ब्लूमबर्गः डालर का युग अपने अंत के क़रीब पहुंच चुका है।

ब्लूमबर्गः डालर का युग अपने अंत के क़रीब पहुंच चुका है।

अमरीकी डालर का वर्चस्व धीरे धीरे ढहता जा रहा है। हालात को बारीकी से समझने वाले दुनिया के नेता अब अमरीकी करेन्सी के छुटकारा पाने का रास्ता खोजने लगे हैं।

सितम्बर महीने में यूरोपीय कमीशन के प्रमुख जीन क्लाउड जंकर ने कहा कि अब यूरोपियों को अपनी ज़रूरत की चीज़ें डालर में ख़रीदने पर मजबूर करना बेवक़ूफ़ी है। दूसरी ओर फ़्रांस के वित्त मंत्री ब्रोनो लो मायर ने कहा कि वह चाहते हैं कि उनके देश का वित्तीय ढांचा अमरीका तथा अमरीकी डालर से पूरी तरह स्वतंत्र रहे।

रूस ने भी अपनी संपत्ति को डालर से बाहर निकाल लिया है क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय लेनदेन में अमरीकी डालर के लिए उत्पन्न होने वाले ख़तरों से वह ख़ुद को बचाना चाहता है। दूसरी ओर चीन ऊर्जा के बाज़ार में अमरीकी करेन्सी के वर्चस्व को गंभीरता से चुनौती दे रहा है। चीन ने अपने ऊर्जा सौदों में युवान का प्रयोग शुरू कर दिया है।

इस प्रकार के परिवर्तन अमरीका के लिए गंभीर चेतावनी हैं विशेषकर इस समय जब अमरीका अपने घटकों को भी प्रतिबंधों की धमकियां दे रहा है। यह बहुत बुरा चिन्ह है।

यूरोपीय सरकारों ने अपने देशों की कंपनियों से कहा है कि वह अमरीकी प्रतिबंधों से खुद को बचाने के लिए यह उपाय अपनाएं कि प्रगतिशील देशों के साथ हर प्रकार का सहयोग और लेनदेन अलग वित्तीय व्यवस्था से करें और यह कंपनियां अब तो खुले आम यह काम करने लगी हैं।

अगर डालर के मुक़ाबले में अन्य करेन्सियों की बात की जाए तो अन्य करेन्सियां कुछ समस्याओं से जूझ रही हैं। यूरो ज़ोन की अपनी कुछ समस्याएं हैं, चीन बहुत सावधानी बरत रहा है कि कहीं संपत्ति किसी और दिशा में न निकल जाए।

यह बात नोट करने की है कि जब से अमरीका ईरान के परमाणु समझौते से बाहर निकला है यूरोप के साथ अमरीका के संबंधों में बड़े गंभीर मतभेद पैदा हो गए हैं जबकि दूसरी ओर अमरीका ने यूरोप के अलम्यूनियम और स्टील पर भारी टैक्स लगा दिया है। अमरीका ने कई यूरोपीय कंपनियों को धमकी दी है कि वह ईरान से किसी भी प्रकार का सहयोग न करें वरना उन्हें भी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है।

रूस सोना ख़रीदकर डालर से पूरी तरह मुक्त होना चाहता है और अमरीकी सरकार के बांड भी वह बेच देने की नीति पर काम कर रहा है।

अमरीका और चीन के बीच व्यापारिक युद्ध तेज़ होता जा रहा है। दोनों देशों ने एक दूसरे के उत्पादों पर भारी कस्टम ड्यूटी लगाई है इससे दोनों देशों के बीच व्यापार को गंभीर झटका लगा है।

ब्लूमबर्ग के लेख का सारांश


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