हज़रत अबू तालिब (अ) की वफ़ात

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  • Source : विलायत डाट इन
Brief

रमज़ान के मुबारक महीने की सातवीं तारीख हज़रत अबू तालिब (अ) की वफ़ात का दिन है। हज़रत अबू तालिब पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम के चचा और अमीरुल मोमिनीन अली अलैहिस्सलाम के बाप हैं। आप इस्लामी इतिहास की ऐसी महान हस्ती हैं जिन्होंने उस युग में इस्लाम और पैग़म्बरे इस्लाम (स.) का समर्थन किया और उनकी सुरक्षा की जब हर कोई इस्लाम और पैग़म्बर (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम) को नाबूद करने पर तुला हुआ था

रमज़ान के मुबारक महीने की सातवीं तारीख हज़रत अबू तालिब (अ) की वफ़ात का दिन है। हज़रत अबू तालिब पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम के चचा और अमीरुल मोमिनीन अली अलैहिस्सलाम के बाप हैं। आप इस्लामी इतिहास की ऐसी महान हस्ती हैं जिन्होंने उस युग में इस्लाम और पैग़म्बरे इस्लाम (स.) का समर्थन किया और उनकी सुरक्षा की जब हर कोई इस्लाम और पैग़म्बर (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम) को नाबूद करने पर तुला हुआ था। हज़रत अबू तालिब उस हस्ती का नाम है जिन्होंने इस्लाम को ऐसे अपनी गोद में पाला जैसे एक माँ अपने बच्चों को पालती है और अपना सारा चैन और आराम हराम कर अपने बच्चों की रक्षा करती है। बल्कि मां जब तक ज़िंदा रहती है बच्चों की रक्षा करती है लेकिन हज़रत अबू तालिब अ.ह ने अपने मरने के बाद भी इस्लाम की वैसे ही सुरक्षा की जैसे ज़िदगी में। इस्लाम पर जब भी दुश्मनों ने वार किया तो या हज़रत अबू तालिब अ. ढाल बनकर सामने आए या अबू तालिब अ. का ख़ून। इस्लामी इतिहास हज़रत अबू तालिब का बदल नहीं पेश कर सकती। हज़रत अबू तालिब पूरी काएनात में ऐसे मुवह्हिद हैं जो ईमान के सबसे ऊंचे दर्जे, तौहीद (एकेश्वरवाद) के बुलंदतरीन दर्जे पर पदासीन रहे हैं। आप ही के ख़ून से इमामत का सिलसिला शुरू हुआ है और आपके वुजूद में अल्लाह का नूर शामिल है।
लेकिन समय के अत्याचारी जो वास्तव में इस्लाम के दुश्मन थे जो पैगम्बर (स.) के दुश्मन थे जो नहीं चाहते थे कि इस्लाम तरक़्क़ी करे जब वह इस्लाम की महिमा और सम्मान के सामने फीके पड़ गए तो उन्होंने उस हस्ती की महानता पर वार शुरू कर दिये जिसने इस्लाम की रक्षा में खुद को दांव पर लगाया।
हज़रत अबू तालिब के ईमान के बारे में सवाल उठाकर उनके कैरेक्टर को गिराने की नाकाम कोशिश शुरू कर दी कि क्या अबूतालिब अल्लाह की वहदानियत (एकेश्वरवाद) और रसूल की नुबूव्वत पर ईमान लाये थे या नहीं? यह सवाल उस महान हस्ती के बारे में में उठाया गया जिनकी गोद में प्रशिक्षण पाने वालों में से कोई पैग़म्बर बना और कोई इमाम। यह सवाल उस इस्लाम के रक्षक के बारे में किया गया जिसने हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स.) से कहा ''बेटा जाओ जो कहना चाहते हो कहो अल्लाह की क़सम मैं तुम्हें कभी अकेला नहीं छ़ोड़ूंगा.'' ऐसे इंसान के ईमान को शक की निगाह से देखा जा रहा है जो अल्लाह की क़सम खा कर खुदा के भेजे हुए रसूल की आख़री दम तक हिमायत करने का वादा करता है और उसे अमली व क्रियात्मक बना कर दिखा भी देता है कि जब तक अबूतालिब ज़िंदा है कोई अब्दुल्ला के बेटे की तरफ़ निगाह उठाकर नहीं देख सकता।
आश्चर्य इस बात पर है कि जो मरते दम तक रसूले इस्लाम (स.) की मदद करे, लोग उसके ईमान में संदेह करें???
पांचवें इमाम हज़रत मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं:'' अगर अबूतालिब के ईमान को तराजू के एक पल्ले में रख दिया जाए और सभी दूसरे लोगों के ईमान को तराजू के दूसरे पल्ले में रखा जाए तो अबूतालिब के ईमान का पलड़ा भारी हो जाएगा।'' जिसके बेटे की एक ज़रबत सक़लैन की इबादतों पर भारी हो सकती है उसके बाप का ईमान अगर सभी इंसानों के ईमान पर भारी हो तो इसमें आश्चर्य क्या है?
इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम से रिवायत है कि एक दिन अमीरुल मोमिनीन अली अलैहिस्सलाम'' रहबह 'के स्थान पर बैठे थे एक आदमी उठा और उसने आपसे व्यंग भरे लहजे में कहा या अमीरुल मोमिनीन कैसे आपका अल्लाह के नज़दीक इतना बड़ा स्थान है जब कि आपके बाप अबूतालिब जहन्नम की आग में गिरफ्तार हैं?
हज़रत अली अलैहिस्सलाम बहुत ज़्यादा ग़ुस्सा हुए और कहा:'' ... उस ख़ुदा की क़सम जिसने मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम को हक़ पर मबऊस (भेजा) किया, अगर मेरे बाप अबूतालिब क़यामत के दिन दुनिया के सभी इंसानों की सिफारिश करें तो अल्लाह उनकी सिफ़ारिश क़ुबूल कर लेगा। कैसे संभव है कि बाप जहन्नम में जले जबकि बेटा जन्नत व जहन्नम का बाटने वाल हो? खुदा की कसम जिसने मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम को हक़ पर मबऊस (भेजा) किया है क़यामत के दिन अबूतालिब का नूर, पंजतन और इमामों के नूर के अलावा सभी पर भारी होगा इसलिए कि उनका नूर उसी अहलेबैत के नूर से है जिसे अल्लाह ने हज़रत आदम अ. से दो हजार साल पहले पैदा किया था।''
जनाबे अबूतालिब की इस गरिमा व महानता के बावजूद उनके ईमान में संदेह करना जेहालत, अज्ञानता और ईर्ष्या के अतिरिक्त कुछ नहीं है। जैसा कि इब्ने अबिल हदीद ने कहा है कि ''अगर अबूतालिब और उनके बेटे अली न होते तो इस्लाम का प्रचार सम्भव नहीं हो सकता था, अबू तालिब ने मक्के और अली (अ) ने मदीने में पैग़म्बर की मदद की''।
रसूले ख़ुदा (स.) फ़रमाते हैं:'' जब तक अबूतालिब ज़िंदा थे कुरैश मुझ से भय खाते और डरते थे।''
जनाबे अबूतालिब की वफ़ात के बाद कुफ़्फ़ार व मुशरिकीन के सामने सबसे बड़ी दीवार हट गई। इसलिए उन्होंने रसूले इस्लाम (स.) पर हमले शुरू कर दिए यहां तक कि हज़रत जिब्रईल नाज़िल हुए और कहा: अल्लाह का सलाम हो आप पर अल्लाह ने कहा है कि आपका मददगार व सहायक चल बसा अब मक्के को छोड़ कर मदीना का रुख करें।

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सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह ख़ामेनई का हज संदेश
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