हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.) और ज्ञान प्रसार

  • News Code : 267431

17 रबियुल अव्वल सन् 83 हिजरी की पूर्व संध्या थी। अरब की तपती हुई रेत ठंडीs हो चुकी थी। हवा के हल्के हल्के झोंके पुष्प वाटिकाओं से खुशबूओं को उड़ा कर वातावरण को सुगन्धित कर रहे थे। मदीना शहर चाँदनी में नहाया हुआ था। रेत के कणँ चाँद की रौशनी में इस तरह चमक रहे थे कि इंसान को ज़मीन पर कहकशाँ का गुमान होता था। पेड़ों की शाखओं पर चिड़ियें गुन गान में लीन थीं। यह ऐस दृष्य था जिसको देखने के बाद ऐसा आभास होता था कि कुदरत ने यह सब इंतेज़ाम किसी के स्वागत में किये हैं। सूरज अभी पश्चिम की यात्रा पूरी कर के पूरब की ओर पलटा भी नही था कि इसी बीच अज्ञानता के अँधकार को दूर करने और ज्ञान का प्रकाश फैलाने के लिए हाशमी ख़ानदान में इमामत का एक और फूल खिला। इस फूल का खिलना था कि संसार महक उठा । आने वाले ने आँखें खोली तो सिर को सजदा-ए-इलाही में रख दिया। यह देख कर बच्चे की माता उम्मे फ़रवा खुश हुईं तो पिता इमाम बाक़िर अलैहिस्सलाम ने अल्लाह का शुक्र अदा किया। दादा ज़ैनुल आबेदीन को खबर मिली तो बच्चे को देखने के लिए उम्मे फ़रवा के कमरे में तशरीफ़ लाये और बच्चे को गोद में उठा कर चूमने लगे। बच्चे ने भी दादा की गोद में हम्दे इलाही कर के अपने  सादिक़ होने का सबूत पेश किया।इस तरह सादिक़े आले मुहम्मद दादा की गोद में परवान चढ़ने लगे। और जब बचपन की समंय सीमा को पार कर के जवानी की दहलीज़ पर क़दम रखा तो अपने पिता की शैक्षिक कक्षाओ में सम्मिलित होने लगे। अब जो मासूम ने मासूम से ज्ञान प्राप्त किया तो नतीजे में ज्ञान का वह दीपक प्रज्वलित हुआ जिस ने न केवल अरब के रेगिस्तान को रौशन किया, बल्कि उसकी रौशनी पूरब से पश्चिम तक पूरी इंसानियत को प्रकाशित करती चली गई। आपके विचारों से अपके ज़माने के बड़े बड़े दार्शनिक अचम्भित हो कर रह गये। शायद इसी बिना पर साहिबे इब्ने इबाद ने कहा था कि “रसूले अकरम के बाद इस्लाम में इमाम सादिक़ से बड़ा कोई ज्ञानी नही हुआ।” आइये ज़रा इस कथन पर ग़ौर करते हैं। साहिबे इब्ने इबाद का यह कहना कि रसूले अकरम के बाद इस्लामी समाज में इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम से बड़ा कोई ज्ञानी नही हुआ, क्या यह इस बात को सिद्ध करता है कि अन्य इमामों के पास इतना ज्ञान नही था ? नही ऐसा नही है कि अन्य इमाम ज्ञान के क्षेत्र में आप से कम थे। बल्कि हक़ीक़त यह है कि जितना ज्ञान इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम के सीने में था उतना ही ज्ञान अन्य  इमामों के पास भी था। बस केवल यह फ़र्क़ है कि अन्य इमामों को उनके ज़माने के हालात ने इतनी फुरसत नही दी कि वह अपने ज्ञान को दूसरों पर व्यक्त कर पाते। क्योंकि अगर हम बनी उमैया के काल को देखते हैं तो अहले बैत व उनके शियों के खून से उनकी तलवारे रंगीन नज़र आती हैं। और अगर बनी अब्बास के ज़माने का जायज़ा लेते हैं तो इतिहास उनके ज़ुल्म का कलमा पढ़ता दिखाई देता है। दोनों में से कोई भी ज़माना रहा हो हालत यह थी कि क़ानून नाम की कोई चीज़ नही थी। बादशाह की ज़बान से निकले हुए शब्द आख़री हर्फ़ हुआ करते थे। दीन के मुफ़्ति व इस्लामी शरियत के क़ाज़ी अपनी इज़्ज़त व जानो माल का सुरक्षा इस बात में समझते थे कि अपने समय के बादशाह के इशारों को समझे और कोई आपत्ति किये बिना उसके अनुसार कार्य करे। अत्याचारी शासक के जज़बात व एहसासात के अनुसार फ़तवे जारी करें वरना कोड़े खाने के लिए तैयार रहें। यह वह ज़माना था जब आले मुहम्मद का नाम लेने वाले लोगों के बच्चों को यतीम कर दिया जाता था और उनके घरों को आग लगा दी जाती थी। अब आप खुद इस बात का अंदाज़ा लगा सकते हैं कि क्या इस हालत में कोई इमाम ज्ञान का प्रचार या प्रसार कर सकता था ?हाँ अल्लाह ने अपने फ़ज़्ल से इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम को उस समय इमामत सौंपी जब अमवी दौर आख़री हिचकियाँ ले रहा था, उनकी शानो शौकत मिट्टी  में मिल रही थी, उनका अधिपत्य  समाप्त हो रहा था और अत्याचारी तख़्तो ताज ठोकरों का खिलौना बना हुआ था। बनी उमैया के अधिकतर ज़ालिम बादशाह अपने ज़ुल्म व अत्यचार की कहानी ख़त्म कर के ज़मीन के कीड़ों की खुराक बन चुके थे और मौजूदा शासक अपने ज़ुल्म की वजह से आम लोगों को अपने हाथ से खो चुका था। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का मज़लूमाना क़त्ल ,खाना-ए- काबा को आग लगाना, मदीना-ए-रसूल को तबाह करना व इस्लामी शरीयत व क़ावानीन की तौहीन वग़ैरह ऐसी बुरी बातें थी जो मुस्लिम समाज के ज़मीर को हर पल झिज़ोड़ रही थी। समाज की ग़ैरत जागी और फिर यह ज्वाला मुखी इस तरह फ़टा कि बनी उमैया को सिर छुपाने के लाले पड़ गये। बनी अब्बास ने मौक़े से फ़ायदा उठाया और आले रसूल के नाम पर सारतुल हुसैनी के नारे के साथ इंक़लाब को हवा दी और आम जनता पर अपना क़बज़ा जमाना शुरू कर दिया । यानी इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम का समय वह समय था जब बनी अब्बास शासन पर कबज़ा करने व बनी उमैया अपने शासन को बचाने की फ़िक्र में लगे थे। इस लिए हुकूमत इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम की तरफ़ ज़्यादा ध्यान न दे सकी और आपको इतना मौक़ा मिल गया कि मसनदे इमामत पर बैठ कर ज्ञान प्रसार कर सके।अब जो इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम ने अपनी ज़बान को हरकत दी तो ज्ञान  का वह सैलाब आया जिसके सामने जिहालत की गन्दगी क़दम न जमा सकी। इसी को देखते हुए मिस्टर मीर अली जस्टिस ने अपनी किताब तारीख़े अरब में उस समय का वर्णन करते हुए लिखा कि “इस में कोई मत भेद नही कि उस समय में इंसान की फ़िक्र बहुत विकसित हुई क्षान का प्रसार इस हद तक हुआ कि आम सभाओं में दार्शनिक बहसे होने लगीं। परन्तु यह बात ध्यान रहे कि इन समस्त गतिविधियों का केन्द्र बिन्दु हज़रत इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम थे। उनकी नज़र में गहराई और विचारों में व्यापकता पाई जाती थी तथा उनके ज्ञान के हर क्षेत्र में पूर्ण महारत प्राप्त थी।”जब बीसवीँ शताब्दी ई. में इस्टारास बर्ग यूनिवर्सिटी के इस्लामिक डिपार्टमेंन्ट की नज़र इस महान ज्ञानी के व्यक्तित्व पर पड़ी तो पच्चीस प्रोफ़ेसर्स ने मिल कर अपके व्यक्तित्व पर रिसर्च करना आरम्भ किया  और जब उनकी यह रिसर्च समाप्त हुई तो यह पच्चीस के पच्चीस प्रोफ़ेसर्स अचम्भित हो गये कि क्या अब से तेरह सौ वर्ष पहले भी कोई इंसान इन चीज़ों के बारे में विचार कर सकता था और अपना दृष्टिकोण दे सकता था जो आज के इस आधुनिक युग में भी मुश्किल है। इसी लिए उन्होने इमाम को SUPER MAN  का खिताब दिया और फिर इमामक के ज्ञान को जनता के सम्मुख प्रस्तुत करने के लिए अपनी इस रिसर्च को किताब का रूप दे कर इस किताब का नाम  SUPER MAN IN ISLAM  रखा।इमाम के जिन ज्ञानात्मक तथ्यों को उन्होनें इस किताब में जमा किया है उनके कुछ विशेष भागों से मैने अपने इस लेख को सुसज्जित किया है। इमाम ने उस ज़माने में लोगों को जिन ज्ञानात्मक तथ्यों से परिचित कराया वह इतने उच्चस्तरीय हैं कि अगर इन शोधकर्ताओं के पास उनके दस्तावेज़ात मौजूद न हों तो आज की इस दुनियाँ में कोई उन पर यक़ीन करने के लिए तैयार न होगा। इस किताब से कुछ नमूने आपकी सेवा में प्रस्तुत हैं।1.      इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम वह पहले इंसान हैं जिन्होंने खगोल विद्या के बारे में दुनिया को सही फ़िक्र उस समय दी जब आपकी आयु केवल दस वर्ष थी। वाक़िया यह है कि इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम का एक शागिर्द मुहम्मद बिन फ़ता जब मिस्र से पलट कर मदीने आया तो उसने इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम को बतलीमूस के दृष्टिकोण पर आधारित सोर मण्डल का एक माडल भेंट किया। इस माडल में ज़मीन को दुनिया के केन्द्र बिन्दु के रूप में प्रदर्शित किया गया था तथा


پیام رهبر انقلاب به مسلمانان جهان به مناسبت حج 1441 / 2020
conference-abu-talib
We are All Zakzaky
सेंचुरी डील स्वीकार नहीं