• हज़रत ख़दीजा पर ख़ुदा का सलाम

    हज़रत ख़दीजा अ. अपनी क़ौम के बीच एक अलग स्थान रखती थीं जिसकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती। आपके स्वभाव में नम्रता थी और आपके अख़लाक़ व नैतिकता में भी कोई कमी नहीं थी इसी वजह से मक्के की औरतें आपसे जलती थीं और आपसे ईर्ष्या करती थीं।

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  • इमाम महदी अ.ज. की वैश्विक हुकूमत में हज़रत ईसा अ. की भूमिका।

    वैश्विक हुकूमत की बागडोर हज़रत इमाम महदी के हाथों में होगी और हज़रत ईसा अ. क़ुरआन के मूल्यों को प्रचलित करने में आपकी मदद करेंगे।

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  • इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम का जन्मदिवस।

    इमाम अली इब्ने हुसैन अलैहिमुस्सलाम, ज़ैनुल आबेदीन और सज्जाद के नाम से मशहूर हैं और मशहूर रेवायत के अनुसार आपका जन्म वर्ष 38 हिजरी में शाबान के महीने में मदीना शहर में हुआ। कर्बला की घटना में आप 22 या 23 साल के जवान थे और मुस्लिम इतिहासकारों के अनुसार आप उम्र के लिहाज से अपने भाई अली अकबर अलैहिस्सलाम से छोटे थे।

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  • जनाब अब्बास अलैहिस्सलाम का संक्षिप्त जीवन परिचय।

    4 शाबान 26 हिजरी को मदीना में हज़रत अमीरूल मोमेनीन और उम्मुल बनीन के नामवर बेटे जनाबे अब्बास अलैहिस्सलाम का शुभजन्म हुआ। आपकी माँ हेज़ाम बिन खालिद की बेटी थीं, उनका परिवार अरब में बहादुरी और साहस में मशहूर था।

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  • इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम का जन्म दिवस

    आज पवित्र नगर मदीना में इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम का घर प्रकाशवान है। पूरा मदीना नगर इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम के सुपुत्र इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम के आगमन से प्रकाशमय है। इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम का नाम मोहम्मद था और उनकी उपाधि बाक़िरूल उलूम अर्थात ज्ञानों को चीरने वाला है। इस उपाधि का कारण यह है कि इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम ने विभिन्न ज्ञानों के रहस्यों को स्पष्ट किया और उन्हें एक दूसरे से अलग किया।

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  • हज़रत अली . की नसीहत।

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम: दुनिया के दिन, दो दिन हैं एक तुम्हारे हित में और दूसरा तुम्हारे अहित में, तो अगर वह तुम्हारे फ़ायदे में हो तो उदंडता न करो और अगर तुम्हारे नुकसान में हो तो क्षुब्धु व दु:खी मत हो।

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  • सच्ची बात।

    पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने फ़रमाया: सच बात कहो चाहे तुम्हारा नुक़सान ही क्यों न हो।

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  • आशूरा के आमाल

    रोज़े आशूरा मुहम्मद और आले मुहम्मद (स.अ.) पर मुसीबत का दिन है। आशूर के दिन इमाम हुसैन अ. ने इस्लाम को बचाने के लिए अपना भरा घर और अपने साथियों को ख़ुदा की राह में क़ुर्बान कर दिया है, हमारे आइम्मा-ए-मासूमीन अ. ने इस दिन को रोने और शोक मनाने से विशेष कर दिया है अत: आशूरा के दिन रोने, मजलिस व मातम करने और अज़ादारी की बहुत ताकीद की गई है।

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  • 9 मुहर्रम की रातः

    शबे आशूर के आमाल

    अल्लाह पाक व पाकीज़ा है सारी तारीफ़ उसी अल्लाह के लिए है अल्लाह के अतिरिक्त कोई माबूद (जिसकी इबादत की जाए) नहीं है अल्लाह सबसे बड़ा है और उसके अतिरिक्त किसी के पास कोई ताक़त और शक्ति नहीं है वह महान और सर्वश्रेष्ठ है।

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  • कर्बला में औरतों की भूमिका।

    हज़रत ज़ैनब (स) और उनके हम क़दम और हम आवाज़ उम्मे कुलसूम अ., रुक़य्या अ, रबाब अ., लैला अ., उम्मे फ़रवह अ., सकीना अ., फ़ातिमा अ. और आतेका अ. तथा इमाम (अ) के असहाब व अंसार की त्यागी औरतों ने बहादुरी और त्याग व बलिदान के वह इतिहास रचा है जिसको किसी भी सूरत इतिहास के पन्नों से मिटाया नहीं जा सकता इसलिए आशूरा को इमाम हुसैन (अ) की शहादत के बाद जब अहले हरम के ख़ैमों में आग लगा दी गई बीबियों के सरों से चादरें छीन ली गईं तो जलते खैमों से निकलकर मज़लूम औरतें और बच्चे कर्बला की जलती रेत पर बैठ गए।

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  • इस्लाम के बाक़ी रहने में इमाम हुसैन अ.ह के आंदोलन की भूमिका।

    हज़रत इमाम हुसैन अ. ने अपने रिश्तेदारों और साथियों के साथ इस्लाम को क़यामत तक के लिये अमर बना देने के लिए महान बलिदान दिया है। इस रास्ते में इमाम किसी क़ुरबानी से भी पीछे नहीं हटे, यहां तक ​​कि छः महीने के दूध पीते बच्चे को भी इस्लाम के लिए क़ुरबान कर दिया ताकि इस्लाम बच जाये।

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  • पैग़म्बर का प्रशिक्षण

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैः अल्लाह ने अपने सबसे महान फ़रिशते जिब्राईल को पैग़म्बर के प्रशिक्षण के लिए नियुक्त किया ताकि रात दिन बड़प्पन व महानता और सर्वोत्तम शिष्टाचार की ओर उनका मार्गदर्शन करे।

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  • शिया सुन्नीः

    इस्लामी भाईचारा

    इस्लाम की निगाह में सब इंसान बराबर हैं और कोई क़ौम या क़बीला तथा कोई रंग व नस्ल एक दूसरे पर वरीयता नहीं रखता और धन दौलत या ग़रीबी, बड़ाई या श्रेष्ठता का आधार नहीं है बल्कि उसकी निगाह में सदाचार के अतिरिक्त बड़ाई का हर आधार निराधार है

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  • इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ग़ैरों की ज़बानी।

    शियों के छठे इमाम का नाम, जाफ़र कुन्नियत (उपनाम), अबू अब्दुल्लाह, और लक़ब (उपाधि) सादिक़ है। आपके वालिद इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम और माँ जनाबे उम्मे फ़रवा हैं। आप 17 रबीउल् अव्वल 83 हिजरी में पैदा हुए और 114 हिजरी में इमाम बने।

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  • हज़रत दाऊद अ. और हकीम लुक़मान की बातचीत

    एक दिन हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम कवच बना रहे थे कि उनके पास हकीम लुक़मान पहुंच गए। हकीम लुक़मान उनके पास ख़ामोशी से बैठ कर हज़रत दाउद को देखने लगे। काम ख़त्म होने पर हज़रत दाउद ने कहाः कितना अच्छा कवच है

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  • अली के शियों की विशेषता।

    इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं कि अली अलैहिस्सलाम के शिया वह लोग हैं जो अपने भाईयों, बंधुओं को ख़ुद पर प्राथमिकता देते हैं चाहे उन्हें कितनी ही ज़रूरत क्यों न हो।

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  • रमजान का महत्व।

    अगर ख़ुदा का बंदा जान लेता कि रमजान में है (क्या बरकतें और क्या रहमतें हैं) तो पूरे साल रमजान बाकी रहने की तमन्ना करता।

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  • शबे क़द्र हजार रातों से बेहतर

    कैसे शबे क़द्र हजार रातों से बेहतर है? आपने फ़रमाया कि उस रात एक नेक काम का इनाम दूसरे महीनों (जिनमें शबे क़द्र न हो) में हजार नेक कामों से बेहतर है.

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  • हज़रत ख़दीजा स.अ. पैग़म्बरे इस्लाम स.अ. की वफ़ादार बीवी।

    पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की पैग़म्बरी के ऐलान के दस साल बाद पैग़म्बरे इस्लाम स.अ. की बीवी हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा ने देहांत किया।

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