पतन की ढलान पर अमरीका का वर्चस्व, इस अवसर का कैसे फ़ायदा उठाया जाए?

पतन की ढलान पर अमरीका का वर्चस्व, इस अवसर का कैसे फ़ायदा उठाया जाए?

हालिया वर्षों में अमरीका को एक वर्चस्ववादी शक्ति के रूप में देखा गया जो राजनैतिक, आर्थिक और सामरिक दृष्टि से दुनिया पर छा जाने की क्षमता रखता था।

आज कट्टरपंथी नियो कंन्ज़रवेटिव विचारधारा और विशेष रूप से डोनल्ड ट्रम्प के नेतृत्व में अमरीका पुरानी डगर से हटकर नई विदेश नीति पर आगे बढ़ रहा है और साथ ही साथ एकध्रुवीय व्यवस्था में अपना वर्चस्व भी बाक़ी रखने की कोशिश में है। लेकिन सवाल यह है कि डोनल्ड ट्रम्प की आश्चर्यजनक नीतियां अमरीकी वर्चस्व को मज़बूत कर पाएंगी या यह वर्चस्व टूट जाएगा? इस सवाल का जवाब जानने के लिए निम्न लिखित बिंदु ध्यान योग्य हैं।

  1. अमरीका ने दुनिया की अन्य ताक़तों विशेष रूप से अपने यूरोपीय घटकों के साथ मिलकर अंतर्राष्ट्रीय नियमों की मदद से अपना वर्चस्व स्थापित किया था। अमरीकी वर्चस्व का एक महत्वपूर्ण बिंदु अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अमरीका की सक्रिय भूमिका तथा अन्य शक्तियों से सहयोग था। अब अमरीका अंतर्राष्ट्रीय जलवायु समझौते, सांस्कृतिक संस्था युनेस्को और इसके साथ ही ईरान परमाणु समझौते से बाहर निकल गया है। उसने अंतर्राष्ट्रीय नियमों को नज़रअंदाज़ करते हुए अपना दूतावास तेल अबीब से बैतुल मुक़द्दस स्थानान्तरित कर दिया है। इस स्थिति के चलते यूरोपीय घटकों ने अमरीकी वर्चस्व को चुनौती देना शुरू कर दिया है। यूरोपीय देशों का आपसी समन्वय इसी प्रकार ग़ैर यूरोपीय देशों से उनका नया सहयोग और इसी प्रकार ट्रम्प की एकपक्षीय नीतियों पर उनकी जवाबी कार्यवाही इस बात की निशानी है कि अमरीकी वर्चस्व को चुनौती मिल रही है।
  2. अमरीकी वर्चस्व में आज़ाद व्यापार की भूमिका भी अमरीकी सरकारों की बड़ी शक्ति समझी जाती थी। लेकिन आज ट्रम्प सरकार आज़ाद व्यापार के नियमों की उपेक्षा कर रही है। वह अपने घटकों के साथ आर्थिक युद्ध में पड़ गई है तथा अन्य देशों से होने वाले आयात पर भारी टैक्स लगाकर उसने अपने घटकों को अपना दुशमन बना लिया है। आज़ाद व्यापार के नियमों का पालन न करना और इसके बावजूद अपने वर्चस्व पर ज़ोर देना दो विरोधाभासी चीज़ें हैं।
  3. दुनिया के अनेक भागों में नई ताक़तों का उदय, क्षेत्रीय खिलाड़ियों का उभरना और स्थानीय संस्कृति पर उनका ज़ोर देना भी अमरीका के वर्चस्ववादी लक्ष्यों के रास्ते की रुकावट बना है। आज दुनिया के अधिकतर देश अपने हितों की रक्षा के लिए बहुध्रुवीय व्यवस्था को बेहतर समझते हैं और आपस में सहयोग के पक्षधर हैं। दुनिया के अधिकतर देश अमरीका के आक्रामक वर्चस्ववाद को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं।
  4. हालिया वर्षों में पश्चिमी एशिया के इलाक़े में जिसे मध्यपूर्व भी कहा जाता है अमरीका की पैठ से उसके वर्चस्ववाद को मज़बूत करने में मदद मिलती थी। लेकिन मध्यपूर्व में प्रतिरोध मज़बूत हो गया है और इसकी स्पष्ट झलक सीरिया में दिखाई दी है। इसके नतीजे में वह अंतर्राष्ट्रीय राजनैतिक व्यवस्था ख़तरे में पड़ गई जो अमरीका को पसंद है तथा अमरीकी वर्चस्ववाद के सामने एक और चुनौती पैदा हो गई। बहुत से टीकाकार यह कह रहे हैं कि सीरिया का संकट एकध्रुवीय व्यवस्था के लिए बहुत बड़ा धचका साबित हुआ है और यहा बहुध्रुवीय व्यवस्था का नया रास्ता मिला है। अब इस इलाक़े में नए खिलाड़ियों ने क़दम रख दिए हैं और यहां के हालात अब अमरीका की मर्ज़ी पर निर्भर नहीं हैं। दाइश भी अमरीकी लक्ष्यों को पूरा नहीं कर सका और परास्त होकर उसे इराक़ और सीरिया से बाहर निकलना पड़ा है।  
  5. अमरीका के नियो कन्ज़रवेटिव धड़े का जार्ज डब्ल्यू बुश के शासन काल से ही यह मानना था कि फार्स खाड़ी के क्षेत्र में इस्लामी रजानीति को पनपने नहीं देना चाहिए और इसे पश्चिमी लोकतंत्र की प्रतिस्पर्धी विचारधारा के रूप में फलने फूलने का मौक़ा नहीं मिलना चाहिए। अमरीका के राष्ट्रीय सरक्षा सलाहकार माइकल लेडीन का मानना था कि ईरान, सीरिया और सऊदी अरब जैसे देश अमरीका का अगला निशाना होना चाहिए और जब तक तेहरान और बग़दाद को जीता नहीं जाता उस समय तक सऊदी अरब पर हमला नहीं किया जा सकता इसलिए कि इस बात की आशंका होगी कि कहीं हम सऊदी अरब के तेल के संसाधनों को गंवां न बैठें। मगर आज हालत यह है कि सीरिया, इराक़, यमन और लेबनान में इस्लामी राजनीति आम जनता को मैदान में लाई है और पश्चिमी लोकतंत्र को ज़बरदस्त चुनौती दे रही है। दूसरी ओर सऊदी अरब अमरीका और ज़ायोनी शासन का स्ट्रैटैजिक साझीदार बन चुका है और उसे अमरीका का दुशमन नहीं समझा जाता। यह बदलाव भी ज़ाहिर करता है कि इलाक़े में अमरीका का वर्चस्व ख़तरे में पड़ चुका है।

इन बिंदुओं को देखते हुए यह समझा जा सकता है कि अमरीकी वर्चस्व पतन की ढलान पर जा रहा है। इन हालात में इस्लामी लोकतांत्रिक व्यवस्था को चाहिए कि हाथ आए अवसर का लाभ उठाकर अपने लक्ष्यों के लिए काम करे। इन हालात में उन देशों से बहुत अच्छा और सार्थिक सहयोग बढ़ाया जा सकता है जो अमरीका की एकपक्षीय नीतियों के विरोधी हैं। अवसर का लाभ उठाने का मतलब यह है कि रूस, चीन, भारत, पड़ोसी देशों, यूरोपीय संघ, दक्षिणी एशिया और पूर्वी एशिया के देशों इसी प्रकार अफ़्रीक़ा और लैटिन अमेरिका के देशों से सहयोग बढ़ाना है जो एकध्रुवीय व्यवस्था के ख़िलाफ़ हैं।

निश्चित रूप से अमरीका इस रास्ते में रुकावटें खड़ी करेगा और संभव है कि कुछ यूरोपीय देश भी अमरीका के सुर में सुर मिलाएं और ईरान पर आरोप लगाएं लेकिन सक्रिय कूटनीति और मीडिया के मध्यम से इन देशों को अमरीका की ख़ुफ़िया रणनीति से अवगत कराया जा सकता है।

सच्चाई यह है कि अन्य देशों के सहयोग से ही अमरीका की ताक़त बढ़ती है और अलग थलग पड़ जाने की स्थिति में इस देश का आक्रामक रुख़ कमज़ोर पड़ जाएगा।


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