इमाम हुसैन अ.स. का चेहलुम

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  • Source : wilayat.in
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आशूर के दिन जब करबला के मैदान में रसूले इस्लाम स.अ. के नवासे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को भूखा और प्यासा शहीद कर दिया गया और उसके बाद उनके परिवार और रिश्तेदारों के ख़ैमों को आग के हवाले कर दिया गय तो दुश्मन यह सोच रहा था कि अब तो सब कुछ ख़त्म हो चुका है।

अहलेबैत न्यूज़ एजेंसी अबना: आशूर के दिन जब करबला के मैदान में रसूले इस्लाम स.अ. के नवासे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को भूखा और प्यासा शहीद कर दिया गया और उसके बाद उनके परिवार और रिश्तेदारों के ख़ैमों को आग के हवाले कर दिया गय तो दुश्मन यह सोच रहा था कि अब तो सब कुछ ख़त्म हो चुका है।
इतिहास की इस ज़ुल्म व अत्याचार से भरी घटना के बाद दुश्मनों ने खुशियां मनाईं। उसके बाद यज़ीदी सैनिक, इमाम हुसैन के परिवार और रिश्तेदारों को बंदी बनाकर सीरिया ले गए। उस समय कोई यह सोच भी नहीं सकता था कि केवल ४० दिन गुज़रने के साथ ही सच्चाई खुलकर सामने आ जाएगी। चेहल्लुम यानि सफ़र महीने की बीस तारीख़ को इमाम हुसैन अ. के परिवार और रिश्तेदारों को अत्याचारी यज़ीद की जेल से आज़ादी मिली और उनका क़ाफ़ला, कर्बला पहुंचा।
कर्बला की घटना में महत्वपूर्ण रोल निभाने वाली महान हस्तियां जैसे हज़रत ज़ैनब, इमाम हुसैन के बेटे इमाम ज़ैनुल आबेदीन अ. तथा दूसरे बंदियों ने अपनी स्पीचेज़ में ख़ास कर यज़ीद की सभा में उसकी जीत को एक धोखा बताया। हज़रत ज़ैनब ने अपने भाषण में दुश्मन के अत्याचारों और उसकी क्रूरता को आम करते हुए कहा कि ऐ यज़ीद! क्या तू यह सोचता है कि चूँकि तूने हमारे लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं और हमें यातनाएं देकर बंदी बना लिया है इसलिए हम अल्लाह के निकट अपमानित हैं और तू सम्मानित है? ऐ दुष्ट यज़ीद! हालांकि समय ने हमारे साथ ऐसा किया है कि मैं तुझ जैसे नीच से बात करने पर मजबूर हूं लेकिन मैं तुझको बहुत ही नीच समझती हूं। मैं तेरी और तेरे कामों की कड़ी आलोचना करती हूं। इस समय आंखें रो रही हैं और दिल दुखी हैं। तू जो जी चाहे चाल चल और तेरा जो दिल चाहे वह कर। अल्लाह की क़सम, हमारी यादों को तू दिलों से कभी भी मिटा नहीं सकता और हमारा संदेश ख़त्म होने वाला नहीं है। तू कभी भी हमारे ऊंची जगह तक नहीं पहुंच सकता और कलंक के इस टीके को तू कभी भी अपने माथे से मिटा नहीं सकता।
कर्बला की घटना के बाद उन हालात में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के आंदोलन के लिए जो सबसे बड़ा एवं गभीर ख़तरा अमवी शासकों की प्रोपगंडा मशीनरी थी और इस आंदोलन को उसके मेन रास्ते से मोड़ने की कोशिश कर रही थी। दूसरे शब्दों में कर्बला की घटना, अगर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत के साथ ही ख़त्म हो जाती तो बनी उमय्या यह प्रचार करते कि यज़ीद जीत गया है और इस तरह उस महान आंदोलन के मक़सदों की पहचान की संभावना तक ख़त्म हो जाती लेकिन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के बेटे इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम और इमाम हुसैन अ. की बहन हज़रत ज़ैनब अ. ने अपनी बसीरत और दूरदर्शिता से इमाम हुसैन अ. के आंदोलन के संदेश को, उसके उसी आकर्षण एवं उत्साह के साथ दूसरी क़ौमों तक पहुंचाने का फ़ैसला किया। उन्होंने यह काम बंदी बनाए जाने के तुरंत बाद शुरू कर दिया और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की वास्तविकता को स्पष्ट करने के साथ ही साथ उन्होंने अमवी हुकूमत के भ्रष्टाचार का भी रहस्योद्घाटन किया। इस तरह इन महान हस्तियों ने समाज में जागरूकता की किरण जगाई और यज़ीद के विरुद्ध आंदोलन की चिंगारी सुलगाई।
अपने बंदी बनाये जाने के दौरान हज़रत ज़ैनब और इमाम सज्जाद ने जागरूकता इतनी ज़्यादा बढ़ा दी थी कि यज़ीद जैसे भ्रष्ट शासक ने कर्बला की घटना की ज़िम्मेदारी से ख़ुद को अलग करने के लिए इस घटना की ज़िम्मेदारी कूफ़े के गवर्नर इब्ने ज़ियाद पर डालते हुए इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के परिवार और रिश्तेदारों के प्रति हमदर्दी ज़ाहिर करना शुरू कर दी। इस संबन्ध में चौथी हिजरी क़मरी के महान आलिम शेख मुफ़ीद अपनी किताब “अल-इरशाद” में लिखते हैं कि यज़ीद ने जब इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के परिवार और रिश्तेदारों को आज़ाद करने का फ़ैसला लिया तो इमाम ज़ैनुल आबेदीन को बुलाकर अकेले में उनसे कहा, अल्लाह की धिक्कार हो तुझ पर इब्ने ज़ियाद। फिर यज़ीद ने कहा कि अगर तुम्हारे बाप से मेरी मुलाक़ात हुई होती तो वह मुझसे जो कहते उसे मैं पूरा करता और अपने पूरी ताकत के साथ मैं उनको मौत से बचाने की कोशिश करता लेकिन क्या करूं, अल्लाह ने ऐसा ही इरादा किया था जो तुमने देखा। यज़ीद ने इमाम सज्जाद अ. से कहा कि आप जैसे ही मदीने पहुंचे तो वहां से मुझे लेटर लिखिए और आपको जिस चीज़ की भी आवश्यकता हो उसको बयान कीजिए। मैं आपकी हर मांग पूरी करूंगा। यज़ीद ने यह बात ऐसी हालत में कही कि जब यह तय था कि यज़ीद ने ही इमाम हुसैन अ. से अपनी बैअत लेने का आदेश दिया था और उसने इब्ने ज़ियाद से कहा था कि अगर हुसैन अ. बैअत न करें तो तुम उनका क़त्ल करके उनका सर मेरे पास भेज देना।
कर्बला के हादसे को घटे अभी ४० दिन का समय ही गुज़रा था कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के परिवार और रिश्तेदारों को शाम के जेल से आज़ाद करके सम्मान के साथ मदीने भेजने का फ़ैसला लिया गया। उन लोगों ने सबसे पहले कर्बला के शहीदों की ज़ियारत की इच्छा ज़ाहिर की ताकि उनके कटे हुए सरों को वापस कर्बला ले जाएं। इस क़ाफ़ले में इमाम ज़ैनुल आबेदीन अ. और हज़रत ज़ैनब लीडर थे। इमाम हुसैन अ. के घर वाले सीरिया से आज़ाद होकर सीधे कर्बला पहुंचे। उनके लिए कर्बला की घटना की याद बहुत ही दर्दनाक और दिल दहला देनी वाली थी। इमाम हुसैन अ. के परिवार और रिश्तेदारों के लिए कर्बला में किये गए साहसिक कामों की याद दर्दनाक तो थी लेकिन यह उनके दिलों में जोश और उत्साह उत्पन्न करती थी। एक कथन के अनुसार चेहल्लुम में दिन इमाम हुसैन अ. की क़ब्र के पहले ज़ाएर, पैग़म्बरे इस्लाम स.अ. के एक साथी जाबिर इब्ने अब्दुल्लाह अंसारी थे। जब वह इमाम के मज़ार पर पहुंचे तो उन्होंने तीन बार अल्लाहो अकबर कहा। यह कहकर वह बेहोश हो गए।
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम दुनिया के सभी सुधारकों के आइडियल हैं। उन्होंने इस्लामी समाज को भ्रष्टाचार और पतन से बचाने के मक़सद से इस समाज में अपने नाना पैग़म्बरे इस्लाम (स) के सुधार प्रोग्राम को आगे बढ़ाया। इमाम हुसैन ने इस्लामी दुनिया मे दूरदर्शिता उत्पन्न करते हुए उसमें प्रचलित बुराइयों को स्पष्ट किया और लोगों के लिए कामयाबी व भलाई का रास्ता तय्यार किया। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम सच और झूठ के बीच आधार थे।
इमाम हुसैन अ. ने जब यह देखा कि लोगों के भीतर दुनिया परस्ती के नतीजे में अत्याचार और भ्रष्टाचार की ओर झुकाव आ चुका है और उनमें अच्छाई और बुराई के बीच अंतर को समझने की क्षमता ही नहीं रह गई है तो उन्होंने अपने क्रांतिकारी आंदोलन से समाज के गहरे ज़ख़्मों के एलाज के लिए क़दम उठाया। उन्होंने अपने और अपने सच्चे साथियों के पाक ख़ून से सोये हुए इस्लामी समाज के शरीर में नई जान डालने का प्रयास किया। यही कारण है कि कर्बला की घटना को किसी एक समय सीमा से विशेष नहीं किया जा सकता बल्कि यह लगातार जारी रहने वाला ऐसा आंदोलन है जो बहुत से आन्दोलनों का कारण रहा है। इमाम हुसैन अ. का ख़ून पूरे इतिहास में मौजूद है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के शहीद हो जाने के बाद कुछ लोग नींद से जागे और यह सोचकर तौबा करने लगे कि इमाम की शहादत के समय वह क्यों कर्बला में उनके साथ नहीं थे और उन्होंने क्यों इमाम हुसैन अ. की उस समय मदद नहीं की जबकि पैग़म्बरे इस्लाम स.अ. उन्हें जन्नत के जवानों का सरदार कहा करते थे? हालांकि वह इमाम हुसैन अ. की शहादत के समय किये जाने वाले गहरे षडयंत्र को समझ नहीं सके लेकिन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के ख़ून तथा उनके परिवार और रिश्तेदारों के अथक प्रयासों ने इन लोगों पर अपना गहरा प्रभाव छोड़ा और वह अमवियों के विरुद्ध उठ खड़े हुए।
दूसरी तरफ़ इमाम के मानने वालों ने भी इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की हिदायत से फ़ायदा उठाते हुए उनको वचन दिया कि वह हुसैनी टार्गेट के साये में क़दम बढ़ाएंगे और अपमान तथा ज़िल्लत से दूर रहेंगे। कहा जा सकता है कि मुहर्रम और सफ़र के महीनों में इमाम हुसैन अ. की याद तथा आशूर और चेहल्लुम के दिन उनकी याद में मजलिसें करने और जुलूस निकालने के कारण इमाम हुसैन अ. के आंदोलन के मक़सद, इतिहास में बाक़ी रहे हैं और उनकी क्रांति की किरणें पूरी दुनिया में फैलती जा रही हैं और इस तरह हज़रत अली अलैहिस्सलाम के बेटे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम, हर ज़माने के लिए हिदायत का चिराग़ और नजात की कश्ती के समान हैं।
मौजूदा समय में मुसलमानों के सम्मान और उनकी पहचान और वर्चस्ववादी ताक़तों को परास्त करने के लिए इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का चेहल्लुम, एक समाजी और सियासी पूंजी के रूप में मौजूद है। इमाम हुसैन के चेहल्लुम के अवसर पर हुसैनी मक़सदों को स्पष्ट करते हैं। और इस रास्ते में वह ख़ुद को महासागर के मुक़ाबले में एक बूंद समझते हैं और ख़ुद को सच्चाई के रास्ते पर निछावर करने की भावना का प्रदर्शन करते हैं। कर्बला एक ऐसी जगह है जहां पर जमा होकर अपनी पाबंदी को दर्शाया जाता है। पूरी दुनिया से बड़ी संख्या में लोग आज के दिन इमाम हुसैन अ. के रौज़े की ज़ियारत के मक़सद से इराक़ के पाक शहर कर्बला जाते हैं।


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