नबियों की हुकूमतों के मुख्य उद्देश्य?

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Brief

अम्बिया अलैहिमुस्सलाम और विशेष रूप से पैग़म्बरे इस्लाम सल्लललाहो अलैहे व आलिही वसल्लम का दृष्टिकोण, यह है कि शासन का कर्तव्य, भौतिक हितों और आवश्यकताओं को पूरा करने के अतिरिक्त आध्यात्मिक हितों को पूरा करना भी है यहाँ तक कि आध्यात्मिक हितों का पूरा करना भौतिक हितों से श्रेष्ठ और उन पर प्राथमिकता रखता है

अबनाः अम्बिया अलैहिमुस्सलाम और विशेष रूप से पैग़म्बरे इस्लाम सल्लललाहो अलैहे व आलिही वसल्लम का दृष्टिकोण, यह है कि शासन का कर्तव्य, भौतिक हितों और आवश्यकताओं को पूरा करने के अतिरिक्त आध्यात्मिक हितों को पूरा करना भी है यहाँ तक कि आध्यात्मिक हितों का पूरा करना भौतिक हितों से श्रेष्ठ और उन पर प्राथमिकता रखता है, अर्थात शासन को ऐसे क़ानूनों को लागू करना चाहिए जिनका अंतिम लक्ष्य आध्यात्मिक, आत्मिक, नैतिक और मानवीय हितों को पूरा करना हो, वही मुद्दे जिनको धर्म इंसान का अंतिम लक्ष्य जानता है और मानवीय उन्नति व पूर्णता को उन्हीं पर निर्भर बताता है, इस संसार में आदमी का जन्म और उसके लिए अधिकार और स्वत्रंता की शक्ति का होना, यह सभी की सभी चीज़ें इसी कारण हैं कि मनुष्य अपने निर्णायक और अंतिम लक्ष्यों को पहचान ले और उसी पर क़दम बढ़ाए। इन सभी समस्याओं का अक्ष “क़ुर्बते ख़ुदा अर्थात अल्लाह से निकटता है” जैसा कि अल्लाह की कृपा से आज हमारे इस्लामी समाज में सब पर स्पष्ट है बल्कि सदैव मुसलमानों के बीच यह बात प्रचलित थी यहाँ तक कि जो लोग उसके सही अर्थ भी नहीं जानते लेकिन फिर भी इस शब्द से परिचित हैं और अनपढ़ और कम पढ़े लिखे लोग भी “क़ुरबतन एलल्लाह” को ज़बान पर जारी करते हैं।
अब जबकि यह बात मालूम हो गई कि मनुष्य के जन्म का अंतिम लक्ष्य, अल्लाह से निकटता है तो समाज में ऐसे क़ानूनों का लागू होना आवश्यक है जो इस लक्ष्य तक पहुंचाने में सहायक हों और मनुष्य का जीवन भी इसी दिशा में आगे बढ़े और मनुष्य के दूसरे पाश्विक पहलुओं की दूसरी समस्याएं इसी सूरत में महत्वपूर्ण हो सकती हैं जब वह समस्याएं मनुष्य को आध्यात्मिक कामों और अल्लाह से निकटता की मंज़िलों को तय करने में सहायक सिद्ध हों।
और जब यह बात सिद्ध हो चुकी कि सामाजिक क़ानूनों को बनाने का उद्देश्य भौतिक हितों की रक्षा करने के अतिरिक्त आध्यात्मिक हितों को बचाना भी है तो फिर शासन के उद्देश्य भी निश्चित व निर्धारित हो जाते हैं और सरकार को भी केवल लोगों की जान व माल की रक्षा ही को अपनी ज़िम्मेदारी नहीं समझना चाहिए, बल्कि उसके अतिरिक्त आध्यात्मिक कार्यों की उन्नति के लिए भी रास्ता बनाना तथा इस रास्ते में जो चीज़ें भी रूकावट बनें उनको रास्ते से हटाना भी शासन का कर्तव्य होता है, शासन को केवल इसी पर संतोष नहीं करना चाहिए कि मैने तुम्हारी रोटी के साधन उपलब्ध कर दिए हैं और तुम्हारी जान की सुरक्षा का प्रबंध कर दिया है और बस। यद्यपि यह ज़िम्मेदारी तो सभी हुकूमतों की होती है और सभी इस बारे में सहमत भी हैं कि हर एक समाज में चाहे वह इस्लामी हो या ग़ैर इस्लामी, सेकुलर हो या सेकुलर न हो, उसमें जो भी सरकार बने तो उसके लिए शांति व सुरक्षा स्थापित करना आवश्यक है। ताकि लोगों की जान व माल सुरक्षित रहे, लेकिन इस्लामी दृष्टिकोण से शासन अपनी ज़िम्मेदारी को केवल इसी चीज़ में सीमित नहीं कर सकता बल्कि उसको मानवीय गुणों, आध्यात्मिक व इलाही उन्नति को अपनी सबसे पहली ज़िम्मेदारी समझना चाहिए।
स्वाभाविक रूप से इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए सुख व शांति और लोगों की जान व माल की रक्षा के सिलसिले में शांति व सुरक्षा स्थापित करना आवश्यक होता है, यद्यपि इस शांति व सुरक्षा का स्थापित करना एक भूमिका है न कि असली लक्ष्य व उद्देश्य यही है।
दूसरे शब्दों में यूँ कहा जाए कि जान व माल की रक्षा करना मध्यम लक्ष्य हैं न निर्णायक व मौलिक लक्ष्य।  दूसरे तरीक़े से यूँ कहा जा सकता है कि यह शांति व सुरक्षा बुलंद व उच्च लक्ष्य तक पहुंचने का एक साधन है और वह उच्च लक्ष्य आध्यात्मिक कार्यों की उन्नति है। अतः समाज में वह क़ानून लागू हों जो न केवल धर्म के विपरीत और विरूद्ध न हों बल्कि उनको पूर्ण रूप से धार्मिक सिद्धाँतों के अनुकूल होना चाहिए और इंसान की आध्यात्मिक और इलाही उन्नति में मददगार व सहायक होना चाहिए। और केवल उनका धर्म के विपरीत न होना पर्याप्त नहीं है बल्कि धर्म के लक्ष्य में सहायक होना आवश्यक है। अर्थात इस्लामी हुकूमत न केवल यह कि उसके काम धर्म के विपरीत न हों बल्कि बेदीनी और धर्म के रास्ते में पाई जाने वाली रूकावटों से मुक़ाबला करे और धार्मिक लक्ष्य को अंत तक पहुंचाए।
अतः इस्लामी दृष्टिकोण से शासन या कार्य परिषद का लक्ष्य व उद्देश्य, केवल जान व माल की रक्षा करना नहीं है बल्कि उससे अधिक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक समस्याओं पर ध्यान देना अत्यन्त आवश्यक है, यहाँ तक कि सम्भव है कि एक इस्लामी समाज में आध्यात्मिक आवश्यकताओं को पूरा करने के कारण अस्थायी रूप से भौतिक आवश्यकताएं पूरी न हों और निश्चित रूप से अगर इस्लामी आदेश व क़ानून जारी हों तो फिर भविष्य में लोगों की भौतिक आवश्यकताएं भी अन्य हुकूमतों से बेहतर तरीक़े से पूरी होंगी, लेकिन अगर मान लें कुछ  अवधि तक लोगों की सभी भौतिक आवश्यकताओं को पूरा करने से धर्म के कमज़ोर होने की आशंका हो तो फिर ऐसे अवसर पर आवश्यक है कि लोगों की उन आवश्यकताओं को पूरा किया जो जिनसे धर्म कमज़ोर न हो, क्यों कि आध्यात्मिक हित भौतिक हितों पर प्राथमिकता रखते हैं लेकिन इस बारे में पश्चिमी देशों का दृष्टिकोण हमारे दृष्टिकोण से अलग है क्यों कि वह लोग केवल भौतिक समस्याओं और भौतिक लक्ष्यों पर ध्यान देतें हैं और उनका शासन आध्यात्मिक हितों को पूरा करने का ज़िम्मेदार नहीं होता है।


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