रमज़ानुल मुबारक -15

  • News Code : 449080
  • Source : विलायत डाट इन
Brief

पैगम्बरे इस्लाम (स.अ) ने फ़रमाया: जब क़यामत होगी तो एक आवाज़ आएगी: कहाँ हैं अल्लाह के मेहमान? तो रोज़ेदारों को लाया जाएगा ... उन्हें बैहतरीन सवारियों पर सवार किया जाएगा और उनके सिर पर मुकुट सजाया जाएगा और उन्हें जन्नत में ले जाया जाएगा।

قال رسول الله صلى‏ الله‏ عليه ‏و‏آله: إذا كانَ يَومُ القِيامَةِ يُنادِي المُنادي: أينَ أضيافُ اللّه‏ِ؟ فَيُؤتى بِالصّائِمينَ ... فَيُحمَلونَ عَلى نُجُبٍ مِن نورٍ، و عَلى رُؤوسِهِم تاجُ الكَرامَةِ، و يُذهَبُ بِهِم إلَى الجَنَّةِपैगम्बरे इस्लाम (स.अ) ने फ़रमाया: जब क़यामत होगी तो एक आवाज़ आएगी: कहाँ हैं अल्लाह के मेहमान? तो रोज़ेदारों को लाया जाएगा ... उन्हें बैहतरीन सवारियों पर सवार किया जाएगा और उनके सिर पर मुकुट सजाया जाएगा और उन्हें जन्नत में ले जाया जाएगा।पैग़म्बरे इस्लाम फ़रमाते हैं कि रमज़ान के महीने में तुम्हारा सांस लेना तसबीह और तुम्हारी नींद इबादत है।  इस महीने में तुम्हारे काम अल्लाह के निकट क़बूल हैं और तुम्हारी दुआएं भी क़बूल हैं। बस तुम सदभावना और पाक मन से अपनी बातों को अल्लाह के सामने रखो और अल्लाह से दुआ करो कि वह इस महीने में तुम्हें रोज़ा रखने की तौफ़ीक़ दे और क़ुरआने करीम की तिलावत करने या उसे पढ़ने का तुम्हें अवसर प्रदान करे। दुर्भाग्यपूर्ण इंसान वह है जिसके गुनाहों को अल्लाह इस महीने में माफ़ न करे।  इस महीने की भूख और प्यास से क़यामत के दिन की भूख और प्यास को याद करो और ग़रीबों तथा वंचितों को दान दो। अल्लाह ने इंसान को हर हालत में अपनी ज़बान पर कंट्रोल रखने का हुक्म दिया है। क्योंकि देखने में यह आता है कि कंट्रोल में न रहने वाली ज़बान, इंसान के बड़े-बड़े गुनाहों का कारण बनती है। कहते हैं कि किसी गुनाह पर अल्लाह किसी को उस समय तक सज़ा नहीं देता जब तक उस गुनाह को इंसान अमली रूप न दे दे। इंसान के मन में बहुत सी बातें आती हैं। अच्छी भी और बुरी भी। इनको मन से बाहर लाकर लोगों के बीच फैलाने का काम सबसे पहले ज़बान करती है। इसी तरह किसी बुरे काम के बारे में सुनने का काम कान करते हैं लेकिन उन्हें आगे बढ़ाने का काम ज़बान द्वारा ही किया जाता है।लड़ाई-झगड़ा, बुरा भला कहना, किसी का मज़ाक़ उड़ाना, किसी का दिल दुखाना आदि यह सारे ही काम ज़बान करती है। यह छोटी सी ज़बान बड़ी-बड़ी लड़ाइयों, दुश्मनी और मन-मुटाव का कारण बन जाती है। इसीलिए रोज़े में ज़बान पर कंट्रोल रखने पर बहुत ज़्यादा बल दिया गया है और शायद इसीलिए रोज़े की हालत में सोने को भी सवाब माना गया है क्योंकि उस हालत में इंसान की ज़बान काम नहीं करती और वह अनेक गुनाहों से बचा रहता है।ज़बान की एक दूसरी ख़तरनाक बुराई, ग़ीबत अर्थात किसी के पीठ पीछे बातें बनाना है। यह बुराई, लोगों की बातें इधर-उधर फैलने का कारण बनने के अतिरिक्त, अकारण ही लोगों की निगाह में किसी इंसान का सम्मान कम होने का कारण बनती है। फिर कही गयी बातें अगर सच हों तो भी चूंकि किसी के बारे में उसके पीठ पीछे कहा गया है इसलिए यह गुनाह मानी जाती हैं और अगर झूठ हों तब तो उसका दंड और भी बढ़ जाता है। ग़ीबत को क़ुरआन में इतना बड़ा गुनाह कहा गया है कि जैसे किसी ने अपने मरे हुए भाई का गोश्त खाया हो।झूठ बोलना और झूठी क़सम खाना भी ज़बान का ही काम है।  इस तरह ज़बान, अनेक संबन्धों के टूटने, दुश्मनी पैदा करने, नफ़रत बढ़ाने, लोगों को दुखी और अपमानित करने का काम करने के कारण ही जिस्म का ख़तरनाक हिस्सा मानी जाती है। आध्यात्मिक शिक्षाओं के अनुसार ज़बान ही क़यामत में इंसान के सबसे ज़्यादा सज़ा दिये जाने का कारण बनेगी। जबकि दूसरी ओर यही ज़बान अगर कंट्रोल में रहकर सकारात्मक काम करने लगे तो रोज़े की हालत में अल्लाह की प्रशंसा करके ही नहीं बल्कि किसी को शिक्षा देकर, पढ़ाई में किसी की मदद करके, किसी के अच्छे काम की प्रशंसा करके, किसी के दुख दर्द को बांटकर, किसी दुखी को सांत्वना देकर, किसी निराश को उम्मीद बंधाकर, किसी को बुराई से रोककर, किसी के टूटते संबन्धों को जोड़कर और इसी तरह के अन्य छोटे-छोटे लेकिन महत्वपूर्ण काम करके न केवल अपने मालिक का सम्मान बढ़ा सकती है, परिवार और समाज में शांति प्रवाह कर सकती है बल्कि क़यामत में इंसान को अल्लाह के सामने शर्मिंदा होने और दंडित होने से भी बचा सकती है।इस तरह हम देखते हैं कि एक महीने तक ज़बान को कंट्रोल रखने का एक्सर साईज़, बचे हुए ग्यारह महीनों में इंसान के कैरेक्टर को कितना महान बना सकता है।रमज़ान का महीना इतना ज़्यादा महत्वपूर्ण है कि पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम ने शाबान महीने के आख़री जुमे को एक ख़ुत्बा दिया था जो इतिहास में ख़ुत्बए शाबानिया के नाम से मशहूर है। इस ख़ुत्बे में रमज़ानुल मुबारक के महत्व, उसकी विशेषताओं और इस महीने में अल्लाह की ओर से इंसान पर की जाने वाली रहमतों का उल्लेख किया गया है। इसमे रोज़ा रखने वाले के ज़िम्मेदारियों, अल्लाह की ओर से उसको दी की जाने वाली रहमतों, आत्म सुधार,, समाज सुधार, दूसरों की मदद और इसी तरह की एसी बहुत सी महत्वपूर्ण बातों को प्रस्तुत किया गया है जो हक़ व सत्य के खोजियों के लिए बहुत ही फ़ायदेमंद हैं।ख़ुत्बए शाबानिया की शुरूआत इस तरह से होती हैः ऐ लोगो, अल्लाह का महीना अपनी विभूतियों, रहमतों और गुनाहों से माफ़ी के साथ तुम्हारी ओर आ गया है।  यह वह महीना है जो अल्लाह के निकट सारे महीनों से महत्वपूर्ण है। इसके दिन भी बहुत क़ीमती दिन हैं और इसकी रातें भी बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसका हर एक क्षण अन्य क्षणों के मुक़ाबले में क़ीमती है। यह वह महीना है जिसमें अल्लाह ने तुम्हें दावत दी है और इसमें अल्लाह ने तुमको महत्व और सम्मान प्रदान किया है। अल्लाह ने इंसान को अपनी उत्तम रचना कहा है और इसीलिए उससे चाहा है कि वह अपने रचयिता तथा परवरदिगार से लगातार संपर्क बनाए रखे। इसी संपर्क का नाम इबादत है। यह संपर्क इंसान को संतुष्ट और निर्भीक बनाए रखता है क्योंकि इंसान यह जानता है कि उसका परवरदिगार समस्याओं के समाधान तथा हर संकट के निवारण में सक्षम है और वह उसे इस ज़िंदगी में कभी अकेला नहीं छोड़ेगा। साल के बारह महीनों में की जाने वाली इबादतें, इंसान का चरित्र बनाने में बहुत ही सहायक होती हैं।  यह इबादतें इंसान के अंदर घमंड नहीं आने देतीं क्योंकि वह जानता है कि उसकी ताक़त, इल्म और सौंदर्य आदि सब कुछ अल्लाह की ही देन है और केवल अल्लाह ही है जो महान है। इसी आधार पर वह किसी भी दुनियावी ताक़त से डरता और प्रभावित नहीं होता तथा अपने परवरदिगार को निगाह में रखकर ही किसी भी अल्लाह के रचना पर अत्याचार नहीं करता। दूसरी ओर अल्लाह भी अपने बंदों की इन भावनाओं को प्रबल बनाने में उनकी मदद करता है। नमाज़ का हुक्म देकर जहां वह अपने बंदे, अपनी रचना अर्थात इंसान की, केवल अपने सामने सिर झुकाने की आदत डालता है और दूसरों से न डरने का साहस प्रदान करता है वहीं रोज़ा रखने का हुक्म देकर इंसान में आत्म सुधार की भावना को मज़बूत करता है।रोज़ा क्या है?  रोज़े का सबसे आसान आयाम, सुबह से लेकर रात के शुरू होने तक खाने-पीने से दूर रहना है। यह आसान आयाम इंसान को भूख सहन करने, भूखे रहने पर मजबूर लोगों के दुख को समझने और निराशा व कामना के टकराव की उस हालत के पूर्ण एहसास का पाठ सिखाता है जो एक भूखे और ग़रीब के मन में उस समय पैदा होती है जब दूसरे तो खा रहे होते हैं और वह तथा उसके बच्चे भूखे होते हैं।जी हां। रोज़ा ज़िंदगी के विभिन्न महत्वपूर्ण आयामों को पूरी तरह से समझने का एक रास्ता है। जब एक महीने तक एक्सर साईज़ किया जाए तो फिर कठिन से कठिन पाठ भी पूरी तरह से याद हो जाता है और इंसान उस काम में पूरी तरह से माहिर जाता है जिसकी ट्रेनिंग एक महीने तक हासिल करता है। आत्म सुधार, रोज़े का एसा विस्तृत आयाम है जिसपर अगर ध्यान दिया जाए तो इससे इंसान के कैरेक्टर को निखारने वाले अनगिनत आयाम सामने आने लगते हैं।रोज़ा केवल


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सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह ख़ामेनई का हज संदेश
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