आले सऊद का फैमिली बैकग्राउंड।

आले सऊद का फैमिली बैकग्राउंड।

मर्दखाई की संतानों में से एक बेटे का नाम अल-मकारन था अल-मकारन के यहां पहला बेटा पैदा हुआ जिसका नाम मोहम्मद रखा गया था मोहम्मद के बाद अल-मकारन के यहां उसके दूसरे बेटे ने जन्म लिया जिसका नाम सऊद रखा गया।

अबनाः मर्दखाई की संतानों में से एक बेटे का नाम अल-मकारन था अल-मकारन के यहां पहला बेटा पैदा हुआ जिसका नाम मोहम्मद रखा गया था मोहम्मद के बाद अल-मकारन के यहां उसके दूसरे बेटे ने जन्म लिया जिसका नाम सऊद रखा गया। यहूदी मर्द खाई के इस बेटे की नस्ल बाद में आले सऊद कहलाई।
सऊदी अरब दुनिया की वह अकेली हुकूमत है जिसका नाम किसी परिवार के नाम पर है सऊदी अरब पर शासक परिवार आले सऊद का बैकग्राउंड क्या है इस परिवार के पूर्वज कौन हैं इस परिवार का संबंध क्या वास्तव में सऊदी अरब के प्रसिद्ध परिवार अंजा से है जैसा कि आमतौर पर ख्याल किया जाता है।
क्या आले सऊद वास्तव में अरब हैं या वह किसी और परिवार से संबंध रखते हैं और क्या उनके पूर्वज मुसलमान थे या उनका संबंध किसी दूसरे धर्म से था यह वह सारे सवाल हैं जिन पर अनुसंधान की जरूरत है इसलिए यहां मोहम्मद साखिर नामक लेखक की रिसर्च को पेश कर रहे हैं कि जिसे सऊदी शासकों ने अपना असली चेहरा सामने लाने पर सजा ए मौत दे दी थी।
मोहम्मद शाखिर की रिसर्च
1851 हिजरी में अंजा कबीले की एक शाखा आले मसालीख से संबंध रखने वाले कुछ लोगों ने एक व्यापारिक काफिला बनाया जिसका उद्देश्य इराक़ से खाद्य पदार्थ खरीद कर उन्हें नज्द लाना था इस काफिले का सरदार सामी इब्ने मसलूल था इस क़ाफिले का गुज़र जब बसरा के बाजार से हुआ तो काफिले के कुछ लोगों ने खाने पीने का सामान खरीदने के लिए बसरा के बाजार का रुख किया वहां वह एक व्यापारी के पास पहुंचे यह व्यापारी यहूदी था उसका नाम मर्द खाई इब्ने इब्राहिम इब्ने मूसा था। सौदे के दौरान व्यापारी ने उन लोगों से पूछा कि क्या तुम्हारा संबंध कहां से है उन्होंने जवाब दिया कि उनका संबंध अंजा कबीले की एक शाखा अल मसालीख़ से है, यह नाम सुनना था कि यहूदी उठ खड़ा हुआ और उनमें से हर आदमी से बड़े तपाक के साथ गले मिला।
उसने बताया कि वह खुद उस कबीले की शाखा से सम्बंध रखता है लेकिन अपने पिता के अंज़ा कबीले के कुछ लोगों से एक परिवारिक झगड़े की वजह से वह बसरा में आकर रहने लगा है उसने अपने सेवकों को हुक्म दिया कि काफिले वालों के तमाम ऊटों पर गेहूं, खजूर और चावल की बोरियां लाद दी जाएं। यहूदी व्यापारी के इस व्यवहार ने काफिले वालों को आश्चर्यचकित कर दिया वह अत्यंत खुश हुए कि इराक़ में उनके परिवार का एक अपना आदमी मिल गया जो उनके खाने पीने का इंतेजाम करने वाला है उन्होंने उसकी हर बात पर पूरी तरह से विश्वास कर लिया।
वह व्यापारी था तो यहूदी लेकिन चूंकि अल-मसालीक़ क़बीले के लोगों को अनाज की बहुत ज़्यादा ज़रूरत थी इसलिए उन्होंने उसकी मेहमान नवाज़ी को अपने लिए ग़नीमत जाना, जब क़ाफ़िला अपनी वापसी का प्रबंध कर रहे थे तो उसने काफ़िले से अपील की कि वह अगर उसे भी अपने साथ ले चलें तो यह उसके लिए बड़ा सौभाग्य होगा क्यूंकि उसकी बहुत पुरानी इच्छा है कि अपने पूर्वजों के वतन को देखे। नज्द पहुंच कर उसने लोगों से मिलना-जुलना शुरू कर दिया और कई लोगों को अपने आलापप्रियता के आधार पर अपने कब्जे में करने में कामयाब हो गया लेकिन उसे वहां अल कसीम से संबंध रखने वाले एक धार्मिक नेता शेख आले सलमान अब्दुल्लाह के विरोध का सामना करना पड़ा, उस धार्मिक नेता ने प्रचार का दायरा नज्द, यमन और हेजाज़ तक फैला हुआ था यहूदी को उस व्यक्ति के विरोध की वजह से मजबूरन वह क्षेत्र छोड़ना पड़ा और वह अल कसीम से अल-एहसा आ गया।
वहां जाकर उसने अपना नाम बदल दिया और मर्दखाई से मरखान इब्ने इब्राहिम मूसा रख लिया फिर वह यहां से अलकतीफ के करीब एक क्षेत्र दारिया में रहने लगा यहां उसने स्थानीय निवासियों में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए एक मनगढ़त कहानी का सहारा लिया।
कहानी यह थी कि रसूले इस्लाम के ज़माने में मुसलमानों और काफ़िरों के बीच लड़ी जाने वाली ओहद नामक जंग में एक काफ़िर के हाथ रसूले पाक की तलवार लग गई और उस काफ़िर ने वह ढाल बनू क़नीक़ा के हाथ बेच दी बनू क़नीक़ा ने उसे एक कीमती खजाना समझते हुए अपने पास सुरक्षित रख लिया यहूदी व्यापारी ने उस क्षेत्र के लोगों के बीच इस तरह की कहानियां फैलाना शुरू कर दी उन मनगढ़त कहानियों द्वारा वह यह साबित करना चाहता था कि अरबों में यहूदी क़बीलों का कितना प्रभाव है और वह किस कदर सम्मान रखते हैं उसने इस तरीके से अरब देहातियों और क़बीलों और साधारण लोगों में अपना एक स्थान बना लिया।
अनंततः उसने इरादा कर लिया कि वह स्थायी रूप से कतीफ के पास दारिया शहर में प्रवास करेगा और उसे अपनी गतिविधियों का केंद्र बनाएगा। उसके विचार में यह क्षेत्र अरब में बड़े यहूदी साम्राज्य की स्थापना के लिए मार्ग प्रशस्त करेगा, अपने इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उसने अरब के रेगिस्तानी लोगों से सम्बंध बढ़ाने शुरू कर दिए, उसने अपने आपको उन लोगों का राजा कहलवाना शुरू कर दिया।
इस अवसर पर दो क़बीलों, अजमान और कबीले बनू खालिद इस यहूदी की असलियत को जान गए और फैसला किया कि इस षड़यंत्र को यहीं समाप्त कर दिया जाए, दोनों क़बीलों ने मिल कर उस केंद्र दारिया पर हमला कर दिया और उस शहर की ईंट से ईंट बजा दी, जबकि मर्दखाई जान बचाकर भाग निकलने में कामयाब हो गया और अलआरज़ के पास अलमाली नाम से एक फार्म में शरण ली यही अलआरज़ आज रियाद के नाम से जाना जाता है।
जो सऊदी अरब के राजधानी है, मर्दखाई ने उस फार्म के मालिक .. जो बहुत बड़ा ज़मींदार था .. से अनुरोध किया कि वह उसे शरण दे, फार्म का मालिक इतना मेहमान नवाज़ था कि उसने मर्दखाई के अनुरोध को स्वीकार कर लिया और उसे अपने यहाँ पनाह दे दी लेकिन मर्दखाई अपने मेजबान के पास ठहरे हुए एक माह ही बीता था कि उसने अपने परोपकारी और उसके परिजनों की हत्या कर दी और बहाना यह किया उन सभी को चोरों के एक गिरोह ने हत्या कर दी है। इसके साथ उसने यह दावा भी किया कि इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना से पहले उसने जमींदार से सारी संपत्ति खरीद ली थी, इसलिए अब उसका अधिकार बनता है कि अब वह यहां एक बड़े जमींदार की हैसियत से रहे।
मर्दखाई ने इस जगह पर कब्जा जमा लेने के बाद इसका नाम बदल कर अपने पुराने खोए हुए क्षेत्र के नाम पर ऑले दारिया रखा और छीनी गई ज़मीन पर तत्काल ही एक बड़ा गेस्ट हाउस निर्माण करवाया जिसका नाम उसने मज़ाफा रखा, यहाँ रहते हुए उसने धीरे धीरे अपने मुरीदों का एक गुट तय्यार कर लिया जिन्होंने लोगों के बीच यह गलत प्रचार करना शुरू कर दिया कि मर्दखाई एक प्रसिद्ध अरब शेख है।
कुछ समय बाद उसने अपने असली दुश्मन शेख़ सालेह सलमान अब्दुल्लाह अलतमीमी को एक षड़यंत्र में एक मस्जिद में क़त्ल करवा दिया, इस चाल के बाद वह हर तरफ से संतुष्ट हो गया और दरिया को अपना स्थायी सहारा बना लिया, दरिया में उसने कई शादियां कीं, जिनके परिणाम स्वरूप वह दर्जनों बच्चों का बाप बना, उसने अपने उन सभी बेटे-बेटियों के नाम शुद्ध अरब नामों पर रखे, यहूदी मर्दखाई का यह वंश एक बड़े अरब परिवार का रूप धारण कर गया।
इस परिवार के लोगों ने मर्दखाई के पदचिन्हों पर चलते हुए अवैध तरीकों से लोगों की जमीनें हथियाने शुरू कर दीं और उनके खेतों पर कब्जा करना शुरू कर दिया, अब वह इतने शक्तिशाली हो गए कि जो कोई उनकी बुराई फैलाने के खिलाफ आवाज उठाता उसे मरवा देते, यह अपने प्रतिद्वंद्वी को कमज़ोर करने के लिए हर रणनीति का प्रयोग करते, अपने प्रभाव को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने राबिया और अलमसालीख जैसे प्रसिद्ध अरब क़बीलों को अपनी बेटियां दीं।
मर्दखाई की संतानों में से एक बेटे का नाम अल-मकारन था अल-मकारन के यहां पहला बेटा पैदा हुआ जिसका नाम मोहम्मद रखा गया था मोहम्मद के बाद अल-मकारन के यहां उसके दूसरे बेटे ने जन्म लिया जिसका नाम सऊद रखा गया।
सऊद वंश ने इसके बाद अरब जनजातियों के चयनित और मशहूर लोगों को मारना शुरू कर दिया और उन पर आरोप लगाया कि उन्होंने कुरआन की शिक्षाओं से मुंह फेर लिया है, इसलिए इस्लामी कानून के अनुसार वह मुर्तद हो गए थे और मुर्तद की सज़ा मौत है। सऊदी परिवार या आले सऊद के अपने दरबारियों के अनुसार और सऊदियों के निकट उस समय के नज्द के सभी लोग इस्लाम विरोधी थे, इसलिए उन सभी को मार देना, उनकी संपत्तियों को जब्त कर लेना और उनकी महिलाओं को दासी बना लेना जायज़ है। उनके निकट वह व्यक्ति जो मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब (उसके पूर्वज भी तुर्की के यहूदी थे) के विचारों से सहमत नहीं हैं वे इस्लाम से बाहर हैं, मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब की शिक्षाओं के अनुसार सऊद परिवार को इस बात की अनुमति थी कि वह अपने विरोधियों के गांवों को ध्वस्त करें, उनकी महिलाओं और बच्चों की हत्या करें उन महिलाओं के साथ बलात्कार करें, गर्भवती महिलाओं के पेट फाड़ के उनके बच्चों के हाथ पैर काट के उन्हें जिंदा जला दें, इस बर्बर परिवार ने क्रियात्मक रूप से इस मज़हब (वहाबियत) के नाम पर यह सब अपराध किए, वहाबियत का मत जो वास्तव में एक यहूदी की ईजाद था और जिसका उद्देश्य मुसलमानों के अंदर उग्रवाद और आतंकवाद व सांप्रदायिकता के बीज बोना था, उसके पैरूकारों ने 1163 हिजरी से आज तक हत्याओं का एक बाज़ार गर्म कर रखा है। आले सऊद का इस्लामी इतिहास के साथ एक और अत्याचार यह है कि उसने हिजाज़ का नाम भी बदलकर अपने परिवार के नाम पर सऊदी अरब रख दिया।
मानो यह सारे क्षेत्र उनकी निजी प्रॉपर्टी हैं और उसके निवासी उनके निजी गुलाम हैं। अपने स्वामी की खुशी के लिए दिन और रात एक किए हुए हैं।
सऊदी परिवार इस देश के सभी प्राकृतिक संसाधनों को अपनी निजी संपत्ति समझते हैं, अगर कोई आम इंसान इस परिवार के किसी व्यक्ति के खिलाफ आवाज उठाए तो सरे आम उसका सिर कलम कर दिया जाता है, एक बार एक सऊदी राजकुमारी ने अपने कुछ साथियों के साथ अमेरिका का दौरा किया, जहां फ्लोरिडा के एक होटल में उसने 90 कमरे बुक कराए जिनका एक रात का किराया एक लाख डॉलर था, क्या कोई सउदी नागरिक उसके विरूद्ध एक शब्द भी कह सकता है? अगर कहेगा तो उसका अंजाम हर कोई जानता है यानी किसी चौराहे पर सबके सामने जल्लाद के हाथों उसके सिर शरीर से अलग कर दिया जाएगा।
आले सऊद के यहूदी होने के प्रमाण।
1960 में मिस्र की राजधानी काहिरा के रेडियो स्टेशन "सौतुल अरब" और यमन की राजधानी के सनआ रेडियो स्टेशन ने इस बात की पुष्टि की कि आले सऊद के पूर्वज यहूदी थे।
सऊदी राजा शाह फैसल ने 17 सितंबर 1969 को वाशिंगटन पोस्ट को दिए गए एक साक्षात्कार में स्वीकार किया कि उसके पूर्वज यहूदी थे।
आले सऊद के एक कानूनी सलाहकार हाफ़िज़ वाही ने अल-अरब द्वीप नामक अपनी किताब में लिखा है कि शाह अब्दुल अजीज सऊद ने जिसका निधन 1953 में हुआ था, एक बार एक कहानी सुनाई और कहा कि हमारे सभी विरोधी क़बीलों के लिए इस घटना में एक इबरत है। बात यह है कि मेरे दादा सऊद ने एक बार अपने प्रतिद्वंद्वी जनजाति मसीर के कई लोगों को गिरफ्तार कर लिया और जब उसी जनजाति के लोगों का एक समूह उनके पास उन लोगों की रिहाई की सिफारिश लेकर आया तो अपने जल्लादों को आदेश दिया कि वह इन सभी कैदियों के सिर काट दे। फिर उसने उन कैदियों की सिफारिश के लिये आने वाले लोगों से कहा कि मैं अपने लिए एक उत्कृष्ट भोज का आयोजन किया है, तो दस्तरखान लगाया गया और दस्तरखान पर जो थाल रखे गए उनमें उन कैदियों के जिस्मों के भुने हुए अंगों और उनके ऊपर उन कैदियों के सिरों को सजा कर रखा गया था। सऊद ने सिफारिश के लिए आने वाले उन आदिवासियों से कहा कि खाना खाएं, आदिवासियों ने अपने भाइयों का मांस खाने से इंकार कर दिया तो उन्हें भी मौत के घाट उतार दिया गया। यह और इस प्रकार के कई और अत्याचार जो आले सऊद ने उनके साथ किए हैं जिन्होंने उनकी अवैध शासन के खिलाफ जरा भी आवाज उठाई है।
हाफिज़ वाही ने इस तरह की एक और घटना लिखी है कि जब इसी जनजाति के सरदार फैसल अलदरवेश को गिरफ्तार किया गया तो क़बीले के अग्रणी शेख अपने सरदार की रिहाई की सिफारिश लेकर सऊद के पास आए, राजा ने उनके शेखों उन्हीं की तरह पहले आने वाले सिफारशियों की आपबीती सुनाई और उनसे कहा कि तुम्हारे साथ भी यही व्यवहार हो सकता है। राजा ने फैसल अलदरवेश को उनकी सिफारिश के बावजूद मार दिया और जब यह लोग नमाज़ की तैयारी करने लगे तो उन्हें वज़ू के लिए फैसल दरवेश का खून पेश किया गया।
फैसल दरवेश का अपराध यह था कि उसने अब्दुल अजीज सऊद के अंग्रेजों के साथ उस समझौते पर टिप्पणी की थी जिसके तहत फिलीस्तीन को यहूदियों को सौंप दिया गया था। सऊद ने इस समझौते के दस्तावेज पर हस्ताक्षर 1922 में अलअजर में होने वाले एक सम्मेलन में किए थे। यह सभी सत्यापित तथ्य हैं जो इतिहास के पन्नों में सुरक्षित हैं। आले सऊद ने वहाबियत की छतरी तले जिन अपराधों को अंजाम दिया है वह दिल दहला देने वाले हैं। आले सऊद लाख अपनी असलियत को छिपाएं लेकिन उनके यह अपराध उनके चेहरे से नक़ाब उतारने के लिए काफ़ी हैं, एक न एक दिन बहरहाल उन्हें इसका हिसाब देना होगा।


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