पैग़म्बर स.अ. की ज़िंदगी के आख़िरी दिनों में क्या हुआ...

पैग़म्बर स.अ. की ज़िंदगी के आख़िरी दिनों में क्या हुआ...

मेरे भाई और मेरे सबसे क़रीबी को बुलाओ, उन्होंने अबू बक्र को बुला दिया वह जब आए तो पैग़म्बर स.अ. ने फिर कहा मेरे भाई और मेरे सबसे क़रीबी को बुलाओ, उन्होंने इस बार उमर को बुला दिया उन्हें देख कर फिर पैग़म्बर स.अ. ने अपनी बात दोहराई, तभी वहां मौजूद उम्मे सलमा ने कहा कि अली अ.स. को बुला रहे हैं, आख़िरकार इमाम अली अ.स. को बुलाया गया इमाम अली अ.स. तशरीफ़ लाए उसके बाद पैग़म्बर स.अ. और इमाम अली अ.स. ने कुछ देर एक दूसरे के कान में कुछ बातें कीं, जब इमाम अली अ.स. से इस बारे में पूछा गया तो आपने कहा मुझे इल्म के हज़ार दरवाज़े तालीम दिए हैं और इनमें से हर दरवाज़े से हज़ार दरवाज़े खुल गए, और मुझसे कुछ बातें कहीं हैं जिनपर मैं अमल करूंगा।

  पैग़म्बर स.अ. की ज़िंदगी के अख़लाक़ी पहलू और आपकी सीरत के अनेक पहलू के बारे में बहुत कुछ लिखा और पढ़ा जा चुका है, लेकिन आपकी ज़िंदगी का वह पहलू जिसके बारे में बहुत कम किताबों या आर्टिकल्स में मिलता है वह आपकी ज़िंदगी के आख़िरी समय के हालात हैं और शायद उस समय के हालात पर कम ध्यान देने के कारण उस समय की बहुत सारी हक़ीक़तों में फेर बदल किया गया और उसके बाद इतिहास के उन हालात का सामना होता है जो पैग़म्बर स.अ. की वफ़ात के बाद पेश आए, हम इस लेख में उन्हीं कुछ अहम हक़ीक़तों की तरफ़ इशारा करेंगे। 
पैग़म्बर स.अ. के ज़िंदगी के आख़िरी दिन थे और आप इमाम अली अ.स. के हाथ को पकड़ कर क़ब्रिस्तान की तरफ़ गए और क़ब्र में लेटे हुए लोगों के लिए आपने मग़फ़ेरत की दुआ की और फिर इमाम अली अ.स. से फ़रमाया कि जिब्रईल साल में एक बार मेरे सामने क़ुर्आन लेकर आते थे लेकिन इस साल दो बार लेकर आए हैं और इसके पीछे मेरी मौत के क़रीब होने के अलावा कोई और राज़ नहीं है, फिर आपने इमाम अली अ.स. से फ़रमाया अगर मैं इस दुनिया से चला गया तो तुम ही मुझे ग़ुस्ल देना, एक रिवायत में यह भी है कि आपने साथ में मौजूद लोगों से यह भी फ़रमाया कि अगर मैंने किसी से कोई वादा किया है तो उसे बता दे ताकि मैं पूरा कर सकूं और अगर किसी का कोई क़र्ज़ मेरे ज़िम्मे है तो बता दे ताकि अदा कर सकूं। 
जैसाकि कुछ रिवायतों से ज़ाहिर होता है कि पैग़म्बर स.अ. कुछ बीवियों, असहाब और अपने कुछ साथियों से नाराज़ थे, इसीलिए आपने बिदअत को फैलाने वालों का ज़िक्र करते हुए फ़रमाया, ऐ लोगों फ़ितने और फ़साद की आग भड़क चुकी है, फ़ितने अंधेरी रात की तरह तुम तक पहुंच चुके हैं और तुम लोगों के पास मेरे ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं है इसिलए कि मैंने न किसी हलाल को हराम क़रार दिया और ना ही हराम को हलाल क़रार दिया, मैंने केवल क़ुर्आन द्वारा हराम की गई चीज़ों को ही हराम कहा है, पैग़म्बर स.अ. उम्मत को फ़ितने की चेतावनी देने के बाद उम्मे सलमा के घर तशरीफ़ ले गए और दो दिन वहीं रुके और फ़रमाया ख़ुदाया तू गवाह रहना कि मैंने हक़ीक़तों को बयान कर दिया है, इसके बाद आप अपने घर तशरीफ़ ले गए और एक गिरोह को अपने पास बुलवाया और फ़रमाया क्या मैंने तुम लोगों से कहा नहीं था कि उसामह के लश्कर के साथ जाओ? अबू बक्र ने कहा मैं गया था लेकिन वापस आ गया ताकि दोबारा अहद कर सकूं, उमर ने कहा कि मैं नहीं गया क्योंकि मैं आपके हाल चाल पूछने के लिए किसी क़ाफ़िले का इंतेज़ार नहीं करना चाहता था। 
पैग़म्बर स.अ. बहुत नाराज़ हुए और उसी बीमारी की हालत में मस्जिद तशरीफ़ ले गए और उसामह के कमांडर बनाने पर आपत्ति जताने वालों से फ़रमाया, मैं उसामह के बारे में यह कैसी बातें सुन रहा हूं, तुम लोग इससे पहले उसामह के वालिद के कमांडर बनने पर भी आपत्ति जताते थे, ख़ुदा की क़सम वह कमांडर बनने के क़ाबिल थे और उनका बेटा उसामह भी कमांडर बनने के क़ाबिल है, पैग़म्बर स.अ. बिस्तर पर लेट कर भी लोगों से बार बार यही कह रहे थे कि उसामह के लश्कर में शामिल हो जाओ। 
इसके बाद पैग़म्बर स.अ. की तबीयत बिगड़ गई जिसे देख आपके घर की औरतें और बच्चे रोने लगे, थोड़ी देर बाद पैग़म्बर स.अ. ने आंख खोली और हुक्म दिया कि क़लम और दवात ले आओ ताकि तुम्हारे लिए ऐसा नुस्ख़ा लिख दूं जिसके बाद कभी गुमराह नहीं होगे, पैग़म्बर स.अ. के हुक्म के बाद कुछ लोग क़लम और दवात लेने चले गए इसी बीच वहीं बैठे एक शख़्स ने कहा पैग़म्बर स.अ. पर बीमारी का असर है इसलिए (मआज़ अल्लाह) वह हिज़यान बक रहे हैं, तुम लोगों के पास क़ुर्आन है और वही अल्लाह की किताब तुम लोगों के लिए काफ़ी है, इस शख़्स की घटिया बातों का कुछ लोगों ने विरोध भी किया लेकिन कुछ उसके तरफ़दार भी दिखाई दिए, उसी चीख़ पुकार के बीच वह पैग़म्बर स.अ. जिन्होंने पूरी ज़िंदगी इत्तेहाद और एकता को क़ायम करने में गुज़ार दी वह यह सब हालात देख कर काफ़ी नाराज़ हुए और उन सभी को अपने पास से भगा दिया। 
फिर पैग़म्बर स.अ. ने इमाम अली अ.स. की ओर देखा और उनसे वसीयत करना शुरू की और कहा ऐ अली (अ.स.) थोड़ा क़रीब आओ और फिर पास बुला कर आपने अपनी ज़ेरह, तलवार, अंगूठी और मोहर इमाम अली अ.स. को दी और फ़रमाया ऐ अली (अ.स.) जाओ अब घर चले जाओ, इसके बाद पैग़म्बर स.अ. आंख बंद कर के आराम करने लगे, कुछ देर बाद आपकी तबीयत फिर बिगड़ी और इस बार जब कुछ बेहतर हुई तो आपने घर की औरतों से कहा कि मेरे भाई और मेरे सबसे क़रीबी को बुलाओ, उन्होंने अबू बक्र को बुला दिया वह जब आए तो पैग़म्बर स.अ. ने फिर कहा मेरे भाई और मेरे सबसे क़रीबी को बुलाओ, उन्होंने इस बार उमर को बुला दिया उन्हें देख कर फिर पैग़म्बर स.अ. ने अपनी बात दोहराई, तभी वहां मौजूद उम्मे सलमा ने कहा कि अली अ.स. को बुला रहे हैं, आख़िरकार इमाम अली अ.स. को बुलाया गया इमाम अली अ.स. तशरीफ़ लाए उसके बाद पैग़म्बर स.अ. और इमाम अली अ.स. ने कुछ देर एक दूसरे के कान में कुछ बातें कीं, जब इमाम अली अ.स. से इस बारे में पूछा गया तो आपने कहा मुझे इल्म के हज़ार दरवाज़े तालीम दिए हैं और इनमें से हर दरवाज़े से हज़ार दरवाज़े खुल गए, और मुझसे कुछ बातें कहीं हैं जिनपर मैं अमल करूंगा। 
ज़िंदगी के एकदम आख़िरी दिनों में बेलाल को बुलाया ताकि लोगों को मस्जिद में जमा करें, उसके बाद आपने एक ख़ुत्बा इरशाद फ़रमाया और लोगों से कहा अगर किसी का कोई हक़ मेरे ज़िम्मे है तो वह मांग ले, किसी ने कोई जवाब नहीं दिया, पैग़म्बर स.अ. ने इसी बात को तीन बार दोहराया तभी एक ग़ुलाम खड़ा हुआ और अपने हक़ का सवाल किया, और पैग़म्बर स.अ. से बदला लेने के लिए एक कोड़ा हाथ में उठाया लेकिन जैसे ही पैग़म्बर स.अ. के पास आया आप से लिपट के रोने लगा, पैग़म्बर स.अ. ने फ़रमाया यह जन्नत में मेरा साथी होगा, फिर एक बीवी का हवाला देते हुए इमाम अली अ.स. को हुक्म दिया कि कुछ पैसा उनके पास रखा है उसे लेकर ग़रीबों और फ़क़ीरों में बांट दो। जब आपका बिल्कुल आख़िरी समय आया तो आपकी बेटी हज़रत ज़हरा स.अ. बहुत रो रहीं थीं, आपने उन्हें अपने पास बुलाया और कुछ कहा जिससे आप और ज़्यादा रोने लगीं, थोड़ी देर बाद फिर आपने कुछ कहा जिसे सुन कर आप मुस्कुराने लगीं, जब आपसे रोने और मुस्कुराने की वजह पूछी गई तो आपने फ़रमाया कि पहली बार में आपने कहा मेरी बेटी मैं इसी तकलीफ़ में इस दुनिया से गुज़र जाऊंगा जिसे सुन कर मैं रोने लगी थी और दोबारा में आपने कहा बेटी मेरे अहलेबैत अ.स. में से सबसे पहले तुम मुझसे मुलाक़ात करोगी जिसे सुन कर मुस्कुराने लगी थी, आपकी ज़िंदगी के आख़िरी समय में आपका सर इमाम अली अ.स. की गोद में था। 
पैग़म्बर स.अ. इस दुनिया से गुज़र गए, इमाम अली अ.स. ने वसीयत के मुताबिक़ आपको ग़ुस्ल दिया और कफ़न पहनाया, फिर आपने पैग़म्बर स.अ. के चेहरे को कफ़न से बाहर निकाला और चीख़ मार कर रोने लगे और कहा ऐ अल्लाह के रसूल आपकी वफ़ात से नबुव्वत और वही का सिलसिला ख़त्म हो गया और आसमानी ख़बरों का सिलसिला भी ख़त्म हो गया, ऐ अल्लाह के नबी अगर आपने सब्र करने का हुक्म न दिया होता तो मैं इतना रोता कि मेरी आंखों की रौशनी चली जाती, फिर आपने पैग़म्बर स.अ. को ख़ुद उस क़ब्र जिसे अबू उबैदा और ज़ैद इब्ने सहल ने घर के एक कमरे ही में खोदी थी उसमें दफ़्न कर दिया। 

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