अल्लाह के एक होने का सबूत

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पिछले लेख में इस सृष्टि के रचनाकार अल्लाह का वुजूद साबित हुआ वह दूरदर्शी अल्लाह जो इस दुनिया को जन्म देने वाला और उस बाकी रखने वाला और पिछले पाठों में हम ने भौतिकवचार धारा की बी समीक्षा की और विभिन्न तरह के विचारों की समीक्षा करने के बाद यह स्पष्ट हुआ कि बिना अल्लाह के दुनिया की रचना आर्तिकक विचार है और इस का कोई औचित्य नहीं है।
पिछले लेख में इस सृष्टि के रचनाकार अल्लाह का वुजूद साबित हुआ वह दूरदर्शी अल्लाह जो इस दुनिया को जन्म देने वाला और उस बाकी रखने वाला और पिछले पाठों में हम ने भौतिकवचार धारा की बी समीक्षा की और विभिन्न तरह के विचारों की समीक्षा करने के बाद यह स्पष्ट हुआ कि बिना अल्लाह के दुनिया की रचना आर्तिकक विचार है और इस का कोई औचित्य नहीं है।
अब हम यहाँ पर उस रचनाकार और अल्लाह के एक होने की चर्चा करेंगे तथा अनेकेश्वरवादियों की धारणाओं के गलत होने को भी साबित करेंगे।
इस बारे में कि अनेकिस्वरवादी आईडियॉलोजी किस तरह से इंसान में पैदा हुई विभिन्न तरह के मत पाए जाते हैं जो समाज शास्त्रियों ने पेश किए हैं लेकिन किसी भी स्पष्ट व ठोस सबूत नहीं पेश किया है।
शायद यह कहा जा सकता है कि अनेकेश्वरवाद की ओर झुकाव और कई अल्लाह मानने का पहला कारण, आकाश व धरती की चीज़ों और प्रक्रियाओं की विधिता रही है जिस के आधार पर यह समझा गया कि हर प्रक्रिया एक विशेष अल्लाह के नियंत्रण में है। इसी तरह से कुछ लोगों ने यह समझा कि अच्छाईयों का अल्लाह अलग है और बुराईयों का अल्लाह अलग है और इस तरह से इन लोगों ने दुनिया के लिए दो स्रोतों की धारण बनाई। दूसरी और सूरज और चंद्रमाँ के ज़मीन पर पड़ने वाले प्रभाव और ज़मीन में उन की भूमिक को ध्यान में रखते हुए यह धारणा बनी कि ज़मीन वासियों के लिए एक तरह से वह परवरदिगार हैं।
इसी तरह देखे और महसूस किए जाने योग्य अल्लाह में रूचि भी इस बात का कारण बनी की लोग विभिन्न तरह के ईश्वर, मुर्तियां और निशानी व प्रतीक बनाएं और उन की पूजा करें और धीरे धीरे अज्ञान लोगं के बीच यह प्रतीक और मूर्तियाँ ख़ुद ही अल्लाह समझी जाने लगीं और हर राष्ट्र व समुदाय ने अपनी धारणाओं और अंध विश्वासों के आधार पर अपने लिए विशेष तरह के पूजा संस्कारों का संकलन किया ताकि एक ओर तो पूजने की अपनी नेचर को, वैकल्पिक रूप से शांत कर सकें और दूसरी ओर अपनी इच्छाओं और कामनाओं की भी पवित्रता व दीन के रूप में पूर्ति कर सकें और यह कारण है कि आज भी बहुत से धर्मों में नाच, गाना तखा शराब पीकर अश्लील काम करना धार्मिक संस्कारों व कामक्रमों का भाग बना हुआ है।
इस के अलावा भी समाज पर अपना अधिकार और वर्चस्व जमाने की कोशिश करने वाले भी, आम लोगों में इस तरह की आईडियॉलोजी व धारण के जन्म लेने का कारण बने हैं। इसी लिए समाज पर अधिकार की इच्छा रखने वाले बहुत से लोगों ने आम लोगों के बीच अनेकेश्वरवादी धारम पैदा की और ख़ुद को भी परवरदिगार व अल्लाह तखा पूजा योग्य दर्शाया तखा राजा महाराओं की पूजा को धार्मिक संस्कार का रूप दिया जैसा कि हम चीन भारत, ईरान और मिस्र आदि देशों के राजाओं के बारे मे पढ़ते हैं।
प्रत्येक दशा में अनेकेश्वरवादी संस्कार व धारण के जन्म लेने के बहुत से कारण हैं और यह एकेस्वरवाद की छत्रछाया में इंसान समाज के विकास के रास्ते की मुख्य बाधा है और यही कारण है कि इलाही पैग़म्बरों के संघर्ष का एक बड़ा भाग अनेकेश्वरवादी और अनेकेश्वरवादियों के विरुद्ध अभियान में व्यतीत हुआ जैसा कि क़ुर्आन मजीद में इन इलाही पैग़म्बरों का बार बार बयान किया गया है।
इस आधार पर अनेकेश्वरवादी मत में अल्लाह के अतिरिक्त एक या की दूसरे लोगों के परवरदिगार होने में भी यक़ीन रखा जाता है। यहाँ तक कि बहुत से अनेकेश्वरवादी दुनिया के लिए एक ही रचयता होने में विश्वस रखते थे और वास्तव में वह दुनिया की रचना के मामले में एकेश्वरवादी आईडियॉलोजी में ईमान रखते थे लेकिन उसके बाद के चरण में दूसरी श्रेणी में देवताओं को मानते थे और कुछ लोगों के विचार में इं इस तरह के देवता वास्तव में जिन्न और परी थे। इसी तरह कुछ दूसरे लोगों का मानना था कि सितारों की आत्मा या कुछ विशेष लोगों या विशेष तरह के प्राणियों की आत्माएं दुनिया को चलाने में अल्लाह की सहायता करती हैं।
दसवें पाठ में हम ने इशारा किया कि वास्तविक से सचयता और परवरदिगार होना केवल एक ही वुजूद की विशेषता हो सकता है और यह दोनों गुण एक दूसरे से अलग नहीं हो सकते यानी यह संभव नहीं है कि दुनिया का रचयता कोई और हो और लोगों का परवरदिगार कोई अन्य, और जो लोग इस तरह का यक़ीन रखते हैं उन्हों ने इस में पाए जाने वाले विरोधाभास की ओर ध्यान नहीं दिया है। इसी लिए इस आईडियॉलोजी को गलत साबित करने के लिए केवल उस में मौजूद विरोधाभास का ही बयान काफी है।
अल्लाह के एक होने को साबित करने के लिए बहुत से सबूत व तर्क पेश किये गये हैं लेकिन यहाँ पर हम केवल उन्हीं तर्कों और सबूत का बयान करेगें जो सीधे रूप से एकेश्वरवादी से संबंधित हैं।
अल्लाह के एक होने का सबूत
अगर यह मान लिया जाए कि इस सृष्टि की रचना दो या कई ईश्वरों ने मिल कर की है त इस धारण के लिए कुछ दशाएं होंगीः या तो दुनिया की हर चीज़ को उन सब ने मिल कर बनाया होगा या फिर कुछ चीज़ों को एक ने और कुछ दूसरे को दूसरों ने बनाया हो गा या फिर सारी चीज़ों को किसी एक ने बनाया होगा लेकिन दूसरे देवता दुनिया को चलाते होंगे।
लेकिन अगर यह माना जाए कि हर रचना को कई लोगों ने मिल कर बनाया है तो सह संभव ही नहीं है क्योंकि इस धारणा का मतलब यह होगी कि दुनिया की एक चीज़ को दो या कई देवताओं ने मिल कर बनाया है और हर एक ने एक वुजूद को बनाया है जिस से हर चीज़ के लिए कई वुजूद हो जाएँगे जब कि चीज़ का केवल एक ही वुजूद होता है नहीं तो वह चीज़ एक नहीं होगी।
लेकिन अगर यह माना जाए कि कई देवताओं में से प्रत्येक किसी चीज़ विशेष या कई चीज़ों को पैदा करने वाला है तो इस का मतलब होगा कि हर सचना अपने रचनाकार के बल पर ही वुजूद मं आई होगी और उसे अपने वुजूद की ज़रूरत होगी जिस ने उसे बनाया है लेकिन इस तरह की ज़रूरत सारी चीज़ों को बनाने वाले आख़री रचनाकार की होती है जो वास्तव में अल्लाह है।
दूसरे शब्दों में दुनिया के लिए कई अल्लाह मानने का मतलब यह होगा कि दुनिया में कई तरह की व्यवस्थाएं जो एक दूसरे से अलग हैं पाई जाती हैं जब कि दुनिया की एक ही व्यवस्था है और सारी प्रक्रियाएं एक दूसरे के साथ जुड़ी हुई हैं और एक दूसरे को प्रभावित भी करती हैं और उन्हें एक दूसरे की ज़रूरत भी होती है। इसी तरह से पहले की प्रक्रिया से संबंध रखती है और पहले की हर प्रक्रिया, अपने बाद की प्रक्रिया के वुजूद में आने की भूमिका प्रशास्त करती है तो फिर ऐसा दुनिया जिस में चीज़ें और प्रक्रियाएं एक दूसरे से जुड़ी हुई हों और सब कुछ एक व्यवस्था के अंतर्गत हो वह कई कारकों का नतीजा नहीं हो सकता।
और अगर यह मान लिया जाए कि वस्तुतः अल्लाह एक ही हैं लेकिन उसकी सहायता के लिए और दुनिया को जलाने के लिए कई दूसरे देवता भी मौजूद हैं तो भी यह सही नहीं होगा क्योंकि हर चीज़ हर अपने पूरे वुजूद के साथ ख़ुद को वुजूद में लाने वाले संबधित है और उसी के सहारे बाकी रहती है और किसी दूसरे वुजूद में उसे प्रभावित करने की ताक़त नहीं होती। अगरचे यहाँ पर वह प्रभाव हमारा आशय नहीं है जो एक कारक के परिणामों के बीच होता है और सब के सब एक करता के आधिकार के अंतर्गत एक दूसरे को प्रभावित कते हैं और उन के समस्त प्रभाव उसी करता की अनुमति से होते हैं। क्योंकि ऐसी दशा में उन में से कोई भी परवरदिगार नहीं हो सकता क्योंकि परवरदिगार के वास्तविक अरथ यह हैं कि उसे अपनी रचनाओं पर वास्तविक व आज़ाद प्रभाव की ताक़त हासिल हो कंतु धारण यह है कि इस तरह से प्रभाव और अधिकार आज़ाद नहीं होते बल्कि सब के सब एक प्रभावी वुजूद व परवरदिगार के अंतर्गत होते हैं अगर ऐसा माना जाए यानी यह कि वास्तव में दुनिया का रचनाकार एक है और दूसरी बहुत सी शक्तियाँ उसकी अनुमति से बहुत से कामों को संभालती हैं तो फिर यह यक़ीन एकेश्वरवादी आईडियॉलोजी के विपरीत नहीं होगी इसी तरह से अगर किसी चीज़ की रचना भी एक अल्लाह के विपरीत नहीं होगा इसी तरह से अगर किसी चीज़ की रचना भी एक अल्लाह की अनुमति से हो ते फिर वह एक अल्लाह पर यक़ीन और एक ही परवरदिगार में ईमान के विपरीत नहीं होगी और क़ुर्आने मजीद और पैग़म्बरें इस्लाम तथा दूसरे महान मार्गदर्शकों के कथनों में बी कुछ लोगों के लिए इस तरह से यानी गैर आज़ाद रूप से रचना और व्यवस्था की बात की गय ही जैसा कि क़ुर्आने मजीद में हज़रत ईसा अ0 के लिए कहा गया है किः
जब तुम मिट्टी से पंछी जैसी चीज़ बनाते हो और फिर उस में फ़ूंकते हो तो वह मेरी अनुमति से पंछि बन जाता है।
या फिर एक दूसरे स्थान पर कहा जाता हैः
और कामों को संभालने वाले।
नतीजा यह निकला कि दुनिया के लिए कई अल्लाह की धारणा, भौतिक कारकों से अल्लाह की तुलना का परणाम है कि जिस में एक चीज़ के लिए कई कारकों को होना संभव होता है। हॉलांकि सृष्टि की रचना करने वाले कारक को भौतिक कारकों के समान नहीं समझा जा सकता और कोई भी चीज़ आज़ाद रूप से कई कारकों का नतीजा नहीं रो सकती और न ही दुनिया की व्यवस्था चलाने वाले को एक से ज़्यादा समझा जा सकता है।
इस आधार पर , इस धारणा के निवारण के लिए एक ओर तो सृष्टि के मुख्य कारक और सृष्टि से उसके संबध के तरह तखा दुनिया की उस पर निर्भरता जैसे विषयों पर चिंतन करना चाहिए ताकि यह स्पष्ट हो जाए कि इस तरह व्यवस्था कई ईश्वरों या कई आज़ाद पालनहारों के अंतर्गत नहीं हो सकती।
इस के साथ यह भी स्पष्ट हो गया कि कुछ योग्य मनुष्यों के लिए अल्लाह की अनुमति से सृष्टि पर प्रभाव डालने की ताक़त को स्वीकार करना तौहीद में यक़ीन के विपरीत नहीं है। जैसा कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम तखा उन के वंश के इमामों को सृष्टि में जो अधिकार हासिल थे वह अल्लाह की अनुमति से और उसके द्वारा दिए गये थे और वह उन में स्वाधीनता के साथ प्रभाव नहीं डाल सकते थे इसी लिए उन के इस अधिकार को मानने और अल्लाह को एक मानने में कोई विरोधाभास नहीं है।
प्रश्नः
1.  अनेकेश्वरवाद के कारणों का बयान करें।
2.  अनेकेश्वरवाद में यक़ीन का आधार बताएं।
3.  रचनाकार व परवरदिगार के बीच वाजिब व ज़रूरी सबंध का बयान करे।
4.  किसी एक चीज़ के लिए कई रचनाकार क्यों नहीं हो सकते ?
5.  विशेष तरह की कई चीज़ों के लिए एक विशेष रचनाकार में यक़ीन क्यों नहीं रखा जा सकता ?
6.  इस में क्या बुराई है कि पूरे दुनिया के लिए अल्लाह को माना जाए लेकिन इसी के साथ दुनिया की व्यवस्था चलाने के लिए दूसरे कई देवताओं में भी यक़ीन रखा जाए।
7.  कई अल्लाह की धारण का स्रोत क्या है, और इस का कैसे नीवारण किया जा सकता है ?
8.  अल्लाह के विशेष दासों के लिए कुछ शक्तियों को स्वीकार करना, अल्लाह के एक होने और उसी के परवरदिगार होने में यक़ीन रखने के विपरीत क्यों नहीं है ?


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सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह ख़ामेनई का हज संदेश
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