अमेरिकी अधिकारी अपनी गीदड़ भभकियों से पीछे हटे

अमेरिकी अधिकारी अपनी गीदड़ भभकियों से पीछे हटे

रोचक बात यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बारमबार बड़े विश्वास से कहा था कि जब ईरान के तेल का निर्यात बंद हो जायेगा तो इस देश में या विद्रोह हो जायेगा या ईरानी अधिकारी अमेरिका से वार्ता करने के लिए मजबूर हो जायेंगे।

अमेरिकी अधिकारियों ने कई सप्ताहों तक ईरानी तेल के निर्यात को शून्य तक पहुंचाने की धमकी दी परंतु अब वे पीछे हट गये हैं और अंततः अमेरिकी वित्तमंत्री ने घोषणा की है कि यह देश ईरान से तेल ख़रीदने वाले देशों को माफ कर देगा।

स्टिविन मिनकेन ने अमेरिकी सरकार के पूर्व के दृष्टिकोण से स्पष्ट रूप से पीछे हटते हुए कहा कि ईरान से तेल ख़रीदने वालों को चाहिये कि ईरान से 20 प्रतिशत से भी कम तेल का आयात करें ताकि उन्हें अमेरिकी माफी मिल सके जबकि अमेरिकी अधिकारी इससे पहले बल देकर कह रहे थे कि वे पांच नवंबर से ईरानी तेल के निर्यात को शून्य तक पहुंचा देंगे।

इसी प्रकार इन अधिकारियों ने कहा था कि बहुत ही मजबूरी की स्थिति में ईरान से तेल ख़रीदने वाले कुछ ही देशों को माफ किया जायेगा।  

इससे पहले अमेरिका में पूंजी निवेश बैंक के एक वरिष्ठ अधिकारी फ्रेंचेस्को ब्लेन्च ने कहा था कि मेरे अनुसार ईरानी तेल के निर्यात को पूरी तरह बंद करना और उस पर निगरानी रखना बहुत कठिन कार्य है और संभवतः प्रति बैरेल तेल की कीमत 120 डालर तक पहुंच जायेगी।

अलबत्ता गुंडागर्दी पर आधारित अमेरिकी रवइये के दृष्टिगत इस बात की अपेक्षा की जा सकती है कि कुछ समय के लिए ईरानी तेल के निर्यात में कमी हो जाये परंतु तेल की कीमतों में जो वृद्धि होगी उससे तेल के निर्यात की कमी की लगभग भरपाई हो जायेगी।

रोचक बात यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बारमबार बड़े विश्वास से कहा था कि जब ईरान के तेल का निर्यात बंद हो जायेगा तो इस देश में या विद्रोह हो जायेगा या ईरानी अधिकारी अमेरिका से वार्ता करने के लिए मजबूर हो जायेंगे।

बहरहाल अब यह स्पष्ट हो गया है कि ईरान के खिलाफ अमेरिका की एकपक्षीय कार्यवाहियों का प्रभाव उससे भी कम होगा जितना ट्रंप सरकार प्रचार कर रही थी।

वास्तव में ट्रंप सरकार ईरान के साथ होने वाले परमाणु समझौते को बहाना बनाकर अपनी इच्छा को विश्व समुदाय पर थोपना और उससे चाहती थी कि वह उसका अनुपालन करे परंतु विश्व समुदाय ने जिस तरह ट्रंप सरकार की मांगों की उपेक्षा करके उसका जवाब दिया है उससे अमेरिकी अधिकारी अपने दृष्टिकोणों व बयानों से पीछे हटने पर बाध्य हुए हैं और अमेरिकी वित्तमंत्री के बयान को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है।


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