ईदुल अज़्हा

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आज ईदुल अज़्हा का मुबारक दिन है आज विश्व के सारे मुसलमान खुशी मना रहे हैं। ज़िल हिज्जा महीने की दसवीं तारीख का सूरज निकलने के साथ ही विश्व के साथ सारे मुसलमान ईदे क़ुर्बान की नमाज़ पढ़ने के लिए चल पड़े हैं। ईदुल अज़्हा या बकरईद महान ईश्वर की उपासना करने वाले व्यक्तियों की प्रसन्नता और बहुत बड़ी ईश्वरीय परीक्षा का दिन है

आज ईदुल अज़्हा का मुबारक दिन है आज विश्व के सारे मुसलमान खुशी मना रहे हैं। ज़िल हिज्जा महीने की दसवीं तारीख का सूरज निकलने के साथ ही विश्व के साथ सारे मुसलमान ईदे क़ुर्बान की नमाज़ पढ़ने के लिए चल पड़े हैं। ईदुल अज़्हा या बकरईद महान ईश्वर की उपासना करने वाले व्यक्तियों की प्रसन्नता और बहुत बड़ी ईश्वरीय परीक्षा का दिन है। आज बंदगी और उन लोगों की ईद है जो हज के विशेष संस्कार को अंजाम देकर महान ईश्वर के निकट हो गये हैं। आज सऊदी अरब के पवित्र नगर मक्का के “मेना” नामक स्थान पर हज का एक संस्कार उन लोगों की ओर से किया जा रहा है जिनके हृदय महान ईश्वर की बंदगी के प्रेम रूपी सागर में डूबे हुए हैं। मानो हज़रत इब्राहीम का वह सुन्दर वाक्य है जिसे एकेश्वरवादी पढ़ रहे हैं जो हज़रत इब्राहीम महान ईश्वर की सेवा में कहा था ”मैंने अपना चेहरा उसकी ओर कर लिया है जिसने आसमान और धरती को पैदा किया है मैं अपने ईमान में विशुद्ध हूं और मैं अनेकेश्वरवादियों में से नहीं हूं” आज का दिन आध्यात्मिक पवित्रता से पूरिपूर्ण है। हम भी अपना रुख ब्रह्मांड के रचयिता की ओर करते हैं और अपनी आवश्यकता का हाथ उसकी ओर बढ़ाते हैं और उससे लोगों की भलाई एवं उनके पापों के क्षमा करने की दुआ करते हैं। हे महान ईश्वर इस दिन के वास्ते तुझसे दुआ करते हैं कि मुसलमानों को रूढिवाद के उस संकट से मुक्ति दे जिसका उन्हें आज सामना है। यह महान ईद आप सबको बहुत बहुत मुबारक हो।इस्लामी संस्कृति में ईद का विशेष अर्थ है और वह दायित्वों के निर्वाह तथा बुरे कार्यों से दूरी के बाद मिलने वाली प्रसन्नता है। ईश्वरीय धर्म इस्लाम मनुष्य को एक ज़िम्मेदार प्राणी मानता है। इसी कारण जब वह महान ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्त करने और बुराइयों से दूरी करने का प्रयास करता है तो वह दिन उसके लिए ईद का दिन होता है और वह महान ईश्वर के निकट हो जाता है। महान ईश्वर से निकट होने का अर्थ समय व स्थान की निकटता नहीं है बल्कि निकटता से तात्पर्य उसके आदेशों का पालन करके और भले कार्य अंजाम देकर उसकी असीम कृपा का पात्र बनना और उसकी दया व कृपा के निकट हो जाना है। हज पर जाने वाले लोग आज “मेना” नामक स्थान पर पहुंच चुके हैं। मेना का अर्थ इच्छा व आकांक्षा है। मेना को मेना इसलिए कहते हैं क्योंकि वह आकांक्षाओं की भूमि है। हज़रत इमाम जाफर सादिक़ अलैहिस्सलाम कहते हैं “चूंकि जिब्राईल ने हज़रत इब्राहीम से इसी भूमि पर कहा था कि आप अपनी आकांक्षा बयान करें इसलिए उसका नाम मेना पड़ गया”सच में मानवता के उच्च स्थान पर पहुंचने से बड़ी क्या आकांक्षा हो सकती है? और इससे बड़ी क्या इच्छा हो सकती है कि मनुष्य घमंड और ईर्ष्या जैसी बुराई को स्वयं से दूर करे और अपनी बुरी इच्छाओं को त्याग दे। हाजी मेना के मैदान में इस आकांक्षा के साथ रमिये जमारात अर्थात छोटे छोटे कंकर व पत्थर प्रतीकात्मक शैतान को मारते हैं कि हमारे अंदर और बाहर से शैतान दूर हो जाये इस तरह हाजी समस्त गुमराहियों के मूल कारक को निराश करते हैं। वे इस कार्य को लगातार तीन दिन करते हैं ताकि इस बात से निश्चिन्त हो जायें कि अब उन पर शैतान का बहकावा व उकसावा काम नहीं कर सकेगा।दूसरी ओर हाजी लोग ज़िल हिज्जा की दसवीं तारीख़ को मेना में भेड़, बकरी, गाय और ऊंट की कुर्बानी देते हैं और उसका मांस गरीब व निर्धन लोगों को देते हैं ताकि इस अच्छे कार्य के माध्यम से वे महान ईश्वर की असीम कृपा के निकट हो जायें और इसी कार्य को क़ुर्बानी कहा जाता है।बकरईद का दिन इस बिन्दु की याद दिलाता है कि वास्तविक प्रसन्नता उस समय है जब मनुष्य ईश्वर के आदेश को अंजाम देकर एक क़दम महान ईश्वर के निकट हो जाता है। मनुष्य अपनी बुरी आंतरिक इच्छाओं की अनदेखी को क़ुर्बानी के माध्यम से प्रदर्शित करता है। महान ईश्वर पवित्र कुरआन के सूरये हज की ३७वीं आयत में कहता है कि कहीं यह न सोचना कि भेंट चढ़ाये गये जानवरों का खून और मांस ईश्वर तक पहुंचता है बल्कि जो चीज़ ईश्वर तक पहुंचती है वह तुम्हारा तक़वा व भय है”ईश्वर चाहता है कि मनुष्य तक़वा व भय के चरणों को तय करके एक परिपूर्ण मनुष्य के मार्ग में आ जाये और वह उसके निकट हो जाये। ईरान के एक धर्मगुरू एवं विद्वान आयतुल्लाह मोहम्मद रैय शहरी इस संबंध में कहते हैं” तक़वा अर्थात ईश्वरीय भय के कुछ दर्जे हैं और भेंट व क़ुर्बानी तक़वे के सबसे ऊंचे दर्जे की ओर संकेत हो सकती है। तक़वे का एक दर्जा पापों से दूरी है। तक़वे का उससे ऊंचा दर्जा अप्रिय कार्यों से बचना है चाहे वह कार्य पाप हो या पाप न हो और तक़वे का सबसे ऊंचा दर्जा ईश्वर के अतिरिक्त जो कुछ भी है उसे क़ुर्बान कर देना अर्थात मनुष्य के हृदय में महान ईश्वर के प्रति प्रेम और धार्मिक मूल्यों के अतिरिक्त कोई और चीज़ न हो। मनुष्य का हृदय ईश्वर का घर है। जब मनुष्य का हृदय हर सांसारिक चीज़ से खाली हो जाता है तब मनुष्य के हृदय में महान ईश्वर का वास्तविक प्रेम उत्पन्न होता है और मोमिन अर्थात ईश्वर पर गहरी आस्था रखने वाले का हृदय महान ईश्वर का विशेष स्थान होता है।आज के दिन के संस्कार की जड़ इतिहास में है और वह हज़रत इब्राहीम के जीवन की कहानी से संबंधित है। हज़रत इब्राहीम ने महान ईश्वर की प्रसन्नता के लिए जो कुछ उसके अतिरिक्त उनके हृदय में था उसे बाहर निकाल दिया और महान ईश्वर से प्रेम की अनउदाहरणीय गाथा पेश कर दी। महान ईश्वर ने पवित्र कुरआन में हज़रत इब्राहीम की उपासना और उनकी तथा उनके बेटे हज़रत इस्माईल की निष्ठा को बड़े सुन्दर ढंग से बयान किया है। हज़रत इब्राहीम ने उतार चढ़ाव से भरे काफी दिन गुजारने के बाद महान ईश्वर से एक बेटे की प्रार्थना की। काफी वर्षों की प्रतीक्षा के बाद महान व सर्वसमर्थ ईश्वर ने उन्हें एक सुपुत्र प्रदान किया जिसका नाम उन्होंने इस्माईल रखा। हज़रत इब्राहीम अपने बेटे इस्माईल को बहुत चाहते थे और इस बेटे ने वर्षों के उनके दुःखों का अंत कर दिया था यहां कि वह किशोरावस्था में पहुंच गये। युवावस्था में पहुंचने के कुछ ही समय बाद उन्होंने स्वप्न में देखा कि वह महान ईश्वर के आदेश से अपने बेटे हज़रत इस्माईल की भेंट चढ़ा रहे हैं। यह स्वप्न उन्होंने तीन बार देखा। इस स्वप्न के बाद हज़रत इब्राहीम बहुत परेशान व चिंतित हो गये। उनके हृदय में एक ओर महान ईश्वर का प्रेम था और दूसरी ओर अपने बेटे इस्माईल का प्रेम था और दोनों प्रेम उनके हृदय में एक दूसरे से संघर्षरत थे। हज़रत इब्राहीम ने फैसला किया कि उन्हें ईश्वरीय प्रेम का चयन करना चाहिये। हज़रत इब्राहीम ने अपने स्वप्न की बात हज़रत इस्माईल से बतायी। चूंकि हज़रत इस्माईल भी महान ईश्वर के आदेशों के पालनकर्ता और निष्ठावान बंदे थे इसलिए उन्होंने इस प्रकार उत्तर दिया” हे पिता आपको जिस चीज़ का आदेश दिया गया है आप उसे अंजाम दीजिये ईश्वर ने चाहा तो आप मुझे धैर्य करने वालों में पायेंगे”हज़रत इब्राहीम ने अपना निर्णय कर लिया और हज़रत इस्माईल को साथ लेकर उस स्थान की ओर रवाना हो गये जहां उन्हें हज़रत इस्माईल की भेंट चढ़ानी थी। इज़रत इब्राहीम ने ईमान के ईश्वरीय प्रकाश से शैतानी उकसावे को अपने मन से दूर किया और वे महान व सर्वसमर्थ ईश्वर के प्रेम में अपने एकमात्र बेटे को क़ुर्बानी करने के लिए उसके सिरहाने बैठे गये। हज़रत इस्माईल भी ईश्वरी आदेश के समक्ष पूरी तरह नतमस्तक हो गये। हज़रत इब्राहीम ने छुरी तेज़ की और उसे अपने प्राणप्रिय बेटे की गर्दन पर फिराया परंतु छुरी ने हज़रत इस्माईल की गर्दन नहीं काटी। हज़रत इब्राहीम ने दोबारा प्रयास किया परंतु उसका भी कोई परि


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सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह ख़ामेनई का हज संदेश
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