इस्लामी शासन की विशेष रूपरेखा।

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Brief

निसंदेह शासन के उत्तरदायित्वों व कर्तव्यों की सही पहचान तभी हो सकती है जब हम शासन के फ़लसफ़े को समझ लें और किसी भी संगठन में हर सदस्य कि नियुक्ति या हर विभाग का निर्माण एक विशेष आवश्यकता और उद्देश्य के लिए होता है क्यों कि अगर निचले स्तर पर सदस्य या विभाग न हों तो उस संगठन में रिक्तता और बाधा उत्पन्न हो जाएगी

अबनाः निसंदेह शासन के उत्तरदायित्वों व कर्तव्यों की सही पहचान तभी हो सकती है जब हम शासन के फ़लसफ़े को समझ लें और किसी भी संगठन में हर सदस्य कि नियुक्ति या हर विभाग का निर्माण एक विशेष आवश्यकता और उद्देश्य के लिए होता है क्यों कि अगर निचले स्तर पर सदस्य या विभाग न हों तो उस संगठन में रिक्तता और बाधा उत्पन्न हो जाएगी और फिर समाज की आवश्यकताएं और सामाजिक हित संपूर्ण रूप से पूरे नहीं हो पाएगें अतः हर सदस्य या हर संग्रह के कर्तव्य व उत्तरदायित्व उन्ही आवश्यकताओं के अनुसार होते हैं जिनके कारण उन्हें बनाया गया है।
शासन के क्षेत्रफल में विधान परिषद व विधान मण्डल की आवश्यकता स्पष्ट है क्यों कि कोई ऐसा समूह या संगठन होना चाहिए जो समाज के लिए आवश्यकता के अनुसार क़ानून बनाए परन्तु अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि कार्य परिषद (शासन) की क्या आवश्यकता है शासन के होने का फ़लसफ़ा क्या है और अगर शासन न होता तो फिर कैसी स्थिति होगी और अगर जनता का इस प्रकार से नैतिक और वास्तविक व आंतरिक प्रशिक्षण संभव होता कि वह किसी भी अवस्था में क़ानून की अवहेलना न करती तो क्या फिर शासन की आवश्यकता न होती इस अवस्था में शासन के होने का मौलिक कारण समाज में क़ानून को लागू करने की गारंटी लेना हैं इस आधार पर कुछ लोगों का विचार यह है कि लोगों का इस तरह प्रशिक्षण किया जा सकता है कि स्वंय अपनी इच्छा से अपने उत्तरदायित्व व कर्तव्य का पालन करें और फिर किसी प्रतिभू अर्थात शासन की कोई आवश्यकता नहीं है परन्तु निश्चित रूप से यह दृष्टिकोण वास्तविकता से कोसों दूर है और जैसा कि हमने शासन की आवश्यकता पर तर्कों के संदर्भ में पहले भी बयान किया है कि शासन की आवश्यकता पर क़ानून लागू करने की गारंटी के अतिरिक्त दूसरे तर्क भी मौजूद हैं जिनमें से समाज की सार्वजनिक और महत्वपूर्ण आवश्यकताओं का होना जो समाज के सभी लोगों से सम्बंधित होती हैं उल्लेखनीय है और कोई विशेष व्यक्ति या कोई विशेष गुट उनकी आपूर्ति नहीं कर सकता है और इस बात की आवश्यकता होती है कि कोई एक ऐसा संगृहीत संगठन हो जो अपनी प्लानिंग के अंतर्गत समाज की उन आवश्यकताओं को पूरा कर सके हमने यह (भी) निवेदन किया था कि समाज की सार्वजनिक आवश्यकताओं में से देश पर आक्रमण करने वालों के मुक़ाबले में युद्ध और रक्षा व प्रतिरक्षा Defence की समस्या भी है निसंदेह जब  युद्ध अपनी चरम सीमा पर होता है तो कोई विशेष व्यक्ति या कोई विशेष गुट शत्रु के आक्रमण के मुक़ाबले में सफल नहीं हो सकता है और व्यक्तिगत रूप से युद्ध को संचालन नहीं कर सकता है बल्कि समाज में एक सार्वभौम और योजनाबद्ध शक्ति sलेtematic power का होना आवश्यक है ताकि युद्ध में सफलता मिल सके और अपनी प्लानिंग द्वारा जनता को युद्ध में सम्मिलित होने का निमंत्रण दे और उनको ट्रेन्ड करके और युद्धक कलाओं में प्रवीण बनाकर युद्ध के लिए तैयार करे।
इनके अतिरिक्त समाज की दूसरी आवश्यकताएंa भी होती हैं कि जिन को पूरा होना शासन के अधीन ही संभव  है उदाहरण स्वरूप समाज में स्वास्थ] शिक्षा व प्रशिक्षण और इसी प्रकार दूसरी आवश्यकताएंa जिन के लिए विशेष मंत्रालय का होना आवश्यक हैं और ज़ाहिर सी बात है कि समाज की स्थिति परिवर्तित होने और नए नए प्रकार की आवश्यकताओं का उत्पन्न होना जिन के लिए अलग अलग मंत्रालय होना आवश्यक हैं  उदाहरण स्वरूप समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कुछ अवस्थाओं में अगर केवल पाँच मंत्रालय पर्याप्त हों परन्तु नई नई आवश्यकताओं के दृष्टिगत उन मंत्रालयों में वृद्धि की जा सकती है और यह उचित नहीं है कि क़ानून में विशेष संख्या में मंत्रालय निर्धारित किए जाएं बल्कि उनकी संख्या समय व स्थान की शर्तों को ध्यान में रखते हुए होनी चाहिएA अतः इस्लाम के राजनीतिक दृष्टिकोण के हिसाब से भी यह निश्चित नहीं है कि इस्लामी देश के राष्ट्रपति के मंत्रिमण्डल में कितने मंत्री हो सकते है बल्कि इस संदर्भ में उसको स्वतंत्र रखा गया है ताकि समय के दृष्टिगत और विभिन्न आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए मंत्रालयों की संख्या निर्धारित की जाएं।
1.    इस्लामी और धर्म निरपेक्ष शासन प्रणालियों के मध्य मौलिक अंतर
प्रिय श्रोताओं! यह बात सिद्ध हो चुकी है कि शासन के होने का फ़लसफ़ा समाज की विभिन्न आवश्यकताएं हैं जिन को केवल शासन ही अन्जाम दे सकता हैं और पिछली चर्चा का सारांश यह है कि शासन के विशेष उत्तरदायित्व] समाज की विभिन्न आवश्यकताओं को पूरा करना और क़ानून को प्रचलित व लागू करना हैं
हमने विधि-निर्माण Legislation की चर्चा में यह निवेदन किया था कि व्यापकता और विस्तार के हिसाब से इस्लामी समाज के क़ानून] धर्मनिरपेक्ष शासनों से विभिन्न हैं क्यों कि धर्मनिरपेक्ष शासनों में] क़ानून को केवल जनता की भौतिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बनाया जाता है और उनके शासन का आधार ही केवल जनता की भौतिक और लौकिक व सांसारिक आवश्यकताओं को पूरा करना होता हैं यहाँ तक कि कुछ शासनों में इस बात की शर्त पाई जाती है कि शासन] धर्म का समर्थन न करे और किसी भी शासनिक विभाग में धर्म का किसी प्रकार से कोई समर्थन न होA
परन्तु इस्लामी शासन में क़ानून को केवल भौतिक आवश्यकताओं के हिसाब से नहीं देखा जाता है बल्कि वास्तविक व आंतरिक आवश्यकताओं को भी दृष्टिगत रखा जाता है बल्कि वास्तविक व आंतरिक हित को प्राथमिकता दी जाती हैं यह समस्या सुनिश्चित रूप से कार्य परिषद (शासन) में भी बयान होती है कि इस्लामी शासन व्यवस्था में शासन उन क़ानूनों को लागू करने का प्रतिभू है जो लौकिक व सांसारिक जीवन से सम्बंधित होते हैं और वास्तविक व आंतरिक व परलोक के जीवन से भी सम्बंधित होते हैंA जिस तर्क के अंतर्गत हमने विधि-निर्माण Legislation के बारे में बयान किया था कि क़ानून को ऐसा होना आवश्यक हैं जिन से वास्तविक व आंतरिक आवश्यकताएंa भी पूरी हों बल्कि उनको प्रमुखता दी जाए] उसी तर्क के अंतर्गत इस्लामी शासन का यह कर्तव्य होता है कि वास्तविक व आंतरिक हित] ईश्वरीय अधिकार और इस्लामी परंपराओं से सम्बंधित क़ानून को भी प्रचलित व लागू करे] और इस बारे में होने वाले अतिक्रमणों व उलंघ्घनों की रोकथाम करे और अगर कोई इस्लामी कृत्यों का अपमान करना चाहे तो उसको भी रोके] निसंदेह यह समस्या शासन के महत्वपूर्ण कर्तव्यों  में से एक हैं।
2.    पश्चिमी संस्कृति के अनुरागियों की और से धर्मनिरपेक्ष secular शासन का प्रस्ताव
कुछ समाचार पत्रों और भाषणों में यह बयान किया जाता है कि सार्वजनिक लोगों की भौतिक आवश्यकताओं को पूरा करने] देश में सुख व शांति को स्थापित रखने और अराजकता (अफ़रा तफ़री) से रोकने के अतिरिक्त शासन का कोई दूसरा उत्तरदायित्व नहीं है और वास्तविक व आंतरिक और धार्मिक हितों को पूरा करना धर्म शास्त्रियों और धार्मिक पाठशालाओं का कर्तव्य है!
यह दृष्टिकोण पश्चिमी संस्कृति और धर्मनिरपेक्ष secular विचार पद्धति से प्रभावित होने का परिणाम है] जैसा कि हमने इस से पहले भी निवेदन किया था कि पश्चिमी देशों की संस्कृति का
सबसे स्पष्ट विशेषता और कसौटी धर्मनिरपेक्षता secularism है अर्थात धर्म को राजनीति से भिन्न करनाA धर्मनिरपेक्ष और अधार्मिक शासनों में लौकिक समस्याएं शासन से सम्बंधित होती हैं परन्तु वास्तविक व आंतरिक समस्याएं शासन से सम्बंधित नहीं होती हैं अगर कुछ लोग धर्म और वास्तविक व आंतरिक समस्याओं में व्यस्त होना चाहते हैं तो अपने इस लक्ष्य व उद्देश्य को पूरा करने के लिए व्यक्तिगत समय और सुविधाओं का उपयोग करें और इस बारे में सरकारी सुविधाओं से लाभांवित नहीं होना चाहिए क्यों कि धर्म के बारे में शासन का कोई उत्तरदायित्व नहीं है इस्लामी संस्कृति के बिल्कुल विपरीत जिसके महत्वपूर्ण कर्तव्यों  व उत्तरदायित्वों में से इस्लाम की रक्षा करना] समाज में इस्लामी परंपरा को प्रचलित करना और उनको भुला दिए जाने से रोकना तथा निष्ठुरता और इस्लामी परंपराओं और कृत्यों का अपमान करना आदि से रोकना हैं।
जो लोग इस्लामी संस्कृति को स्वीकार नहीं करते हैं बल्कि पश्चिमी संस्कृति के अनुगामी हैं] उनकी और से इस दृष्टिकोण का प्रस्तुत होना कि शासन को धार्मिक समस्याओं में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिएA आश्चर्यजनक नहीं है और हमारा उनसे यही मौलिक मतभेद है और हमारी उनसे चर्चा और वादविवाद का विषय  यह है कि इस्लाम सत्य है या नहीं\ परन्तु इस दृष्टिकोण का उन लोगों की और से प्रस्तुत होना जो स्वंय को मुस्लिम और इस्लामी सिद्धांतों का विश्वशनीय समझते हैं] उचित नहीं है और इस तरह की चर्चा करना इस बात की निशानी है कि उन्होंने इस्लामी संस्कृति को नहीं समझा हैं।
3.    इस्लामी कृत्यों की सुरक्षा और उनका प्रचलित करना शासन का कर्तव्य
अतः धर्मनिरपेक्ष और धार्मिक शासनों के संयुक्त उत्तरदायित्वों के अतिरिक्त इस्लामी शासन का उत्तरदायित्व यह है कि वह इस्लामी परंपराओं को स्थापित करें यद्धपि जनता अपनी इच्छा से कुछ इस्लामी परंपराओं को अन्जाम दे सकती हैं] उदाहरण स्वरूप नमाज़े जमाअत अर्थात सामूहिक प्रार्थना को स्थापित करना] उत्सव मनाना और शोक मातम करना] धार्मिक पाठशालाओं की स्थापना] इस्लामी प्रोग्रामों के आयोजित करने के लिए राष्ट्रीय और धार्मिक केंद्रों की स्थापना करना आदिA उल्लिखित कार्यों में से हौज़ा-ए-इल्मिया अर्थात धार्मिक शिक्षा केंद्र महत्वपूर्ण केंद्रों में शुमार होते हैं जो जनता द्वारा भेंट किए हुए धर्मादाय से चलते हैं और इस्लामी परंपरा की सुरक्षा और उनके प्रचलन और इस्लामी संस्कृति के प्रचार में व्यस्त रहते हैं] उनके लिए शासन कोई कोष निर्धारित नहीं करता हैं परन्तु जनता का उन परंपराओं को अन्जाम देना शासन को उसके उत्तरदायित्व से विमुक्त नहीं करता है और ऐसा नहीं है कि फिर इन समस्याओं में शासन का कोई उत्तरदायित्व नहीं रह जाता है क्यों कि अगर जनता का स्वेच्छा से काम करना पर्याप्त न हो तो फिर उस कार्यभार को अन्जाम देना शासन का उत्तरदायित्व हैं उदाहरण स्वरूप% हज एक ईश्वर की उपासना से सम्बंधित कर्तव्य है और जो व्यक्ति मुस्ततीअ अर्थात उसके अन्जाम देने पर समर्थ हो तो उसके लिए हज करना वाजिब अर्थात अनिवार्य हो जाता है मुज्तहेदीन अर्थात धार्मिक विधिशास्त्र विशेषज्ञ] धार्मिक विधिशास्त्र की किताबों से लाभांवित होते हुए इस समस्या के समाधान में बयान करते हैं कि अगर एक ऐसा अवसर आ जाए कि इस्लामी देश के पूरे समाज में किसी पर हज अनिवार्य न हो या अगर किसी पर अनिवार्य तो हो गया है परन्तु वह हज पर जाने  के लिए तैयार न हो बल्कि अवहेलना करे और अपनी इच्छा से कोई हज पर न जाए और खान-ए-काबा (अर्थात मक्के में वह ईश्वरीय पवित्र स्थल जो मुसलमानों की उपासना दिशा है) के ख़ाली रह जाने का अंदेशा हो तो ऐसी अवस्था में पर इस्लामी शासनों पर मुसलमानों के बैतुल-माल अर्थात इस्लामी कोष से एक गुट को हज के लिए भेजना वाजिब अर्थात अनिवार्य है] क्यों कि वह इस्लामी कृत्य जो सभी मुसलमानों के हितों की सुरक्षा का कारण हैं उसमें छुट्टी और किसी प्रकार का व्यवधान नहीं उत्पन्न होना चाहिएA
अतः जब  कि हज एक ईश्वर की उपासना से सम्बंधित कर्तव्य है और लौकिक और राजनीतिक समस्याओं में शुमार नहीं होता है और उसs स्वंय जनता अन्जाम देती हैं और अपने पास से ख़र्च करती है] परन्तु अगर जनता अवज्ञा व अवहेलना करती है या हज के व्यय की आपूर्ति की शक्ति या सामर्थ्य न रखती हो तो फिर इस्लामी शासन का इस्लामी परंपरा को स्थापित करने और क़ानून को लागू करने के प्रतिभू के हिसाब से] यह कर्तव्य है कि हज को अन्जाम देने के प्राथमिक सुविधाओं को संगृहीत करें इस आधार पर इस्लामी और धर्मनिरपेक्ष शासनों के मध्य मौलिक अंतर यह है कि इस्लामी शासन हर चीज़ से पहले इस्लामी परंपरा और इस्लाम के सामाजिक नियम] आदेश व क़ानून को लागू करने की चिंता में रहे और उनको प्राथमिकता देA यद्धपि क्रियात्मक मैदान में वास्तविक व आंतरिक और भौतिक चीज़ों में कोई टकराव नहीं होता है परन्तु अगर मान लिया जाए कि उन में टकराव हो भी जाए तो ऐसी अवस्था में वास्तविक व आंतरिक चीज़ों को प्रमुखता दी जाएं
अतः इस्लामी शासन के उत्तरदायित्वों व कर्तव्यों  में निम्लिखित चीज़ों को शीर्ष पर होना चाहिए% इस्लामी परंपरा को स्थापित करना] क़ानून और इस्लामी संस्कृति की रक्षा करना और ऐसी चीज़ों की रोक थाम करना जो समाज में इस्लामी संस्कृति के कमज़ोर होने का कारण बने तथा कुफ़्र अर्थात नास्तिकता की परंपराओं की रोक थाम करनाA
4.    शासन और उसकी भूमिका अदा करने के ढ़ंग
प्रिय श्रोताओं! हमने इससे पहले भी निवेदन किया था कि शासन पर अनिवार्य है कि वह स्वंय समाज की कुछ आवश्यकताओं को पूरा करने के उत्तरदायित्व को स्वीकार करे उदाहरण स्वरूप रक्षा व प्रतिरक्षा Defence और युद्ध की समस्याएं] कि जिस में प्लानिंग] राजनय व कूटनीति और कार्यभार से सम्बंधित उत्तरदायित्व सभी शासन के कर्तव्य होते हैं A परन्तु शासन के विशेष कार्यों के अतिरिक्त यह भी उत्तरदायित्व होता हैं कि इस्लामी समाज की कुछ आवश्यकताओं को पूरा करने में अपनी भूमिका अदा करे जिन के दो रूप हो सकते हैंA
(1) शासन केवल प्लानिंग] राजनय व कूटनीति और उनके कार्यान्वयन पर निरीक्षण रखे और प्रत्यक्ष रूप से इन कार्यों में हस्तक्षेप न करेA
(2) प्लानिंग] राजनय व कूटनीति और निरीक्षण के अतिरिक्त इन कार्यों को स्वंय अन्जाम देA
और अधिक स्पष्टीकरण के लिए निवेदन करते हैं कि समाज की किसी एक परियोजना को सफल बनाने के लिए पहले उसके लक्ष्य व उद्देश्य का उज्जवल व स्पष्ट होना आवश्यक है ताकि उसी आधार पर प्लानिंग की जा सके] उसके बाद उसको लागू करने के लिए उसकी आंशिक समस्याओं को व्यवस्थित किया जाता हैं क्यों कि एक परियोजना के लिए अवधि निर्धारित होना चाहिए आरम्भ और समाप्त होने की अवधि मालूम हो और उसका ख़र्च भी पता हों इस चरण के बाद जो कम्पनी उस काम को करना चाहे उसको संघटित किया जाता है अर्थात यह निर्धारित किया जाता है कि कौन लोग और किस प्रकार से उस परियोजना को अन्जाम देa] और उस अधिकारियों व कर्मचारियों की श्रेणियाँ और उनके कर्तव्य व उत्तरदायित्व निर्धारित किए जाते हैंA उदाहरण स्वरूप इमाम ख़ुमैनी अंतर-राष्ट्रीय हवाई अडडा परियोजना को ले लीजिए] कि जिसमें पहले यह तय होता है कि क्या इस हवाई अडडे की आवश्यकता है या नहीं यद्धपि यह बात देश की महत्वपूर्ण राजनय व कूटनीति से सम्बंधित है जिसके आधार पर यह निश्चित होता है कि इस परियोजना पर काम होना चाहिए या नहीं\ और जब  परियोजना की आवश्यकता को स्वीकार कर लिया जाता है तो फिर इस बारे में प्लानिंग की जाती है और यह तय किया जाता है कि इस परियोजना कितनी ज़मीन में और किस तरह की सुविधाओं के साथ अन्जाम दिया जाए और किस नक्शे के अंतर्गत हों उसके बाद उसका प्रबंधक और उसके आरम्भ होने की तारीख़ निर्धारित की जाती है अंत में इस परियोजना की बोली लगाई जाती है ताकि जो कम्पनी कम ख़र्च  में इस परियोजना को पूरा करने पर तत्पर हो तो इस काम को उसके हवाले कर दिया जाएं इस अवस्था में एक समय शासन राजनय व कूटनीति और प्लानिंग के बाद इस परियोजना को भी अपने हाथों में ले लेती है और कोई सरकारी विभाग या कोई मंत्रालय इस परियोजना पर काम करता है और इस परियोजना का ख़र्च  सरकार की और से पूरा होता है या किसी परियोजना को निश्चित करने के बाद किसी कम्पनी के हवाले किया जाता है ताकि उस परियोजना को क्रियात्मक बनाया जा सके] अस्तु दोनों अवस्थाआsssa में शासन इस परियोजना को क्रियात्मक बनाने का वादा करता हैं परन्तु संभव है कि शासन किसी परियोजना के लिए राजनय व कूटनीति और प्लानिंग के बाद उस काम को स्वंय अपने हाथों में न ले] और उसके बजट और प्लानिंग को दूसरों के हवाले कर दे और स्वंय केवल निरीक्षण करता रहे अर्थात शासन अपनी और से कुछ निरीक्षकों को निर्धारित करता है ताकि क़ानून की अवहेलना और योजना के अनुसार कार्य न करने से रोका जा सके तथा जनता के धन को नष्ट और बर्बाद होने से बचाया जा सके और यह प्रयास किया जाना चाहिए कि परियोजना उसी ओरिजनल नक्शे के अंतर्गत सार्वजनिक हितों के दृष्टिगत अन्जाम पाए।
5.    सर्वसत्तावाद या अधिनायकवाद (Totalitarianism) और उदारतावाद (liberalism) शासन प्रणालियों की रूपरेखा
इन परियोजनाओं के मुक़ाबले में समाज की आवश्यकताएं उदाहरण स्वरूप युद्ध और रक्षा व प्रतिरक्षा Defence] शिक्षा व प्रशिक्षण] चिकित्सा और शहर की स्वच्छता आदि जैसी समस्याएं कि नियमित रूप से जिनका निष्पादन शासन का कर्तव्य होता है] यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या शासन का उत्तरदायित्व केवल आवश्यकताओं में प्लानिंग और अधिक से अधिक निरीक्षण होता है या प्लानिंग और निरीक्षण के अतिरिक्त उनको लागू करने का भी उत्तरदायित्व भी शासन का है और मौलिक रूप से इस्लाम की दृष्टि में कौन सा तरीक़ा सही है क्या विद्धालय] महाविद्धालय और विश्वविद्धालय के बनाने का बनाने का ख़र्चा देना शासन का कर्तव्य है या उसके कुछ भाग का भुगतान शासन और कुछ भाग का भुगतान जनता का कर्तव्य होता है जैसा कि अधिकांश देशों में जिनमें से हमारे देश में भी ऐसा ही होता है कि प्राथमिक शिक्षा सब के लिए आवश्यक है और उसका ख़र्च देना भी शासन के कर्तव्यों में से है परन्तु विश्वविद्धालय की शिक्षा का ख़र्च  शासन के कर्तव्यों में से नहीं है बल्कि शासन विश्वविद्धालय में शुल्क लेकर उच्च शिक्षा का प्रबन्ध करता है यद्धपि कुछ देशों में विश्वविद्धालय की शिक्षा भी मुफ़्त होती हैं
सर्वसत्तावाद या अधिनायकवाद (Totalitarianism) (उस शासन व्यवस्था को कहते हैं जिसमें शासन अपनी सत्ता की कोई सीमारेखा नहीं मानता और लोगों के जीवन के समस्त कोणों को यथासम्भव नियंत्रित करने को उद्धत रहता हैं ऐसा शासन प्रायः किसी एक व्यक्ति] वर्ग या एक समूह के नियंत्रण में रहता हैं एडाल्फ हिटलर और स्टैलिन के शासन सर्वसत्तात्मक शासन के उदाहरण हैंA)
कुछ शासनों में यह प्रयास किया जाता है कि समाज के अधिक से अधिक कार्य शासन द्वारा अन्जाम पाएं] और यह कार्य पद्धति बड़े बड़े धनवानों और पूंजीपतियों के] अनुचित और क्रूरता से परिपूर्ण व्यवहार और अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए समाज के हितों को ख़तरे में डालने वाले लोगों के मुक़ाबले में एक प्रतिक्रिया है क्यों कि इस समाज उन्मुखी दृष्टिकोण और समाजवादी socialist व समयवादी देशों की स्थापना का कारण] धनी और पूंजीवाद देशों में जनता पर होने वाले] ज़ुल्म व अत्याचार था और वास्तव में यह उस अत्याचार के मुक़ाबले में एक प्रतिक्रिया थीA क्यों कि पश्चिमी देशों में निर्धनों पर धनवानों ने इतना अधिक अत्याचार किया कि जिसके परिणाम स्वरूप यह अतिवादी व चरमपन्थी दृष्टिकोण वुजूद में आया कि सभी कार्यों का निष्पादन शासन का कर्तव्य हो और शासन को होने वाले सार्वजनिक लाभों को सभी लोगों के मध्य समान रूप से विभाजित किया जाए ताकि सभी लोग सामाजिक जीवन की सुविधाओं से लाभांवित हो सकेa] वास्तव में सामान्य जीवन की सुविधाओं से लाभांवित होने में सभी लोगों को समान होना और जनता से अत्याचार को दूर करना] सामाजिक] राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं में यह दृष्टिकोण समाजवाद socialism का है जो दस बीस साल पहले से अत्याधिक प्रचलित हुआ है और भौतिकवाद materialism दृष्टिकोण के साथ तथा अभाव] तंगी और निर्धनता को दूर करने और सभी लोगों में समानता ईजाद करने जैसे नारों द्वारा बड़े बड़े देशों में उदाहरण स्वरूप रूसी संघunion of soviet और चीन आदि में शासन करने लगा और उसके बाद से पूंजीवादी ब्लाक का प्रबल प्रतिद्वन्दी माना जाने लगाA
अतः इस दृष्टिकोण की सौम्यता व आकर्षण और उसके नारे हमारे देश में भी कुछ लोगों को बहुत अच्छे लगे और एक संक्षिप्त अवधि तक इस दृष्टिकोण का समर्थन होता रहा तथा बहुत से लोग उसके समर्थक बन गए] जिस का परिणाम यह हुआ कि पिछले युग में (इस्लामी क्रान्ति से पहले) हमारे देश में भी समाजवादी socialist और समयवाद communism दलों की रचना हुई परन्तु इस्लामी क्रान्ति के कारण उसकी जड़ें हिल गईं] और उसका बोरिया बिस्तर लपेट दिया गया] इतिहासिक अनुभव ने यह सिद्ध किया है कि शासन के राजनीतिक] सामाजिक और आर्थिक समस्याओं में पूर्ण रूप से पदभार होने का दृष्टिकोण जो धनवानों और पूंजीपतियों को राजकोष से ग़लत प्रकार से लाभांवित होने से रोकने के नारे के साथ उत्पन्न हुए थे] उचित और उपयुक्त नहीं थे और जल्द ही उनके विघटन का कारण और समयवाद communism और पूंजीवादी ब्लाक के देशों के विघटित होने का कारण बनाA विशेष रूप से हमारे उत्तरी पड़ोसी देश की दुर्दशा सब ने देखी है कि समयवाद दृष्टिकोण के सामाजिक और राजनीतिक आधार किस प्रकार हिले और रूस जैसी महाशक्ति को टुकड़ों में बाट दिया और उस देश के साम्राज्यवाद पड़perialism का अंत हो गयाA
प्रिय श्रोताओं! उल्लिखित दृष्टिकोण भी राजनीति के फ़लसफ़े में एक दृष्टिकोण है जिसके आधार पर शासन को समाज के विभिन्न कार्यों में अधिक से अधिक हस्तक्षेप करना चाहिए] ताकि धनवानों और पूंजीपतियों को अवैध प्रकार से लाभ उठाने से रोका जा सकेA (परन्तु हम इस समय उल्लिखित दृष्टिकोण की कमज़ोरियाँ नहीं बयान करना चाहते हैं) इसके मुक़ाबले में समयवाद communism] समाजवादी socialism और उदारतावाद liberalism दृष्टिकोण हैं जिन के आधार पर समाज के सभी कार्यों का निष्पादन स्वंय जनता का कर्तव्य होता है] और लोग अपने काम में स्वतंत्र होते हैं कि जिस तरह चाहेa कार्य करेaA इस दृष्टिकोण के अनुसार शासन समाज के कार्यों में कम से कम हस्तक्षेप करता है तथा उसका हस्तक्षेप आवश्यकता के अनुसार और समाज में अराजकता व अशांति न फैलने देने के लिए होता हैं
ज़ाहिर सी बात है कि उदारतावाद liberalism दृष्टिकोण में चूँकि जनता आर्थिक] राजनीतिक और सामाजिक कार्यों में संपूर्ण रूप से स्वतंत्र होती हैं और जो लोग अधिक सुविधाएं और योग्यता रखते हैं तो वह लोग सभी चीज़ों से विशेष रूप से आर्थिक सुविधाओं से बहुत अधिक लाभ उठाते हैं और दूसरों से मुक़ाबला जीत जाते हैं जिसके परिणाम स्वरूप आर्थिक कारोबार उनको बहुत अधिक लाभ पहुंचाता है जबकि उनके मुक़ाबले में कमज़ोर और निर्धन लोग जिन के पास कम सुविधाएं होती हैं वह और अधिक निर्धन और कमज़ोर होते चले जाते हैंA
लोगों के मध्य यह मतभेद और केवल समाज के धनवान लोगों का सार्वजनिक और राष्ट्रीय सम्पति का स्वामी बन जाना] तथा समाज की दूसरी श्रेणियों में निर्धनता का बढ़ना] यह सब कारण बनते हैं कि जनता विरोध करे और शासन के विरूद्द आन्दोलन करने लगे और जिसके परिणाम स्वरूप उनको राजनीति में नहीं आने दिया जाता है] उसके बाद समयवाद शासन व्यवस्था की रचना कि जिस में समाज के निर्धन लोगों की और अधिक ध्यान दिया जाता हैं परन्तु उदारतावाद देशों में भी शासन के विरूद्द आन्दोलन और क्रान्ति से रोकने के लिए कम आय वाले लोगों को कुछ सुविधाएं दी जाती हैंA
इस समय योरोपीय देश जिनमें अधिकांश देशों में उदारतावाद शासन व्यवस्था स्थापित है उन में भी समाजवाद socialism दल अपनी कर्मण्यता का प्रदर्शन करते हैं] यहाँ तक कि कुछ शासनों में समाजवाद या सामाजिक लोक-तांत्रिक Democratic  दल सफल होते हैं उदाहरण स्वरूप इंग्लैंड के लोकसभा के चुनाव में लेबर पार्टी कभी कभी अधिकांश मतों से सफल हो जाती है केवल इसी कारण कि उसका दृष्टिकोण समाजवाद socialism पर आधारित है और इस दृष्टिकोण में ग़रीब] निर्धन और कम आय वाले लोगों का ख़्याल रखा जाता है और यह भी इस कारण होता है कि कहीं समाज का निर्धन और कम आय वर्ग शासन के विरूद्द विद्रोह न करदे] क्यों कि जब  समाज के प्रायः सभी वर्गों के लिए सार्वजनिक सुविधाएं संगृहीत होगी
तो फिर निर्धन जनता शासन के विरूद्द कोई कार्यवाही नहीं करेगीA जनता की सरलता व सुगमता में जिन निम्लिखित चीज़ों को दृष्टिगत रखा जाता है उन में से कुछ को प्रस्तुत किया जा रहा हैं
(1) अपाहिज] सेवानिवृत और बेरोज़गार लोगों के लिए बीमा
(2) चिकित्सा medical बीमा
(3) सरकार की और से कम आय वाले लोगों के लिए घर बनवाना और उनको कम से कम किराए पर देना
शासन के राजनीतिक फ़लसफ़े में एक दूसरे के विभिन्न दृष्टिकोण पाए जाते हैं
पहला दृष्टिकोण समाजवाद  socialism है जिस में समाज को मौलिक माना जाता है और समाज के लाभ को व्यक्तिगत लाभों पर प्राथमिकता दी जाती है क्यों कि इस दृष्टिकोण में समाज पर ध्यान दिया जाता हैं अतः इस दृष्टिकोण को क्रियात्मक बनाने के लिए शासन के उत्तरदायित्वों व कर्तव्यों  में वृद्धि हो जाती है और समाज के सामाजिक कार्यों में शासन के उत्तरदायित्वों व कर्तव्यों  का क्षेत्रफल विस्तृत हो जाता है ताकि सार्वजनिक सम्पति को नष्ट होने और निर्धन व कमज़ोर लोगों पर ज़ुल्म व अत्याचार होने को रोक सकेA
दूसरा दृष्टिकोण उदारतावाद liberalism है जिस में विशेष तर्कों के अंतर्गत इस चीज़ पर विश्वास रखा जाता है कि शासन को समाज के कार्यों में कम से कम हस्तक्षेप करना चाहिएA
प्रिय श्रोताओं! आज-कल भाषणों] समाचार पत्रों] निबंधों और किताबों में जो लिखा जाता है कि शासन को कम से कम या अधिक से अधिक हस्तक्षेप करना चाहिए इन्हीं दो दृष्टिकोणों के आधार पर है और जैसा कि हमने निवेदन किया था कि योरोपीय और पश्चिमी देशों में अधिकांश उदारतावाद दृष्टिकोण पाया जाता है और ऐसे शासनों में (वह संस्थाएं भी जो हमारे देश में सरकारी होते हैं) अधिकांश संस्थाएं निजी होती हैं] उदाहरण स्वरूप उल्लिखित
देशों में डाक विभाग या टेलीग्राफ़ विभाग सरकारी नहीं होते हैं बल्कि निजी होते हैं] और डाक का सारा काम] तथा विभिन्न शहरों में टेलीफ़ोन आदि की सेवाएं प्रस्तुत करने का काम निजी संस्थाएं करती हैं] वहाँ पर शासन केवल प्लानिंग और निरीक्षण करता हैं इसी प्रकार विद्धुत] पानी और समाज की दूसरी आवश्यकताओं को निजी संस्थाएं अन्जाम देती हैं परन्तु हमारे देश में यह चीज़sa शासन के कर्तव्यों  में गिनी जाती हैं


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