ईरान पर प्रतिबंध लगाना ट्रम्प पर पड़ा भारी।

ईरान पर प्रतिबंध लगाना ट्रम्प पर पड़ा भारी।

ईरान की इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनई का मानना है कि अमरीका के साथ वार्ता समय की बर्बादी है क्योंकि ट्रम्प अपने हस्ताक्षर का भी सम्मान नहीं करते। ट्रम्प को चाहिए कि किसी भी प्रकार की मुलाक़ात की बात करने से पहले परमाणु समझौते के बारे में अपना फ़ैसला बदलें।

अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने ईरान के ख़िलाफ़ पहले चरण के प्रतिबंधों का एलान कर दिया है और दूसरे चरण के प्रतिबंधों की घोषणा नवम्बर में की जाएगी।
यह वास्तव में जंग का एलान है जिससे विश्व स्तर पर उथल पुथल मच सकती है क्योंकि यूरोपीय संघ, इसी तरह भारत, चीन और तुर्की ने औपचारिक रूप से कहा है कि वह इन प्रतिबंधों का पालन नहीं करेंगे।
राष्ट्रपति ट्रम्प ने प्रतिबंधों की घोषणा करने के साथ ही कहा कि वह ईरान से बिना शर्त वार्ता के लिए तैयार हैं। कुछ इस्राईली अख़बारों ने रिपोर्ट दी है कि यदि ईरान ने सहमति जताई तो संयुक्त राष्ट्र संघ महासभा के अधिवेशन के अवसर पर अमरीका और ईरान की वार्ता हो सकती है। समस्या यह है कि ट्रम्प यह चाहते हैं कि ईरान पूरी तरह हथियार डाल दे, परमाणु गतिविधियां पूरी तरह बंद कर दे, परमाणु प्रतिष्ठानों को ध्वस्त कर दे, मिसाइल कार्यक्रम ख़त्म कर दे, हिज़्बुल्लाह और हश्दुश्शअबी जैसे संगठनों का समर्थन बंद कर दे। मगर यह बात अमरीका को भी अच्छी तरह मालूम है कि ईरान इन मांगों को मानने वाला नहीं है।
राष्ट्रपति रूहानी ने ट्रम्प की ओर से वार्ता का प्रस्ताव आठ बार ठुकरा दिया अतः हमें संदेह है कि वह नवां प्रस्ताव स्वीकार करेंगे। ईरान की इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनई का मानना है कि अमरीका के साथ वार्ता समय की बर्बादी है क्योंकि ट्रम्प अपने हस्ताक्षर का भी सम्मान नहीं करते। ट्रम्प को चाहिए कि किसी भी प्रकार की मुलाक़ात की बात करने से पहले परमाणु समझौते के बारे में अपना फ़ैसला बदलें। यह बात राष्ट्रपति रूहानी कई बार कह चुके हैं।
राष्ट्रपति  रूहानी ने रशा टुडे को इंटरव्यू देते हुए कहा कि रूस और चीन ने कहा है कि वह अमरीका के प्रतिबंधों के बावजूद ईरान के साथ अपने आर्थिक सहयोग को जारी रखेंगे। यह घोषणा ट्रम्प और उनके घटकों के मुंह पर तमांचे से कम नहीं है। अमरीका के अरब घटकों और इस्राईल पर यह तमांचा बहुत ज़ोर से पड़ा है।
जब दो बड़ी शक्तियां अर्थात रूस और चीन कह रही हैं कि वह प्रतिबंधों के मामले में ईरान के साथ खाड़ी हैं और भारत, तुर्की तथा यूरोपीय संघ ने भी ईरान का साथ देने की बात कही है तो इसका मतलब यही है कि ईरान इस लड़ाई में अकेला नहीं है और ट्रम्प के मंसूबे का विफल होना तय है। बल्कि कुछ टीकाकार तो यहां तक कह रहे हैं कि ट्रम्प इन हरकतों से अपना राष्ट्रपति पद दांव पर लगा रहे हैं।
अब्दुल बारी अतवान
अरब जगत के प्रख्यात लेखक व टीकाकार


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