हमें क्यों यक़ीन है कि ईरान के ख़िलाफ़ अमरीकी प्रतिबंध नाकाम रहेंगे, आने वाले दिनों में क्या हो सकती है तसवीर?

हमें क्यों यक़ीन है कि ईरान के ख़िलाफ़ अमरीकी प्रतिबंध नाकाम रहेंगे, आने वाले दिनों में क्या हो सकती है तसवीर?

जब इस्राईल के प्रधानमंत्री बिनयामिन नेतनयाहू इस्लामी गणतंत्र ईरान के ख़िलाफ़ अमरीकी प्रतिबंध लागू किए जाने को एतिहासिक दिन कहते हैं तो जितने भी सज्जन अरब और मुस्लिम नागरिक हैं उनके लिए अनिवार्य है कि इन प्रतिबंधों का निःसंकोच विरोध करें।

यह प्रतिबंध ईरान पर केवल इसलिए लगाए गए हैं कि वह पवित्र नगर बैतुल मुक़द्दस में इस्लामी व अरब धार्मिक स्थलों पर इस्राईली अतिग्रहण के ख़िलाफ़ लड़ने वाले मोर्चे का हिस्सा है। यदि यही ईरानी सरकार नेतनयाहू तथा उनके युद्ध मंत्री एविग्डर लेबरमैन के लिए रेड कारपेट बिछाती तथा इस्राईली जूडो टीम और अन्य खिलाड़ियों के लिए अपने देश के दरवाज़े खोल देती और अपनी धरती पर इस्राईल का राष्ट्रगान बजाने की अनुमति देती तो अमरीका की यहूदी लाबी ईरान की दोस्त बन जाती और अमरीकी वित्त मंत्रालय भी ईरान के लिए अपने दरवाज़े खोल देता।

राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने ईरानी जनता पर कड़े प्रतिबंध लगाकर वास्तव में इस्राईली एजेंडे पर काम किया है बिलकुल उसी तरह जिस तरह उनके पूर्ववर्ती रिपब्लिकन राष्ट्रपति जार्ज बुश ने इराक़ के साथ किया था। मगर ईरान पर जो प्रतिबंध लगाए गए हैं उनके सफल होने की संभावना एक प्रतिशत भी नहीं है। आठ देशों को इन प्रतिबंधों के मामले में छूट देना प्रतिबंधों की विफलता का पहला प्रमाण है। इन देशों ने कह दिया था कि वह अमरीकी प्रतिबंधों पर अमल नहीं करेंगे और ईरान से लगातार तेल ख़रीदते रहेंगे। यह देश ईरान पर पहले चरण के प्रतिबंध लग जाने के बावजूद ईरान के साथ व्यापार करते रहे थे।

हम ईरान से यही कामना करते हैं कि वहां की सरकार और जनता दोनों अमरीका तथा इस्राईल के सामने हरगिज़ पीछे न हटे, इस नाकाबंदी का डटकर मुक़ाबला करे, इराक़ और लीबिया के अनुभवों को नज़र के सामने रखे। क्योंकि अगर पीछे हटने का सिलसिला शुरू हुआ तो फिर वह कभी नहीं रुकता, आख़िरी चरण यह होता है कि उस देश पर हमला करके उसे क़ब्ज़े में ले लिया जाता है। हमें पूरा यक़ीन है कि ईरानी नेतृत्व जिसने परमाणु वार्ता के दौरान दुनिया की छह ताक़तों को वार्ता की मेज़ पर अपनी बौद्धिक क्षमता का कौशल दिखाया, इस हक़ीक़त को अच्छी तरह जानता है।

ट्रम्प ईरान से डरते हैं क्योंकि वह शक्तिशाली देश है, उसके पास मिसाइलों और रक्षा उपकरणों का बड़ा भंडार है जिससे वह अमरीका के घटकों को मिट्टी में मिला सकता है। यही कारण है कि अमरीकी सरकार ने ईरान पर हमला करने के बजाए प्रतिबंध लगाया है ताकि ईरान की जनता अपने शासन के विरुद्ध बग़ावत कर दे और इस्लामी लोकतांत्रिक व्यवस्था गिर जाए मगर अमरीकी राष्ट्रपति यह भूल जाते हैं कि ईरानी राष्ट्र पिछले चालीस साल से प्रतिबंधों का सामना करता आ रहा है और उसने कभी भी घुटने नहीं टेके और हमें किसी प्रकार का कोई संदेह नहीं है कि यह राष्ट्र इस बार भी घुटने नहीं टेकेगा।

हम आंकड़ों नहीं विवेक और तर्क के आधार पर बात करते हैं कि  जब आतंकी संगठन दाइश को अपने नियंत्रण वाले इलाक़ों के तेल के लिए ख़रीदार मिल गए थे तो क्या ईरान जैसा देश अपना देश बेचने में विफल हो जाएगा? वैसे हम इस तुलना के लिए माफ़ी चाहते हैं क्योंकि दोनों में किसी भी तरह से कोई भी समानता नहीं है। इसी तरह जब उत्तरी कोरिया नाकाबंदी के बावजूद परमाणु बम तथा अमरीकी धरती पर पहुंचने वाले अंतरमहाद्वीपीय मिसाइल विकसित करने में सफल हो गया तो क्या ईरान जैसा शक्तिशाली देश इस नाकाबंदी का सामना करने बल्कि उसका जवाब देने में सफल नहीं होगा?!

ग़ज़्ज़ा पट्टी के बेगुनाह और निहत्थे लोग दस साल से अधिक समय से इस्राईल तथा उसके अरब घटकों की नाकाबंदी झेल रहे हैं। इस बीच उन्हें इस्राईल के तीन युद्धों का भी सामना करना पड़ा मगर यह लोग इस प्रतिबंध में रहकर अपनी शक्ति इस स्तर पर बढ़ाने में सफल हो गए कि अपने मिसाइल हमलों से उन्होंने तीस लाख इस्राईलियों को भूमिगत शरण स्थलों में शरल लेने पर मजबूर कर दिया। फ़िलिस्तीनियों के आरंभिक चरण के मिसाइलों ने तेल अबीब एयरपोर्ट को 18 घंटों के लिए बंद कर दिया हालांकि ग़ज़्ज़ा वासी आधा पेट भोजन पर गुज़ारा कर रहे हैं, उन्हें रोज़ाना मात्र दो घंटे ही बिजली मिलती है और उनके लिए सारे रास्ते बंद हैं तो फिर ईरानी राष्ट्र जो महाद्वीप जैस विशाल क्षेत्र में आबाद है और वह चीज़ें प्रयोग करता है जिसे वह ख़ुद बनाता है और उन हथियारों से लड़ता है जिसका उत्पादन वह ख़ुद कर रहा है वह नाकाबंदी के सामने कहां झुकने वाला है?

इस्राईलियों और अमरीकियों इसी प्रकार उनके नए और पुराने अरब घटकों को सबसे बड़ा डर यह है कि वह प्रतिरोधक संगठन मज़बूत हो चुके हैं जिनका पोषण ईरान ने किया है और यह संगठन एक ख़ास दिन की प्रतीक्षा में हैं। हम यहा हिज़्बुल्लाह, हमास और जेहादे इस्लामी जैसे संगठनों की बात कर रहे हैं। इन संगठनों ने इस्राईल को उत्तर और दक्षिण से घेर रखा है। इन संगठनों विशेष रूप से हिज्बुल्लाह के मिसाइल इस्राईल ही नहीं अमरीका को भी ईरान पर एक भी गोली फ़ायर करने से पहले सौ बार सोचने पर मजबूर कर देंगे।

ईरान एक महाद्वीप जैसा देश है वह अमरीका की ओर से किए गए प्रतिबंधो के वार को सहन कर लेगा लेकिन अगर कभी इंतेक़ामी कार्यवाही के तहत सीरिया, हिज़्बुल्लाह, हमास और जेहादे इस्लामी ने इस्राईल पर वार कर दिया तो क्या इस्राईल इसे झेल पाएगा? क्या इस्राईल तब सांस भी ले पाएगा जब हर तरफ़ से उस पर मिसाइलों की बरसात होगी? अमरीकी वायु रक्षा उद्योग का स्टार कहे जाने वाले पैट्रियट मिसाइल जब यमन के हौसियों के बैलिस्टिक मिसाइलों को नहीं रोक पाए तो क्या हिज़्बुल्लाह के अत्याधुनिक मिसाइलों को जो दर्जनों नहीं सैकड़ों की संख्या में इस्राईल पर झपटेंगे इस्राईली वायु रक्षा प्रणाली उन्हें रोक पाएगी?

ईरान के राष्ट्रपति डाक्टर हसन रूहानी ने बताया कि जिस समय वह न्यूयार्क की यात्रा पर थे चार देशों ने कहा कि वह ट्रम्प से मुलाक़ात कर लें और वह इस मुलाक़ात के लिए मध्यस्थता करेंगे मगर डाक्टर रूहानी ने यह सारे प्रस्ताव ठुकरा दिए थे। डाक्टर रूहानी इस तरह के प्रस्ताव इसलिए ठुकरा रहे हैं क्योंकि उनके पांव मज़बूत हैं, उन्हें उस राष्ट्र का समर्थन हासिल है जो अपने प्रतिरोध के लिए मशहूर है और जिसे अमरीका का कोई डर नहीं है, अगर कोई इस राष्ट्र के बारे में कोई और बात करता है तो सच्चाई यह है कि उसे इस राष्ट्र की पहिचान ही नहीं है।

हम एक बार फिर पूरी स्पष्टता से कहते हैं कि जब नेतनयाहू ईरान पर प्रतिबंध लगाए जाने को एतिहासिक दिन कहते हैं तो हमारे लिए अब विकल्प चुनना आसान हो गया हो गया है और हमारा विकल्प यही होगा कि हम बिना किसी संकोच के नेतनयाहू के विरोधी मोर्चे के साथ खड़े होंगे। ज़िंदगी तो वही है जो सम्मान के साथ गुज़ारी जाए।


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