दो दिन... फिर एक दिन और फिर दो घंटे की यात्रा... कुवैत ने सऊदी आदेश मानने से किया इन्कार...

दो दिन... फिर एक दिन और फिर दो घंटे की यात्रा... कुवैत ने सऊदी आदेश मानने से किया इन्कार...

अरब जगत में आज कल यह सवाल बहुत किया जा रहा है कि क्या वजह है कि सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस का कुवैत का दौरा, दो दिन से दो घंटे का हो गया?

सोशल मीडिया में खास तौर पर कुवैत में यह कहा जा रहा है कि बिन सलमान का कुवैत दौरा बुरी तरह से विफल रहा है क्योंकि कुवैत ने सऊदी अरब के आदेशों को मानने से इन्कार कर दिया है।

     हालांकि कुवैत ने इन खबरों का खंडन किया है लेकिन खंडन के लिए जिस प्रकार की कूटनीतिक भाषा प्रयोग की है उससे लोगों का शक और बढ़ गया।

      रॉयर्टज़ से वार्ता में कुवैत के शाही दरबार के एक सूत्र ने बताया है कि यात्रा बेहद नाकाम रही, किसी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हुए और रायुलयौम के सूत्रों ने बताया कि सऊदी क्राउन प्रिंस जब वापस हुए तो उनका चेहरा गुस्से से तमतमा रहा था और उनके साथ प्रतिनिधिमंडल के अन्य सदस्यों की त्योरियां भी चढ़ी हुई थीं।

सऊदी अरब और कुवैत के मध्य दो तेल के कुओं पर मतभेद हैं और सूत्रों ने बताया है कि यात्रा के दौरान वार्ता का जो एजेन्डा सऊदी अरब ने तैयार किया था, कुवैत ने उसे स्वीकार ही नहीं किया। अब खबर है कि कुवैत अंतरराष्ट्रीय अदालत का दरवाज़ा खटखटाने का मन बना रहा है। वह इस से पहले यह काम कर चुका है।

      तेल के दो कुओं पर सऊदी अरब और कुवैत के मध्य विवाद सन 2014 में आरंभ हुआ था जिसके बाद दोनों कुओं को बंद करना पड़ा जिसकी वजह से कुवैत को हर साल 18 अरब डालर का नुक़सान हो रहा है।

      बिन सलमान, अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प के दबाव की वजह से कुवैत गये थे। ट्रम्प सऊदी अरब पर तेल का उत्पादन बढ़ाने के लिए दबाव डाल रहे हैं। ट्रम्प चाहते हैं कि इस तरह से तेल की क़ीमत गिर जाए। इस मांग को लेकर अमरीकी राष्ट्रपति ने सऊदी नरेश को दो बार फोन किया और दूसरी बार दो दिन पहले। इस हालिया फोन में ट्रम्प ने धमकी और ब्लैकमेलिंग दोनों का प्रयोग किया और अत्याधिक अपमानजनक स्वर में सऊदी नरेश से बात की। ट्रम्प ने सऊदी अरब का समर्थन छोड़ देने की धमकी दी और कहा कि सऊदी अरब अमरीका के बिना अपना अस्तित्व बचा ही नहीं सकता। ट्रम्प ने कहा कि राजा साहब! आप तो अपना विमान भी नहीं बचा पाएंगे लेकिन हमारे साथ हैं तो सुरक्षित हैं।

   विशेषज्ञों के अनुसार बहुत सी समस्याओं की वजह से सऊदी अरब, अमरीकी आदेश के अनुसार तेल की पैदावार नहीं कर सकता और वह एक दिन में दस लाख  से अधिक अतिरिक्त उत्पादन की क्षमता नहीं रखता इस लिए उसे यह महसूस हुआ कि अगर कुवैत के साथ संयुक्त तेल के कुओं से तेल निकलना शुरु हो जाए तो ट्रम्प के आदेश को मानने की राह आसान हो जाएगी।  

     गत 15 महीनों से सऊदी अरब और कुवैत के बीच तनाव रहा है क्योंकि विभिन्न मुद्दों में कुवैत ने अलग रहने को प्राथमिकता दी है, न उसने यमन के खिलाफ कार्यवाही में हिस्सा लिया है और सऊदी अरब के अन्य आदेशों का पालन किया और हद तो उस वक्त हो गयी जब उसने ईरान से निकटता की कोशिश शुरु कर दी। यही वजह है कि कुवैत ने ईरान के अहवाज़ में हालिया हमले की आलोचना की और उसे आतंकवादी हमला कहा जब कि सऊदी अरब और यूएई ने इस आतंकवादी घटना की आलोचना तक नहीं की बल्कि उनकी मीडिया में इसे आतंकवादी घटना के बजाए, " स्वाधीतना" की दिशा में उठाया गया क़दम दर्शाने तक का प्रयास किया गया।

 

     सऊदी अरब और कुवैत के मध्य अगर कड़वाहट जारी रही तो उसका असर क़तर और सऊदी अरब के घटकों के विवाद पर भी पड़ेगा क्योंकि कुवैत इस विवाद को सुलझाने की कोशिश कर रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि कुवैत से विवाद में ज़्यादा नुक़सान सऊदी अरब को पहुंचेगा क्योंकि सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान को , राजगद्दी पर बैठने के लिए अमरीका को " खुश" करना ही होगा।

  जिस तरह से क्षेत्र के अरब देश दो भागों में बंट गये हैं और जो इलाक़े के हालात हैं उनके तहत अगर सऊदी अरब ने समझौता नहीं किया तो पूरे इलाक़े को इसका नुक़सान उठाना पड़ेगा।


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