तालेबान और अमरीका की खींचतान में उलझे अफ़ग़ानिस्तान की क्या है विदेश नीति?

तालेबान और अमरीका की खींचतान में उलझे अफ़ग़ानिस्तान की क्या है विदेश नीति?

अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी ने शपथ लेने के बाद देश की विदेश नीति की कड़ियों का उल्लेख किया था। पड़ोसी देश, इस्लामी देश, पश्चिमी देश, एशियाई देश और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं। अफ़ग़ान राष्ट्रपति ने सबसे पहले पड़ोसी देशों का नाम लिया था लेकिन व्यावहारिक नीतियों की बात की जाए तो स्थिति कुछ अलग दिखाई देती है।

अशरफ़ ग़नी सरकार की विदेश नीति इस देश की आंतरिक नीतियों पर आधारित है और आंतरिक नीति में स्थिरता और शांति तथा आर्थिक विकास को सबसे अधिक महत्व हासिल है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए पड़ोसी देशों से अच्छे रिश्ते अफ़ग़ानिस्तान के लिए महत्वपूर्ण हैं। सुरक्षा ख़तरों का जहां तक सवाल है अफ़ग़ानिस्तान को लगता है कि उसे सबसे बड़ा ख़तरा पाकिस्तान से है इसलिए पाकिस्तान से अच्छे संबंध अफ़ग़ानिस्तान की प्राथमिकता है। आर्थिक विकास के लिए चीन, ईरान, उज़्बेकिस्तान और तुर्की से सहयोग अफ़ग़ानिस्तान के लिए महत्वपूर्ण है। इसलिए हम कह सकते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान की विदेश नीति में क़रीबी पड़ोसियों तथा दूर के पड़ोसियों अर्थात भारत और रूस से सहयोग का स्थान महत्वपूर्ण है। अशरफ़ ग़नी की सरकार को यह भी लगता है कि अमरीका और नैटो की मदद के बग़ैर क्षेत्र में शांति और सुरक्षा स्थापित नहीं की जा सकती इसीलिए उन्होंने अमरीका तथा यूरोपीय देशों से क़रीबी संबंध बनाने की कोशिश की।

मगर अफ़ग़ानिस्तान ने अमरीका, रूस और चीन के संबंध में अपनी विदेश  नीति बनाई तो वह संतुलन बाक़ी नहीं रख पाया। इस समय अशरफ़ ग़नी की सरकार का पूरा झुकाव पश्चिम और अमरीका की ओर है और इस दृष्टिकोण का बदलना कठिन नज़र आता है। अफ़ग़ानिस्तान को शांति व सुरक्षा की स्थापना में रूस की प्रभावी भूमिका की पूरी जानकारी है लेकिन अमरीका से अपने संबंधों के कारण वह मास्को से कोई मदद नहीं ले सकता। तालेबान से काबुल सरकार की वार्ता नाकाम हो जाने के बाद अब एसा लगता है कि काबुल सरकार इस संदर्भ में अपना नीति बदलना चाहती है और चार पक्षीय वार्ता के बजाए छह पक्षीय वार्ता शुरू करके उसमें ईरान और रूस को भी शामिल करना चाहती है। काबुल सरकार को यह यक़ीन होने लगा है कि मास्को और तेहरान की मदद से शांति की बहाली में सफलता हासिल की जा सकती है। अशरफ़ ग़नी ने अमरीका के साथ स्ट्रैटेजिक समझौते पर हस्ताक्षर करके रूस को ख़ुद से दूर कर दिया था और अब वह चाहते हैं कि एक बार फिर मास्को से क़रीब हों।

हालिया दिनों में हमने अमरीका के विदेश मंत्री माइक पोम्पेयो की काबुल यात्रा की ख़बर सुनी इसके नतीजे में राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी ने इस बात पर सहमति जताई कि अमरीकी सैनिकों की संख्या में वृद्धि की जाए। इससे पता चलता है कि अफ़ग़ान सरकार ने इस चरण में अमरीका को चुना है और अपने देश में लंबे समय तक अमरीकी सैनिकों की उपस्थिति जारी रखना चाहती है। हालांकि सच्चाई यह है कि अमरीका को अफ़ग़ानिस्तान में आतंकवाद से लड़ाई में कोई रूचि नहीं है। अमरीकियों ने तालेबान का मुक़ाबला करने के लिए दाइश को अफ़ग़ानिस्तान में उतार दिया है और यह संगठन इस समय अमरीका के प्राक्सी गुट के रूप में तालेबान से लड़ रहा है। इस तरह अमरीका को यह मौक़ा मिल गया है कि अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद खदानों पर ध्यान केन्द्रित करे और अपने आर्थिक हित साधे।

अफ़ग़ान राष्ट्रपति ने नैटो की बैठक में भाषण देते हुए कहा था कि वह वर्ष 2024 तक अफ़ग़ानिस्तान में नैटो की उपस्थिति चाहते हैं क्योंकि इस तरह वह तालेबान को शांति प्रक्रिया का हिस्सा बनने पर तैयार कर सकेंगे। हालांकि तालेबान का कहना है कि विदेशी सेनाओं के निकल जाने के बाद ही वह अफ़ग़ान सरकार से कोई वार्ता करेंगे।

नैटो और अमरीका के संबंध में राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी का जो दृष्टिकोण है उसे देखते हुए यह बहुत कठिन  लगता है कि काबुल सरकार भारत और पाकिस्तान से अपने संबंधों में कोई संतुलन बनाने के बारे में सोचे। ट्रम्प प्रशासन की नई रणनीति में भारत अमरीका के साथ है जबकि पाकिस्तान अमरीका के मुक़ाबले में खड़ा दिखाई देता है। इस स्थिति में काबुल सरकार भारत और पाकिस्तान से संबंधों में संतुलन कैसे बना सकती है। यही स्थिति तेहरान काबुल संबंधों के बारे में भी है। चूंकि अशरफ़ ग़नी की सरकार अमरीका और सऊदी अरब से पूरी तरह प्रभावित है इसलिए वह संतुलन नहीं बना सकती।

अफ़ग़ानिस्तान की सफलता इस पर निर्भर है कि वह अपने क़रीबी और दूर के पड़ोसियों तथा अमरीका और यूरोपीय देशों से अपने संबंधों और रिश्तों में संतुलन बनाए। अशरफ़ ग़नी सरकार क्षेत्र के बाहर के देशों विशेष रूप से अमरीका और यूरोप से संबंधों को प्राथमिकता देती है जब तक यह नीति जारी रहेगी उस समय तक पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों में सार्थिक प्रगति की संभावना नहीं है।                                                              मोहसिन पाकआईन (ईरान के पूर्व राजदूत)


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