रमज़ानुल मुबारक -14

  • News Code : 446857
  • Source : विलायत डाट इन
Brief

अल्लाह के पैग़म्बरों का कहना है कि रमज़ान के महीने में शैतान के हाथ पैर बांध दिए जाते हैं कि वह दूसरों को बहका न सके। दूसरे शब्दों में यह कहना चाहिए कि जब अल्लाह के सदाचारी बंदे रोज़ा रखते हैं तो उनके अंदर शैतान के बहकावों का मुक़ाबला करने की ताक़त बढ़ जाती है जो उन्हें सुरक्षित रखती है

وَ قُلْ رَبِّ أَعُوذُ بِكَ مِنْ هَمَزاتِ الشَّياطِينِ * وَ أَعُوذُ بِكَ رَبِّ أَنْ يَحْضُرُونِकहो ऐ मेरे परवरदिगार मैं शैतान के बहकावों से तेरी पनाह चाहता हूं। मैं तेरी पनाह चाहता हूं इससे कि वह मेरे पास आएं।अल्लाह के पैग़म्बरों का कहना है कि रमज़ान के महीने में शैतान के हाथ पैर बांध दिए जाते हैं कि वह दूसरों को बहका न सके। दूसरे शब्दों में यह कहना चाहिए कि जब अल्लाह के सदाचारी बंदे रोज़ा रखते हैं तो उनके अंदर शैतान के बहकावों का मुक़ाबला करने की ताक़त बढ़ जाती है जो उन्हें सुरक्षित रखती है। सूरए मोमेनून की आयत नम्बर 97 और 98 में कहा गया है व क़ुल अऊज़ो बेका मिन हमज़ातिश्शैतान व अऊज़ो बेका रब्बे अन यहज़ोरूनी अर्थात कहो मे परवरदिगार मैं शैतान के बहकावों से तेरी पनाह चाहता हूं। मैं तेरी पनाह चाहता हूं इससे कि वह मेरे पास आएं।घटनाओं से ख़ुश या दुखी होना इंसानी स्वभाव और प्रवृत्ति का एक हिस्सा है। इंसान स्वाभाविक रूप से कुछ बातों से खुश और कुछ से दुखी होते हैं। प्रतिकूल माहौल या मानसिक स्थिति का सामना होने पर इंसान बेक़रार होता है और वह चाहे या न चाहे उसे बुरा ज़रूर लगता है। इसके विपरीत अगर हालात अनुकूल हों तो इंसान ख़ुश दिखाई पड़ता है। इंसान के पास चूंकि अक़्ल और विवेक है इसलिये वह अपनी चिंतन वाली ताक़त को इस्तेमाल करके ऐसे हालात पैदा कर सकता है जो उसके लिए आनंददायक हों इसी तरह उन बातों से ख़ुद को दूर रख सकता है जो उसके लिए पीड़ा दायक हैं। कभी कभी इंसान भविष्य के आराम और आनंद के लिए कुछ समय तक कठिनाइयां भी झेलने के लिए तैयार हो जाता है। जब कोई साइंटिस्ट वर्षों के कठिन अध्ययन और मेहनत से गुज़रता है तो उसके मन में यही उम्मीद होती है कि भविष्य में वह कोई अति क़ीमती और आनंददायक अविष्कार करेगा। आनंद और सुख के कुछ प्रकार वह हैं जिनका स्रोत इंसान की रूह और मन होता है।इंसान जब कोई भला काम और सुकाम करता है तो स्वाभाविक रूप से उसे आनंद हासिल होता है चाहे उसे इस काम में कठिनाई का सामना ही क्यों न करना पड़ा हो। रमज़ान महीने का रोज़ा भी उन इबादतों में शामिल हैं जिनमें कठिनाई और भूख तथा प्यास का सामना करना पड़ता है लेकिन इसके बदले में सदाचारी बंदों को अल्लाह की निकटता का आध्यात्मिक आनंद हासिल होता है और उनमें दूसरों की मदद की भावना प्रबल होती है। आइए ऐसे कुछ कामों के बारे में आपको बताएं जिनसे इंसान को आध्यात्मिक आनंद और सुख हासिल होता है। दूसरों की ग़ल्तियों को माफ़ और अनदेखा करना शिष्टाचारिक गुणों में शामिल है। रमज़ान के महीने में जो भलाई और अच्छे कामों का महीना है हमारे लिए ज़रूरी है कि दूसरों की ग़लतियों को माफ़ कर दें ताकि अल्लाह भी अपनी रहमत से हमारे गुनाहों को माफ़ कर दे। माफ़ी की भावना इंसानी दिल को कोमल और रौशन बनाती है तथा इंसान के मन व रूह को एक विचित्र सुख वाली हालत में पहुंचा देती है। माफ़ी से आपसी संबंध मज़बूत होते हैं और इंसान के अंदर सामाजिक भावना प्रबल होती है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैं कि एक सज्जन इंसान का सबसे अच्छा काम यह है कि दूसरों की ग़लतियों और बुरे बर्ताव की अनदेखी करे। पैग़म्बरे इस्लाम का भी एक कथन है कि इस पाक महीने में रोज़ेदारों के लिए उचित है कि हमेशा से बढ़कर क्षमा कर देने और माफ़ कर देने का प्रदर्शन करें।रमज़ान के महीने में जिन बातों की बड़ी ताकीद की गई है उनमें अल्लाह से दुआ और माफ़ी मांगना करना है। इससे इंसान को आत्मिक और आध्यात्मिक आनंद हासिल होता है। इस महीने में रोज़ा रखने वाले बड़ी दुआए पढ़ते हैं जिनमें अल्लाह से माफ़ी व इस्तेग़फ़ार को बार बार दोहराया गया है। रमज़ान के महीने के 23वें दिन की दुआ में हम पढ़ते हैं कि ऐ अल्लाह हमारे गुनाहों को धो दे और हमें अवगुणों से पाक बना दे। माफ़ी व इस्तेग़फ़ार से इंसान गुनाहों के बोझ से नजात हासिल करता है। तौबा का वास्तविक मतलब यह है कि इंसान को अपने गुनाह पर वास्तव में पछतावा हो। अर्थात इंसान अपने बुरे काम पर पश्चाताप और इस बात का दृढ़ संकल्प करे कि सुकामों और भलाई के रास्ते पर चलेगा। अल्लाह ने प्रायश्चित करने वालों के लिए यह वचन दिया है कि उनके बुरे कामों को माफ़ कर देगा। तौबा के समय अल्लाह की माफ़ी और कृपा से उम्मीद बांधना इंसान को ख़ास आध्यात्मिक आनंद प्रदान करता है। नातेदारों और संबंधियों का ध्यान रखना भी ऐसा काम है कि रमज़ान के महीने में जिस संबंध में ख़ास रूप से सिफ़ारिश की गई है। एसा करने से लोगों के बीच रिश्ते मज़बूत होते हैं यही कारण है कि इस्लाम में इस पर ख़ास रूप से बल दिया गया है तथा इस बारे में अनेक कथन मौजूद हैं। पैग़म्बरे इस्लाम का एक कथन है कि अपने रिश्तेदारों से संपर्क रखो। रमज़ान का पाक महीना और इफ़तार के सुशोभित दस्तरख़ान रिश्तेदारों के आपस में मिलने जुलने का अति उत्तम अवसर समझे जाते हैं जहां ख़ास उत्साह और मुहब्बत देखने में आता है। यह परम्परा दिलों को आपस में एक दूसरे से क़रीब करती है और रिश्तेदारी का आनंद उठाने का अवसर उपलब्ध कराती है। पैग़म्बरे इस्लाम के पौत्र हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम इफ़तारी करवाने के संबंध में कहते हैं कि जो कोई भी किसी रोज़ेदार को इफ़तारी दे उसे वही सवाब मिलेगा जो रोज़ा रखने का सवाब रोज़ा रखने वाले को मिलेगा। रिश्तेदारों से मिलने जुलने के साथ ही अगर इंसान लोगों की कठिनाइयों और समस्याओं के निदान के बारे में भी कोशिश करे तो फिर इस काम का महत्व और सवाब कई गुना बढ़ जाता है।रिश्तेदारों की समस्याओं का निदान करना भी उन कामों में है जिनका बहुत ज़्यादा महत्व है और जिसकी बड़ी अनुशंसा की गई है। इस काम से इंसान अल्लाह का सामिप्य व क़ुरबत हासिल करता है तथा रोज़ेदार का स्थान और ऊंचा होता है। इसके विपरीत रिश्तेदारों के संबंध में उदासीनता और उनकी समस्याओं की उपेक्षा अल्लाह के कृपा के बंद हो जाने का कारण बनता है। हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की हदीस है कि बेशक लोगों को तुम्हारी मदद की ज़रूरत चीज़तः तुम्हारे लिए अल्लाह की विभूतियों का भाग है इसलिये उनकी ज़रूरतएं पूरी करने से कभी परेशान नही होना चाहिए वरना यह विभूतियां दूसरों का भाग्य बन जाएंगीं। अंत में हम आपको एक घटना के बारे में बताना चाहेंगे। इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने एहसास किया कि उनके घर का ख़र्च बढ़ रहा है। उन्होंने व्यापार के माध्यम से ख़र्च पूरा करने के बारे में सोचा। इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने एक हज़ार दीनार का बंदोबस्त किया और अपने सेवक मुसादिफ़ को देकर कहा कि यह हज़ार दीनार लो और व्यापार के लिए मिस्र की यात्रा की तैयारी करो। मुसादिफ़ ने वह रक़म ली और उससे जाकर वह चीज़एं ख़रीदीं जो मिस्र ले जाकर बेची जाती थीं। मुसादिफ़ मिस्र जाने वाले एक कारवां के साथ हो लिए। जब कारवां मिस्र के क़रीब पहुंचा तो मिस्र से लौटने वाला एक कारवां दिखाई दिया। दोनों कारवानों के लोगों ने एक दूसरे से हाल चाल पूछा। बातचीत से मालूम हुआ कि मदीने से मिस्र पहुंचे कारवां के पास जो सामान है उसकी मिस्र में बड़ी ज़रूरत है और उसकी बड़ी अच्छी क़ीमत है। कारवां के लोग यह सुनकर बहुत ख़ुश हुए क्योंकि उनके पास वह सामान था जो किसी भी क़ीमत पर बिकने वाला था। कारवां के लोगों ने यह जानकारी हो जाने के बाद आपस में तय किया कि सामान को दुगने दाम पर बेचेंगे। सब मिस्र पहुंचे तो देखा वास्तव में वही स्थिति है जैसा उन्होंने सुना था। कारवां के लोगों ने अपना सामान दोहरे दाम बेचना शुरू कर दिया। नतीजे में जब मुसादिफ़ मिस्र से मदीना लौटे तो एक हज़ार दीनार का फ़ायदे उनके पास था। वह ख़ुशी के साथ


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सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह ख़ामेनई का हज संदेश
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