इस्लामी शासन की वास्तविकता और उसके स्तंभ अथवा मूलतत्व

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जिन लोगों ने शासन के बारे में यूरोप के विभाजन को स्वीकार किया है और जिनको विश्वास है कि शासन दो हाल से ख़ाली नहीं है, शासन या अधिनायकतंत्र है या लोकतंत्र, अब यहां प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या इस्लामी शासन अधिनायकतंत्र है अर्थात जो भी शासन करता है

जिन लोगों ने शासन के बारे में यूरोप के विभाजन को स्वीकार किया है और जिनको विश्वास है कि शासन दो हाल से ख़ाली नहीं है, शासन या अधिनायकतंत्र है या लोकतंत्र, अब यहां प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या इस्लामी  शासन अधिनायकतंत्र है अर्थात जो भी शासन करता है (जैसे हमारे समय में वली-ए-फ़क़ीह) क्या अपनी शक्ति, बल और शस्त्रों द्वारा लोगों पर शासन करता है तथा अपनी इच्छा के अनुसार शासन करता है या इस्लामी  शासन, लोकतंत्र Democracy है या इस्लामी शासन का कोई तीसरा रूप है जो ना अधिनायकतंत्र है और ना ही लोकतंत्र।हम इस प्रश्न के उत्तर में कहेंगे कि इस्लामी शासन उल्लिखित विभाजन से बाहर नहीं है या यह शासन अधिनायकतंत्र है या लोकतंत्र और यह शासन तभी लोकतंत्र होगा जब इस शासन में वही तरीक़ा अपनाया जाए जो यूरोप में अपनाया गया है अन्यथा इस्लामी शासन लोकतंत्र नहीं होगा और अधिनायकतंत्र केवल एक विशेष आदमी की इच्छा और उसके संकल्प में सीमित होता है इस बारे में कोई तीसरा दृष्टिकोण नहीं है अतः आवश्यकता है कि हम इस महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर दें और बयान करें कि इस्लामी शासन अधिनायकतंत्र है या लोकतंत्र या कोई तीसरी क़िस्म है?एक प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि इस्लामी शासन के स्तंभ अथवा मूलतत्व क्या हैं, वह कौन से स्तंभ अथवा मूलतत्व हैं कि जिन पर इस्लामी शासन को अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए ताकि इस्लामी शासन वस्तुतः (वाक़ेअन) सच्चे तरीक़े से इस्लामी शासन कहला सके। जो लोग हमारे धर्म और उसके नियमों के बारे में जानकारी रखते हैं उनको मालूम है कि अगर नमाज़ के मूलतत्वों में से कोई एक भी तत्व छूट जाए चाहे जानबूझ कर या भूले से तो उसकी नमाज़ ख़राब हो जाएगी चूँकि नमाज़ के मूलतत्व पर ही नमाज़ निर्भर हैं इसी तरह इस्लामी शासन के भी कुछ मूलतत्व होने चाहिएं कि अगर वह स्तंभ व मूलतत्व मौजूद हों तो उस शासन को इस्लामी  शासन कहा जाए और अगर वह स्तंभ व मूलतत्व न हों या हों परन्तु उनमें परिवर्तन अर्थात अभाव या अधिकता हुई हो तो उस शासन को इस्लामी शासन नहीं कहा जाए।उन मूलतत्वों के महत्व को दृष्टि में रखते हुए कि जिन पर इस्लामी शासन निर्भर है, हमने आवश्यक समझा कि उन मूलतत्वों को स्पष्ट किया जाए ताकि हम उनसे कुछ अवगत हो सके इसलिए कि जब हम उन स्तंभों व मूलतत्वों को जान लेंगे तो इस्लामी शासन और उसके आधार हमारी समझ में आ जाएंगे जिसके द्वारा हम इस्लामी और ग़ैर इस्लामी शासन के अंतर को समझ सकेंगे। अतः इस महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर भी अत्यधिक आवश्यक है। इस्लामी शासन की रूपरेखा और उसके अधिकारों व कर्तव्यों का क्षेत्रफलएक दूसरा प्रश्न यह किया जाता है कि क्या इस्लाम ने शासन की कोई विशेष रूपरेखा बयान की है जैसा कि आप लोगों को मालूम है कि आज के इस युग में शासन की विभिन्न रूपरेखाएं हैं और पुराने युग में भी शासन कुछ विशेष प्रकार से किया जाता था और वह नीतियाँ वर्तमान समय में प्रचलित नहीं हैं।शासन के कुछ रूप इस प्रकार से हैं।निरंकुश साम्राज्ञी राज्य, अनुबंधित एंव संवैधानिक साम्राज्ञी राज्य, लोकतंत्र राज्य, धर्मतंत्र अर्थात ईश्वरीय शासन (Divine rule)क्या इस्लाम ने शासन के इन रूपों में से किसी एक को स्वीकार किया है या इस्लाम ने स्वंय कोई विशेष रूपरेखा प्रस्तुत की है जो ऊपर बयान किये गए रूपों से अंतर रखती हो या यह कि इस्लाम ने शासन के लिए कोई विशेष तरीक़ा नही अपनाया है बल्कि केवल शासन के लिए कुछ आधार निर्धारित किये हैं कि जिनका हर प्रकार के शासन में ध्यान रखना अत्यन्त आवश्यक बल्कि अनिवार्य है उदाहरण स्वरूप इस्लाम ने यह कहा है कि शासन में न्याय एंव निष्पक्षता पर ध्यान दिया जाए परन्तु न्याय एंव निष्पक्षता पर किस तरह ध्यान दिया जाए क्या न्याय  व निष्पक्षता को समय और स्थान को ध्यान में रखकर अन्जाम दिया जाए और संसार के हर कोने में हर समय न्याय व निष्पक्षता की ओर ध्यान दिया जाना अनिवार्य है और इसके अतिरिक्त इस्लाम किसी विशेष रूपरेखा को बयान नहीं करता और इस्लाम की दृष्टि में शासन की उचित रूपरेखा उसके सिद्धांतों के पालन पर ही निर्भर है।अगर हम मान लें कि इस्लाम ने किसी विशेष रूपरेखा को चुना है तो क्या इस्लाम की दृष्टि में इस शासन की रूपरेखा एक स्थिर और ना बदलने वाली रूपरेखा है या यह कि उसकी रूपरेखा में परिवर्तन संभव है?इस प्रकार के प्रश्न इस्लामी शासन के बारे में होते रहते हैं इसलिए आवश्यक है कि इन प्रश्नों के उत्तर भी दिए जाएं।एक दूसरा प्रश्न शासन के फ़लसफ़े के बारे में भी होता है कि इस्लामी शासन का शासक चाहे कोई एक आदमी हो या एक गुट, इस्लामी शासन के अधिकार क्या है और इसी तरह शासन के कर्तव्य क्या है क्यों कि वर्तमान युग और प्राचीन काल के शासनों में कर्तव्यों को लेकर काफ़ी अंतर दिखाई देता हैं कुछ शासनों के अधिकार और कर्तव्य काफ़ी सीमित होते हैं उदाहरण स्वरूप कुछ शासन केवल सामूहिक  एंव सार्वजनिक रक्षा के उत्तरदायी होते हैं परन्तु कुछ शासनों के अधिकार बहुत अधिक होते है जिसके परिणाम स्वरूप उसके कर्तव्य भी बहुत अधिक होते हैं इस तरह के शासन के कर्तव्य अत्यन्त महत्वपूर्ण होते हैं और उनके बारे में उसे उत्तर देना होता हैं और उन कर्तव्यों को जनता के कांधों पर नही छोड़ा जा सकता कि शासन का कोई कर्तव्य व उत्तरदायित्व न हो क्यों कि जनता को अधिकार है कि वह शासन से उसके कर्तव्यों को पूरा न करने के बारे में पूछताछ करे।इसी तरह यह भी मालूम होना चाहिए कि इस्लाम के राजनीतिक दृष्टिकोणों के अंतर्गत इस्लामी शासन के अधिकार और कर्तव्य क्या हैं और निःसंदेह इन अधिकारों और कर्तव्यों का उचित और संतुलित होना अनिवार्य है चूँकि यह सही नहीं कि किसी को कोई कर्तव्य सौंपा जाए और उसके कर्तव्यों या उससे सम्बंधित वह आवश्यक वस्तुएं उसे न दी जाएं जिसके बिना वह कर्तव्य पूरा ही न हो सकता हो।अतः इस महत्वपूर्ण प्रश्न का भी उत्तर दिया जाना चाहिए कि इस्लामी शासन के अधिकार और कर्तव्य क्या हैं?


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