आयतुल्लाह ख़ामेनई के बयानात की रौशनी में

ह़ज़रत अली अलैहिस्सलाम के जीवन की महत्वपूर्ण पहलू।

  • News Code : 699738
  • Source : अबना
Brief

ह़ज़रत अली (अ.स) का जीवन दुनिया के तमाम मुसलमानों के लिए एक बहुत बड़ा पाठ है। आप की इबादत हो ख़ुदा के साथ मुनाजात और दुआ हो, दुनिया से मुंह मोड़ना हो, अल्लाह की याद में डूब जाना हो, अपने नफ़्स (अंतरात्मा) और शैतान के साथ लड़ना हो, आप की निजी ज़िन्दगी की हर चीज़ आईडियल है। नहजुल बलाग़ा में आप का मशहुर जुमलाः या दुनिया ग़ुर्री ग़ैरी ऐ दुनिया मुझे धोका देने कि कोशिश न कर, जा मुझे छोड़ के किसी और को धोका दे इस लिए कि अली (अ स) तेरे धोखे में आने वाला नहीं है।

दुनिया से दूरी
ह़ज़रत अली (अ.स) का जीवन दुनिया के तमाम मुसलमानों के लिए एक बहुत बड़ा पाठ है। आप की इबादत हो ख़ुदा के साथ मुनाजात और दुआ हो, दुनिया से मुंह मोड़ना हो,  अल्लाह की याद में डूब जाना हो, अपने नफ़्स (अंतरात्मा) और शैतान के साथ लड़ना हो, आप की निजी ज़िन्दगी की हर चीज़ आईडियल है। नहजुल बलाग़ा में आप का मशहुर जुमलाः या दुनिया ग़ुर्री ग़ैरी ऐ दुनिया मुझे धोका देने कि कोशिश न कर, जा मुझे छोड़ के किसी और को धोका दे इस लिए कि अली (अ स) तेरे धोखे में आने वाला नहीं है। ऐ दुनिया तेरी यह चमक दमक तेरी यह थोड़ी सी ख़ूबसूरती, तेरा यह दिखावा, तेरी हवस का जाल जो बड़े बड़ो के फंसा देता है अली (अ स) को नहीं फँसा सकता। जब कोई आज़ाद और सच्चा इंसान इमाम अली (अ स) के जीवन  के इस पाठ को देखता है जिस में ख़ुदा के सामने वह ख़ुद को एक आम इंसान की हैसियत से पेश करते हैं तो उन्हें अपना आइडियल पाता है।
ह़क़ और इंसाफ के लिए जेहाद
इमाम अली (अ स) के जीवन का एक बड़ा ह़िस्सा ख़ुदा की राह में जिहाद में गुज़रा जिसका मक़सद यह था कि समाज में इस्लाम और इंसाफ को लागू किया जाये। रसूले इस्लाम ( स...) की ज़िन्दगी का सबसे बड़ा मक़सद यही था यानी दुनिया मे इंसाफ लागू करना हालांकि यह कोई आसान काम नहीं था इसी लिए उन्हें इतनी जंगें लड़ना पड़ीं, औऱ उन सारी जंगों में जो इंसान सबसे ज़्यादा काम आया, जो हमेशा आगे रहा, जिस ने तलवारों के साये में भी रसूले इस्लाम (स...) का साथ दिया और मरने से बिलकुल नहीं डरा वह कोई और नहीं बल्कि अली ( अ स) थे। जब सब मैदान छोड़ कर चले जाते थे अली (अ स ) अकेले मैदान में जमे रहते थे। जब कोई मैदान में जाने के लिए तय्यार नहीं होता था अली (अ स) अकेले मैदान में जाते थे। जब जंग के दरमियान दुश्मन की फ़ौज को देख कर, जंग की कठिनाइयाँ देख कर सब घबरा जाते थे इमाम अली (अ स) लोहे की दीवार बन कर खड़े हो जाते थे और दूसरो को भी अम्मीद दिलाते थे। अली (अ स) के लिए ज़िन्दगी का मतलब यही था कि ख़ुदा ने उनको जो ताक़त दी है, जो क्षमता उनके अन्दर है वह ख़ुदा के लिए और उसके ह़ुक्म को लागू करने के लिए लगायें, ह़क़ और इंसाफ़ को ज़िन्दा करें, अली ( अ स) की वजह से ह़क़ ज़िन्दा हुआ और इंसाफ़ का झंडा ऊँचा हुआ।
अगर आज दुनिया में कहीं ह़क़ के लिए आवाज़ उठाई जा रही है या इंसाफ़ की बात की जाती है तो यह उन्हीं लोगों के जेहाद और मेहनत की वजह से है, अगर अली ( अ स) और अली ( अ  स) जैसे लोग न होते तो आज इंसानी मूल्य ख़त्म हो चुके होते, आज सारे इंसान जानवरों की तरह़ जी रहे होते और इंसानियत का कोई नाम व निशान न होता।
इमाम अली ( अ स) की हुकूमत
इमाम अली (अ स) ने 4 , 5 साल के अन्दर ऐसी हुकूमत की और ऐसी सत्ता चलाई अगर दुनिया के सारे लेखक और आर्टिस्ट बैठ कर सदियों तक उनकी हुकूमत के बारे में लिखते रहें और उसे अपने अपने आर्ट द्वारा दुनिया को दिखाते रहें वह पूरी तरह़ से कामयाब नहीं हो सकते। आप की हुकूमत दुनिया की सबसे अलग हुकूमत था। आपने हुकूमत का माना ही बदल दिया।
इमाम अली (अ स) की हुकूमत एक ख़ुदाई ह़ुकूमत का नमूना, एक क़ुरआनी ह़ुकूमत का नमूना,  अशिद्दावो अलल कुफ़्फ़ार ......का नमूना और इंसाफ़ की ह़ुकूमत का एक नमूना थी। वह ग़रीब लोगों को अपने पास बुलाते थे। काना यक़रबुल मसाकीन, और समाज के दबे लोगों को ख़ास तौर से ध्यान रखते थे। वह लोग जो दूसरों का माल हड़प करने के बाद मालदार बन गये थे उनको कोई अहमियत नहीं देते थे बल्कि उनको मिट्टी से भी कम समझते थे। (बहुत से लोगों ने ह़ज़रत अली (अ स) के हाथ पर यह सोच कर बैअत की थी कि उन्हें ह़ुकूमत में कुछ ह़िस्सा मिलेगा इसी लिए जब तल्ह़ा औऱ ज़ुबैर इमाम के पास अपने ह़िस्से की बात करने आये तो आपने जलता हुआ चिराग़ बुझा दिया। और दूसरा चिराग़ जलाया जो आपका अपना चिराग़ था।
उन्होंने पूछाः अली आपने एक चिराग़ बुझा कर दूसरा चिराग़ क्यों जलाया? आपने जवाब दियाः वह ह़ुकूमत का चिराग़ था और यह मेरा चिराग़ है अगर तुम ह़ुकूमत के काम से आये होते तो वही चिराग़ जलने देता लेकिन चूंकि तुम अपने काम से मेरे पास आये हो इस लिए अपने पैसों से ख़रीदा हुआ चिराग़ जलाया है। जब उन्होंने यह देखा तो बिना कोई बात कहे चले गये। क्योंकि वह समझ गये थे कि जो अली ( अ स) एक चिराग़ के लिए इतना ज़्यादा उसूल का पक्का हो वह मुफ़्त में किसी को ह़ुकूमत में ह़िस्सा कैसे देगा) क्योंकि इमाम की नज़र में माल व दौलत और पोस्ट को कोई महत्व नहीं था बल्कि ईमान, तक़वा, ख़ुलूस, पवित्रता और इंसानियत महत्व थी। उन्होंने उसूलों के बेस पर इमाम अली (अ स) ने 5 साल से भी कम हुकूमत किया लेकिन कई सदियों से उनकी ज़िन्दगी, उनकी हुकूमत, उनके इंसाफ़ के बारे में लिखा जा रहा है और रिसर्च की जा रही है लेकिन आज तक कोई यह नहीं कह सका है कि उसने ह़क़ अदा कर दिया है।


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