‘अरब सबकान्टीनेंट की भौगोलिक,समाजिक और कल्चरल स्थिति

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रेगिस्तान के बाशिन्देअरब प्रायद्वीप का उत्तरी इलाक़ा (हिजाज़) अधिकतर रेगिस्तानी है इसलिए वहां के अधिकतर क़बीले इसलाम के आगमन से पहले जंगल व रेगिस्तान मे जानरों जैसी घुमन्तू ज़िन्दगी गुज़ारते थे। बद्दू अरब नेचुरल नज़ारों से वन्चित थे और अपने जीवनयापन के लिए केवल जानवरों को पालने पर निर्भर थे और वह भी सीमित व पुराने ढर्रे पर। वह लोग भेड़ बकरियों के ऊन और ऊंट के बालों से बने हुए तम्बुओं में ज़िन्दगी बसर करते थे। और जिस जगह पानी मौजूद हो वहां जाकर बस जाते थे और पानी व हरियाली के समाप्त हो जाने के बाद दूसरे इलाक़े की ओर कूच करने पर मजबूर हो जाते थे, यह लोग हरियाली व चराहगाह की कमी की वजह से केवल कुछ ऊंट और छोटे से गल्ले के अलावा दूसरे चौपाए नही रख सकते थे जैसा कि कहा गया है रेगिस्तान मे तीन चीज़ों “बद्दू अरब,ऊंट और खजूर के पेड़ों की हुकूमत होती है” और अगर इसमे रेत की भी बढ़ोत्तरी कर दी जाए तो मुख्य तौर पर चार चीज़ों का रेगिस्तान पर अधिकार होता है। पानी की कमी, गर्मी की ज़्यादती, रास्तों की कठिनाईयां, और खाने की कमी, आमतौर से इंसानों के बड़े दुश्मन हैं और इंसानों को डर व ख़तरा इन्ही से होता है और यही वजह है कि जब यह पता हो कि अरब और रेगिस्तान ने कभी भी ग़ैरों के क़ब्ज़े को अपने ऊपर सहेन नही किया तो हमें आश्चर्य नही करना चाहिए, रेगिस्तान का सूखापन,एकाकीपन और एक जैसी ज़िन्दगी का असर उनके दिल व दिमाग़ मे घर कर गया था। यह लोग खेती किसानी या दूसरे कामों को अपनी शान के ख़िलाफ़ समझते थे, इसलिए सभ्य सरकारों और शहरी सिस्टम को गिरी हुई निगाह से देखते थे और रेगिस्तानी व घुमन्तू ज़िन्दगी बसर करने को वरीयता देते थे, और यह बात इनकी पैदाइशी आदत मे शामिल थी।यह लोग एक बड़े रेगिस्तान के सपूत और आज़ादी पसंद थे इस लिए बिना किसी इमारती रुकावट के साफ़ सुथरी हवा में सांस लेते थे, सूरज की लगातार पड़ने वाली गर्मी और बाढ़ के पानी को रोकने के लिए कोई साधन नही थे बल्कि सभी चीज़ें अपनी प्राकृतिक अवस्था पर थीं।खेती किसानी और कारोबार ने उन्हें व्यस्त या बांधकर नही रक्खा था और न ही शहर की भीड़ भाड़ ने उन्हें तंग कर रक्खा था और क्योंकि आज़ाद ज़िन्दगी की आदत थी इस लिए आज़ाद ज़िन्दगी को पसंद करते थे और अपने को किसी क़ानून या सिस्टम से बांधना नही पसंद करते थे और जो भी इनपर हुकूमत करना चाहता था उससे पूरी ताक़त के साथ लड़ते थे। केवल दो चीज़ें उनको सीमित किए हुए थीः        1.मूर्ति पूजा की ग़ुलामी और इसके धार्मिक आडम्बर।         2.क़बीलों की परम्पराओं व रिवाजों को निबाहने की ज़िम्मेदारियां।    अरब आज़ादी व डेमोक्रेसी का नमूना थे। लेकिन ऐसी आज़ादी जिसकी कोई सीमा नही थी, और जो भी इनकी शक्ति व आज़ादी को सीमित करना चाहता था (चाहे यह रोक टोक उनके हित में ही क्यों न हो)  ये उससे लड़ने को तैयार हो जाते थे। जिससे इनके अत्याचारों और अपराधों का पता चलता है जिससे अरब हिस्ट्री का एक बड़ा भाग भरा हुआ है।क़बाएली या जाति आधारित व्यवस्था    इसलाम के अगमन से पहले हिजाज़ का इलाक़ा किसी शासन के कन्ट्रोल मे नही था और वहां कोई पालिटिकल सिस्टम नही पाया जाता था इसी वजह से इनका सामाजिक जीवन ईरान और रूम के लोगों से बहुत ज़्यादा अलग दिखाई देता था। क्योंकि यह दोनों मुल्क सऊदी अरब के पड़ोसी थे और इनमे सेन्ट्रल गवर्मेन्ट पाई जाती थी जिसकी निगरानी मे मुल्क के सभी हिस्से आते थे और वहांपर केन्द्र सरकार के क़ानून लागू होते थे। लेकिन हिजाज़ में एक केन्द्रीय सरकार शहरों मे भी मौजूद नही थी। अरब के समाज का आधार क़बीले पर और इनका राजनीतिक व सामूहिक सिस्टम क़बाएली या जातीय सिस्टम पर आधारित था। और यह सिस्टम इनके जीवन के सभी पहलुओं पर प्रभावी था। और इस सिस्टम मे लोगों की स्थिति केवल किसी क़बीले से सम्बन्धित होने पर निर्भर थी और यही उनकी पहचान थी। क़बीलाई या आदिवासी ज़िन्दगी की कल्पना न केवल रेगिस्तानी घुमन्तू जातियों मे बल्कि शहरों मे भी साफ़ दिखई देती थी। इस इलाक़े मे हर क़बीला एक पूरे मुल्क की तरह था और इस काल मे क़बीलों के बीच सम्बंध वैसे ही थे जैसे आज किसी मुल्क के रिश्ते दूसरे मुल्कों से होते हैं।नस्ल का रिश्ताउस ज़माने मे अरबों में राष्ट्रीयता, मज़हबी एकता, ज़बान या अपने इतिहास के आधार पर नही बल्कि कुछ परिवारों के जोड़ से क़बीले बनते थे। परिवारों के आपसी रिश्ते नाते ही लोगों के बीच सम्बन्धों का आधार थे और हर क़बीले के लोग अपने को एक ख़ून से समझते थे। परिवारों के इकट्ठा होने से ख़ैमा और ख़ैमों के इकट्ठा होने से क़बीले बनते थे। कई क़बीलों से मिलकर बड़ी संस्थाएं बनती थीं जैसे यहूदियों की संस्था एक ही नस्ल और परिवार के आधार पर थी। यह लोग अपने ख़ैमों या तम्बुओं को इतना पास पास लगाते थे कि इससे कुछ हज़ार लोग इकट्ठा होकर एक क़बीले बना लेते थे और फिर एक साथ मवेशियों को लेकर कूच करते थे।क़बीले की सरदारीक़बीले के सरदार और मुखिया को “शेख़” कहा जाता था। शेख़ प्रायः अधिक उम्र का होता था और क़बीले की सरदारी कुछ शर्तों पर मिलती थी जैसे, अच्छी पर्सनाल्टी, उम्र, अनुभव, मालदार होना और बहादुरी आदि। शेख़ के चुनाव में मुख्य शर्तें जैसे उदारता, बहादुरी, सहनशीलता, व्यवहार कुशलता और बोलचाल के तौर तरीक़ों का भी ध्यान रक्खा जाता था। क़बीले का सरदार क़बीले के छोटे व बड़े मामलों मे एक डिक्टेटर की तरह फ़ैसले नही करता था बल्कि उस कमेटी की सलाह से काम करता था जिसे क़बीले के बुज़ुर्ग आपस मे सोचविचार कर गठित करते थे। और यही वह लोग थे जो शेख़ का चुनाव करते थे और जब तक उसके क़बीले वाले उससे ख़ुश रहते थे वह अपने पद पर बना रहता था और अगर क़बीले वाले उससे सन्तुष्ट नही होते थे तो उसे पद से हटा दिया जाता था। इस सब के बावजूद नियमानुसार क़बीले के लोग अपने सरदार के आदेशों का पालन करते थे और उसके मरने के बाद उसका बड़ा बेटा और कभी एक बुज़ुर्ग और अनुभवी इंसान जिसके अन्दर सरदारी के सभी योग्यताएं पाई जाती थीं उसे सरदारी के लिए चुन लिया जाता था।इसलाम ने अपने आगमन के बाद क़बीलाई सिस्टम से जंग की और उसको समाप्त किया और परिवार और नस्ल जो इस सिस्टम का आधार था, को महत्व नही दिया और नए इसलामी समाज की बुनियाद तौहीद के अक़ीदे और ईमान पर रक्खी, जो कि सामूहिक रिश्ता जोड़ने में बहुत प्रभावी है और इस प्रकार ख़ून के रिश्ते की जगह ईमान पर इकट्ठा होने को आधार बनाया और सभी मोमिनों को आपस मे भाई भाई बनाया और इस प्रकार अरब के सामाजिक ढांचे मे मूलभूत बदलाव हुआ।क़बीलाई भेदभावभेदभाव इतना अधिक था कि, क़बीले की आत्मा मे शामिल हो गया था, और यह इस बात का संकेत है की वह इंसान सीमा से अधिक अपने क़बीले से भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ था। सामूहिक रूप से अरबों में क़बीलाई भेदभाव वतन परस्ती की भावना की तरह था। वह काम जो एक सभ्य देश का नागरिक अपने मुल्क, मज़हब, या क़ौम के लिए करता है बद्दू अरब अपने क़बीले के लिए करते थे और इसके लिए हर काम करने के लिए हमेशा तौयार रहते थे, यहांतक की अपनी जान की भी परवाह नही करते थे। अरबों के बीच क़बाएली लोगों का बरताव अपने भाईयों और रिश्तेदारों के पक्ष में भेदभाव वाला होता था अर्थात यह लोग हर हाल में अपने क़बीले व ख़ानदान वालों का पक्ष लेते थे चाहे वह सही हों या ग़लत, सच पर हों या झूठ पर, उनकी निगाह मे अगर कोई अपने भाई का पक्ष लेने मे कमी करे तो उसकी शराफ़त पर धब्बा लग जाता था, इस सम्बन्ध मे वे कहते थे कि, अपने भाई की मदद करो चाहे वह ज़ालिम हो या पीड़ित। (एक अरब शायर न


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सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह ख़ामेनई का हज संदेश
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