ईरान के परमाणु समझौते के बाद अब रूस से परमाणु अप्रसार समझौते से भी बाहर निकलना चाहता है अमरीका, विश्व स्थिरता पर क्या होगा इसका

ईरान के परमाणु समझौते के बाद अब रूस से परमाणु अप्रसार समझौते से भी बाहर निकलना चाहता है अमरीका, विश्व स्थिरता पर क्या होगा इसका

शीत युद्ध के काल के परमाणु समझौते से बाहर निकलकर ट्रम्प विश्व शांति व सुरक्षा को नुक़सान पहुंचा रहे हैं चाहे इस क़दम से उनका लक्ष्य बेहतर परमाणु समझौता करना ही क्यों न हो।

यह कहना है कि जियोपोलिटिकल विशेषज्ञों का। इन विशेषज्ञों के अनुसार इस बात की संभावना है कि चीन के कारण अमरीका इस समझौते से निकल जाएगा। पेंटागोन के पूर्व अधिकारी मिइकल मालूफ़ का मानना है कि इस समय अमरीका चीन का मुक़ाबला करने के लिए मध्यम दूरी के मिसाइल डेवलप नहीं कर सकता हालांकि चीन ने इस समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। अमरीका इस समय चीन के साथ हथियारों की दौड़ में लगा हुआ है जबकि चीन के पास इन मिसाइलों का बड़ा भंडार है। इस बीच अमरीका शीत युद्ध के काल के समझौते से बाहर निकल कर वास्तव में शीत युद्ध वाले स्थिति में पहुंच जाना चाहता है।

मालूफ़ को यह लगता है कि अमरीका खोखली बयान बाज़ी कर रहा है और वह रूस पर जो आरोप लगाता है उसके बारे में सही प्रकार से दुनिया को समझाने और ब्योरा देने की उसके पास क्षमता नहीं है। अमरीका रूस पर यह आरोप लगाता है कि रूस ने समझौते का उल्लंघन किया है लेकिन इस बारे में कुछ नहीं बताया गया कि रूस ने किस तरह इस समझौते का उल्लंघन किया है। क्या न क्रूज़ मिसाइल तैयार करने का विचार इस समझौते का उल्लंघन है। मगर समझौते में तो इस पर कोई प्रतिबंध लगाया  नहीं गया है तो यह समझौते का उल्लंघन कैसे हो सकता है। दूसरी बात यह है कि अमरीका तो खुद भी क्रूज़ मिसाइल बना रहा है। यदि अमरीका मध्यम दूरी के मिसाइलों की संख्या बढ़ाता है तो सवाल यह है कि वह इन मिसाइलों को रखेगा कहां पर? उसके पास इन मिसाइलों को रखने का एक ही स्थान है और वह नैटो के सदस्य देश हैं और यदि उसने नैटो देशों में यह हथियार रखने की कोशश की अस्थिरता बढ़ना तय है क्योंकि कई नैटो देशों की सीमाएं रूस की सीमा के निकट हैं।

अमरीकी राजनेता पाल हेरोक्स कहते हैं कि वर्ष 2003 में इराक़ पर हमला करने के बाद से अमरीका अन्य देशों पर लगाए जाने वाले अपने आरोपों के संदर्भ में अपनी विश्वसनीयता खो चुका है क्योंकि अमरीका की इस प्रकार की बातों पर कोई भरोसा नहीं रकता। यदि अमरीका के पास इस बात के साथ्य हैं कि रूस ने इस समझौते का उल्लंघन किया हो तो उसे चाहिए कि इन साक्ष्यों को पेश करे।

ट्रम्प यदि समझौते से बाहर निकलने की बात कर रहे हैं तो उन्होंने इस समझौते के साथ ही दूसरे अंतर्राष्ट्रीय समझौतों को भी नुक़सान पहुंचाया  है। विशेषज्ञ अमरीका को यह सलाह दे रहे हैं कि यदि वह समझता है कि रूस ने इस समझौते का उल्लंघन किया हो इस विषय में वह क्रिमलेन हाउस से बात करे। क्योंकि वर्ष 1987 के इस समझौते ने तनाव को कम करने में प्रभावी भूमिका निभाई थी।

ट्रम्प पर सबसे ज़्यादा इसी बात के लिए टिप्पणी की जाती है कि वह अच्छी तरह सोच समझ कर क़दम नहीं उठाते बल्कि बहुत से काम वह भावना में आकर कर जाते हैं और यही चीज़ उनकी बदनामी का कारण बनती है।

ट्रम्प ने ईरान के परमाणु समझौते से भी निकलने की घोषणा कर दी और उनको आशा है कि इस्लामी गणतंत्र ईरान पर इसका इतना दबाव पड़ेगा कि वह अपनी नीतियों और अपने सिद्धांत छोड़ देगा मगर विशेषज्ञों को अच्छी तरह पता है कि इस्लामी गणतंत्र ईरान न तो अपने सिद्धांत छोड़ेगा और न ही प्रतिबंधों से उसकी अर्थ व्यवस्था तबाह होगी। इस्लामी गणतंत्र ईरान अपनी नीतियों में आत्म निर्भरता पर विशेष ध्यान देता है। यही कारण है कि पिछले चालीस साल से अधिक समय से प्रतिबंधों का सामना करने के बावजूद इस्लामी गणतंत्र ईरान की अर्थ व्यवस्था तीव्र गति से विकास कर रही है।

ट्रम्प के फ़ैसलों और एलानों के बारे में ख़ुद अमरीका के भीतर यह सोच पायी जाती है कि वह बातों और एलान को लागू करने के मेकैनिज़्म की कोई तैयारी किए बग़ैर ही कोई ही घोषणा कर देते हैं और चूंकि उसे लागू करने की व्यवस्था मौजूद नहीं है अतः उन्हें विफलता का मुंह देखना पड़ता है।

ईरान का परमाणु समझौता हो या रूस के साथ अमरीका का पुराना समझौता हो हर मामले में ट्रम्प प्रशासन ने जो नीति अपनाई है उसे दुनिया में समर्थन नहीं मिल पाया है। ट्रम्प दूसरे देशों को अलग थलग करने की चेष्टा में खुद ही अलग थलग पड़ते जा रहे हैं।


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