जॉर्डन के सांसदों की इस्राईल के साथ साठगांठ समझौता रद्द करने की मांग

जॉर्डन के सांसदों की इस्राईल के साथ साठगांठ समझौता रद्द करने की मांग

जॉर्डन के सांसदों ने ज़ायोनी शासन के साथ 1994 में हुए शांति समझौते को रद्द करने की मांग की है।

जॉर्डन के कुछ सांसदों ने शनिवार को एक बयान में देश के नए राजदूत के अतिग्रहित फ़िलिस्तीन भेजे जाने का विरोध करते हुए बल दिया कि वॉशिंग्टन का अपने दूतावास को तेल अविव से बैतुल मुक़द्दस स्थानांतरित करना, इस शहर की स्थिति के संबंध में जॉर्डन के दृष्टिकोण के ख़िलाफ़ है।

जॉर्डन सरकार ज़ायोनी शासन के साथ साठगांठ प्रक्रिया में आगे आगे रही है। मिस्र के बाद जॉर्डन ही दूसरा अरब देश था जिसने इस शासन के साथ आधिकारिक रूप से राजनैतिक व आर्थिक संबंध क़ायम किए। ज़ायोनी शासन के साथ स्वशासित फ़िलिस्तीनी प्रशासन, मिस्र और जॉर्डन जैसी सरकारों की ओर से साठगांठ समझौते कभी लोकप्रिय नहीं हुए क्योंकि जनता ने इन समझौतों को कभी स्वीकार नहीं किया। लेकिन जॉर्डन सरकार देश की जनता की इच्छाओं के विपरीत अतिग्रहणकारी ज़ायोनी शासन से संबंध बढ़ाने की ओर बढ़ती गयी। जॉर्डन के भूतपूर्व शासक हुसैन बिन तलाल ने इस्राईल के साथ शांति समझौता किया जिस पर उनके बेटे व मौजूदा शासक अब्दुल्लाह द्वितीय पाबंद हैं।

ज़ायोनी शासन से संबंध ख़त्म करने के लिए जॉर्डन में गठित कमेटी इस शासन की अरब देशों से संबंध सामान्य करने की कोशिश को ऐसी साज़िश बताती है जिसका लक्ष्य इस शासन का क्षेत्र पर क़ब्ज़ा करना है।

जॉर्डन के राजनैतिक कार्यकर्ता जमील अन्नम्री ने देश के अलअरब अलयौम अख़बार से इंटरव्यू में बल दिया कि इस्राईल-जॉर्डन के बीच वादी अरबा नामक साठगांठ समझौते के नतीजे में किसी तरह की शांति क़ायम नहीं हुयी बल्कि इसने अपनी शर्तों से जॉर्डन के हाथ पैर बांध दिए और इस्राईल को फ़िलिस्तीनी राष्ट्र पर अत्याचार करने के लिए खुली छूट दे दी।

साठगांठ प्रक्रिया के नकारात्मक परिणाम की वजह से जॉर्डन की जनता इस्राईल के साथ हुए साठगांठ समझौते के रद्द होने और इस अतिग्रहणकारी शासन से संबंध ख़त्म करने की मांग कर रही है।


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