधान करेंगे तो विभिन्न सिद्धांतों पर भी चर्चा करनी पड़ेगी।तर्क वितर्क पर आधारित शैली से चर्चा करना यद्धपि दोषरहित, सम्मानित और विश्वस्त है परन्तु जैसा कि हमने पहले भी इशारा किया है कि तर्क वितर्क पर आधारित शैली से चर्चा करने के लिए बहुत से सिद्धांतों का सहारा लेना पड़ता है और बहुत कम लोग ही उन सभी सिद्धांतों में प्रवीणता रखते हैं। हर प्रकार के ज्ञान और जानकारियों के विशेषज्ञ उसकी सीमित समस्याओं तक ही पहुंच रखते हैं अतः सारांश यह हुआ कि यह काम बहुत कठिन है और इस प्रकार की समस्याओं का अलग अलग समाधान करने के लिए कई सालों की आवश्यकता है।हम भी अपनी चर्चा में इसी तर्क वितर्क पर आधारित शैली को अपनाएंगे और अलग अलग समस्याओं के समाधान के बारे में चर्चा करेंगे, ताकि स्पष्ट परिणाम तक पहुँच सकें क्योंकि हमारे पास समय बहुत कम है, इसलिए अपनी चर्चा को किसी विशेष लक्ष्य तक नहीं पहुँचा सकते हैं और इसी कारण जहां पर तर्क वितर्क पर आधारित चर्चा सरल है और जटिल नहीं है वहाँ तर्क व वितर्क से प्राप्त निष्कर्ष द्वारा चर्चा करेंगे और इसके अतिरिक्त वाद विवाद पर आधारित शैली से चर्चा करेंगे। चूँकि वाद विवाद पर आधारित शैली से चर्चा एक उचित शैली है और वास्तव में लक्ष्य व उद्देश्य और परिणाम तक पहुंचने का मध्यात्मिक मार्ग हैं अर्थात यह शैली दूसरों को संतुष्ट करने के लिए प्रसिद्ध शैली है।ईश्वर ने कुरआने मजीद में बार बार विरोधियों को संतुष्ट करने के लिए और अपनी ओर से तर्क प्रस्तुत करने के लिए इस शैली को बयान किया है और हमें भी आदेश दिया है कि हम भी इस शैली को अपनाएं और दूसरों से चर्चा या जदल करें।ईश्वर का पवित्र कथन हैःहिकमत और स्पष्ट व उत्तम शैली द्वारा अपने प्रतिपालक एंव स्वामी की ओर दावत दो और उनके साथ अच्छी शैली  से जदल अर्थात चर्चा करो।.........जारी  


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