मोहर्रम

मोहर्रम

कर्बला की घटना के बारे में जो सवाल सबसे पहले मन में आता है वह यह है कि ऐतिहासिक दृष्टि से सन 61 हिजरी में क्या आशूरा की घटना उसी प्रकार घटी थी जैसा उसे आज हम जानते और पहचानते हैं?

इस सवाल का जवाब देने से पहले कहना चाहिए कि आशूरा की घटना इतिहास की आश्चर्यजनक घटनाओं में से एक है। इस घटना में कुछ साहसी लोग अपनी ईश्वरीय आस्थाओं की रक्षा के लिए हज़ारों की क्रूर व निर्दयी सेना के सामने अपनी अंतिम सांस तक डटे रहे और उन्होंने अपमानजनक जीवन पर सम्मानजनक मौत को प्राथमिकता दी। आशूरा की घटना के मुख्य नायक पैग़म्बरे इस्लाम के नाती इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम थे।

अब इस सवाल के जवाब की ओर आते हैं। इतिहासकारों का कहना है कि ऐतिहासिक दृष्टि से कर्बला की घटना जैसी इस्लामी इतिहास की कोई भी घटना ठोस और दस्तावेज़ी नहीं है। शिया और सुन्नी बल्कि ग़ैर मुस्लिमों के इतिहास में भी इस घटना को विश्वस्त हवालों के माध्यम से वर्णित किया गया है। कर्बला की मुख्य घटना इतिहास की अटल घटनाओं में से एक है, अलबत्ता इस घटना के आंशिक आयामों के बारे में अन्य सभी ऐतिहासिक घटनाओं की तरह अलग-अलग कथन हैं लेकिन इतिहासकारों के अनुसार इस समय कर्बला की घटना के बारे में हमारे पास जो कुछ मौजूद है वह 90 प्रतिशत तक सही और तथ्यों के अनुसार है।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के आंदोलन के आरंभ से लेकर उनकी शहादत तक की अधिकतर घटनाओं को पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों और इमामों ने बयान किया है जिनमें इमाम हुसैन के बेटे इमाम ज़ैनुल आबेदीन, उनकी बहन हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा और इमाम हुसैन के पोते इमाम मुहम्मद बाक़िर विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। कर्बला की कुछ घटनाएं दुश्मन के ख़ैमे में मौजूद रावियों या हदीस बयान करने वालों के माध्यम से हम तक पहुंची हैं। इसी तरह यज़ीद के कुछ सिपाहियों ने उसके सामने कर्बला की घटनाओं का वर्णन किया था जिसे इतिहासकारों ने लिख लिया था। यही कारण है कि कर्बला की कुछ घटनाओं के बारे में भिन्न-भिन्न बयान मिलते हैं।

 

कर्बला की घटना के बारे में एक दूसरा सवाल यह उठाया जाता है कि क्या यह घटना केवल शिया संस्कृति में ही महत्व रखती है और अन्य इस्लामी मत विशेष कर सुन्नी मुसलमान इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम पर होने वाले अत्याचार के संबंध में तटस्थ रहे हैं? सुन्नी मुसलमानों ने इमाम हुसैन के उच्च स्थान और आशूरा की घटना के बारे में बहुत सी किताबें लिखी हैं और सभी सुन्नी इमाम हुसैन से प्रेम करते हैं। बुख़ारी, तबरी और ज़हबी जैसे अधिकतर बड़े सुन्नी धर्मगुरू इमाम हुसैन के आंदोलन को सत्य आंदोलन मानते हैं और यज़ीद को अत्याचारी व अधर्मी कहते हैं। थोड़े बहुत सुन्नी धर्मगुरू हैं जो यद्यपि इमाम हुसैन को सत्य पर मानते हैं लेकिन यज़ीद को भी ग़लत नहीं कहते बल्कि वे कर्बला में हुए अमानवीय अपराध के लिए कुछ अन्य लोगों को दोषी ठहराने की कोशिश करते हैं।

सुन्नी धर्मगुरुओं के विचारों पर एक सरसरी नज़र डालने से ही यह बात स्पष्ट हो जाती है कि वे कर्बला की घटना पर दुखी रहते थे और इमाम हुसैन के आंदोलन को सही मानते थे। उनके अनुसरण में आम सुन्नी मुसलमानों की भी यही स्थिति थी। इस बीच वहाबी मत, जो कि एक पथभ्रष्ट मत है पूरी तरह से उमवी व यज़ीदी सोच रखता है और उसकी कोशिश है कि वह अपनी इस सोच को सुन्नी सोच के रूप में पेश करे। वहाबी, आशूरा और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत को केवल शियों का मामला दर्शाने की कोशिश करता है ताकि इमाम हुसैन के आंदोलन को महत्वहीन बना दे। अलबत्ता जिस तरह से इमाम हुसैन के प्रकाश को बुझाने के यज़ीदी और उमवी शासक के प्रयास विफल रहे उसी तरह वहाबियों का भी यह प्रयास कभी सफल नहीं होगा।

कर्बला की घटना के बारे में एक और सवाल जो बहुत से लोग उठाते हैं, यह है कि क्यों इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने मुआविया से संधि की लेकिन इमाम हुसैन ने यज़ीद से संधि नहीं की और शहादत को प्राथमिकता दी? इसके उत्तर में कहना चाहिए कि इमाम हसन और इमाम हुसैन दोनों ही पैग़म्बरे इस्लाम के नाती थे और उनके बारे में पैग़म्बर की हदीस है कि हसन और हुसैन इमाम हैं, चाहे वे संधि करें या तलवार लेकर उठ खड़े हों। वास्तविकता यह है कि दोनों का लक्ष्य एक ही था लेकिन दोनों की इमामत के काल की परिस्थितियां अलग अलग थीं। विभिन्न परिस्थितियों में इस्लाम की रक्षा के लिए भिन्न-भिन्न क़दम उठाने पड़ते हैं। इसी आधार पर कहा जा सकता है कि अगर इमाम हसन के काल में इमाम हुसैन के काल जैसी परिस्थितियां होतीं तो वे भी संधि न करते और उठ खड़े होते और इसी तरह अगर इमाम हुसैन के काल में इमाम हसन के काल जैसी परिस्थितियां होतीं तो वे भी संधि करते।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के आंदोलन में तीन अहम कारक थे जो इमाम हसन द्वारा मुआविया से संधि किए जाने के समय अलग रूप में थे। पहला कारक यह था कि यज़ीद की अत्याचारी व भ्रष्ट सरकार इमाम हुसैन से बैअत या आज्ञापालन का वचन चाहती थी जिसका अर्थ यह होता कि इमाम हुसैन यज़ीद को ख़लीफ़ा मान रहे हैं जबकि मुआविया ने इमाम हसन से बैअत की मांग नहीं की थी। इमाम हुसैन के आंदोलन का दूसरा कारक यह था कि कूफ़े के कम से कम 18 हज़ार लोगों ने पत्र लिख कर इमाम हुसैन को कूफ़ा आमंत्रित किया था और यज़ीद के भ्रष्ट शासन के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए अपनी तैयारी की घोषणा की थी। इस्लामी समाज के नेता के रूप में इमाम हुसैन को उन लोगों का सकारात्मक उत्तर देना ही था जबकि इमाम हसन के काल में कूफ़े के हालात इसके विपरीत थे। उनके समय में कूफ़े के लोग आपसी मतभेद का शिकार थे और स्वयं इमाम हसन कूफ़े में सुरक्षित न थे। इमाम हुसैन के आंदोलन का तीसरा कारक भलाई का आदेश देना और बुराइयों से रोकने का ईश्वर का अनिवार्य आदेश था और अगर पहले दो कारक न भी होते तो इमाम हुसैन केवल इस तीसरे कारक के आधार पर भी यज़ीद के ख़िलाफ़ उठ खड़े होते। यज़ीद खुल्लम खुला पाप और अपराध करता था और हलाल को हराम व हराम को हलाल करता था। इस तरह से उसने इस्लाम को ही ख़तरे में डाल दिया था और पैग़म्बर के नाती और उत्तराधिकारी होने की हैसियत से इमाम हुसैन इसकी अनदेखी नहीं कर सकते थे।

 

कर्बला की घटना के बारे में पूछा जाने वाला एक और सवाल यह है कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम कर्बला की यात्रा में अपने परिवार को क्यों साथ में ले कर गए थे? यह अत्यंत अहम सवाल है और इसके कई जवाब दिए गए हैं। जब इमाम हुसैन अलैहिस्सालम को यज़ीद की बैअत न करने पर जान की धमकी दी गई तो उन्होंने मदीने से पलायन को ही उचित समझा और लगभग सौ रिश्तेदारों और साथियों के साथ मक्के की ओर रवाना हो गए। उनके अधिकतर बच्चे, भाई, बहनें और भतीजे-भतीजियां व भांजे-भांजियां उनके साथ थीं। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि अगर इमाम हुसैन अपने परिजनों को मदीने छोड़ कर चले जाते तो उन्हें यज़ीद की ओर से ख़तरा रहता और संभव था कि वह उन्हें जेल में डाल कर इमाम हुसैन पर दबाव डालने की कोशिश करता। इस लिए वे अपने परिवार को अपने साथ ले गए।

कुछ अन्य विद्वानों का कहना है कि इमाम हुसैन युद्ध के इरादे से मदीने से नहीं निकले थे और अगर वे युद्ध के लिए निकलते तो निश्चित रूप से अपने घर की महिलाओं और बच्चियों को साथ न ले जाते। इन दो बातों के अलावा एक और अहम वजह भी है और वह इमाम हुसैन की ओर से अगले इमाम की जान की रक्षा और कर्बला के महान संदेश को दुनिया तक पहुंचाने की व्यवस्था है। अगर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत के बाद हज़रत ज़ैनब न होतीं तो आशूरा का संदेश, कर्बला से आगे न बढ़ पाता लेकिन हज़रत ज़ैनब ने कूफ़े और सीरिया में इमाम हुसैन की मज़लूमियत, यज़ीद के अत्याचार और कर्बला के संदेश से दुनिया को स्पष्ट रूप से अवगत करा दिया।

कार्यक्रम का अंत सुन्नी मुसलमानों के चार इमामों में से एक इमाम शाफ़ेई के आशूरा के बारे में कुछ शेरों से कर रहे हैं। वे कहते हैं कि आशूरा की घटना ने मेरी नींद उड़ा दी है और मेरे बालों को सफ़ेद कर दिया है। इस घटना ने मुझे अत्यंत दुखी कर दिया है और मेरी आंखों से आंसू जारी कर दिए हैं। हुसैन वो हैं जिन्हें बिना किसी अपराध व पाप के शहीद कर दिया गया। मुझे उन लोगों पर आश्चर्य है जो एक ओर तो पैग़म्बर के परिजनों पर दुरूद भेजते हैं और दूसरी ओर उनकी संतान की हत्या करते हैं और उन्हें यातनाएं देते हैं। अगर मेरा पाप, पैग़म्बर के परिजनों से प्रेम है तो मैं कभी इस पाप का प्रायश्चित नहीं करूंगा। पैग़म्बर के परिजन प्रलय में मुझे बचाने वाले हैं और अगर मैंने उनमें से किसी से भी दुश्मनी की तो मैंने अक्ष्मय पाप किया है।


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