रमज़ानुल मुबारक-४

  • News Code : 440724
  • Source : विलायत डाट इन
Brief

रमज़ान के महीने को ख़ुदा नें ख़ास महीना बनाया है, इस में कुछ ख़ास चीज़ें और ख़ास बातें हैं। इसकी कुछ ख़ास विशेषताएं हैं। उसकी हर चीज़ में बरकत है। इसके दिन, इसकी रातें, इसके घण्टे, इसकी हर घड़ी, इसमें ज़िक्र करना, थोड़ा सा सदक़ा देना, कोई नेक काम करना, सब में बरकत है। दूसरे दिनों में एक नेक काम के लिये जो सवाब है उसमें वह हज़ार गुना हो जाता है।

रमज़ान के महीने को ख़ुदा नें ख़ास महीना बनाया है, इस में कुछ ख़ास चीज़ें और ख़ास बातें हैं। इसकी कुछ ख़ास विशेषताएं हैं। उसकी हर चीज़ में बरकत है। इसके दिन, इसकी रातें, इसके घण्टे, इसकी हर घड़ी, इसमें ज़िक्र करना, थोड़ा सा सदक़ा देना, कोई नेक काम करना, सब में बरकत है। दूसरे दिनों में एक नेक काम के लिये जो सवाब है उसमें वह हज़ार गुना हो जाता है।इस पाक महीने में बहुत ज़्यादा सवाब वाले कामों की कमी नहीं है उन्हीं में से एक अनाथ और यतीम बच्चों की देखभाल है, पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के नवासे हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की हदीस है कि जब कभी कोई अनाथ रोता है तो आसमान हिल जाता है और अल्लाह कहता है कि किसने मेरे बंदे और माँ बाप को खो देने वाले बच्चे को रुलाया है? मुझे अपने सम्मान और महानता की क़सम कि जो कोई इसे शांत करेगा मैं उसके लिए जन्नत को वाजिब कर दूंगा।ख़ूबसूरत समाज ऐसा समाज है जिसमें लोगों के संबंध आपस में मोहब्बत, सदभावना और सदगुणों पर आधारित हों। ऐसे समाज में लोग एक दूसरे के क़रीब होते हैं और समस्याओं के समाधान और कठिनाइयों को दूर करने में आपस में सहयोग करते हैं। समाज में भाईचारे, उपकार, माफ़ी,दान और ऐसे ही अनेक सदगुण फलते फूलते हैं। क़ुरआने मजीद के सूरए बक़रह की आयत नंबर २६५ दो सौ पैंसठ में अल्लाह दान दक्षिणा के सम्बंध में बड़ी ही ख़ूबसूरत उपमा देता है। वह कहता है, जो लोग अल्लाह की ख़ुशी और अपने आप को मज़बूत बनाने के लिए दान दक्षिणा करते हैं उनकी उपमा उस बाग़ की तरह है जो किसी ऊंचाई पर हो और तेज़ बारिश आकर उसकी फ़सल को दोगुना बना दे और अगर तेज़ बारिश न आए तो साधारण बारिश ही काफ़ी हो जाए। सैद्धांतिक रुप से हर समाज को भलाई और परोपकार की ज़रूरत होती है। इस बात का इतना महत्व है कि क़ुरआने मजीद के सूरए नहल की आयत नंबर ९० में अल्लाह ने भलाई को न्याय के साथ रखा है और कहा है कि अल्लाह तुम्हें न्याय, भलाई और अपने परिजनों के साथ माफ़ी से काम लेने का न्यौता देता है और बुरे व नापसंदीदा कामों तथा अत्याचार से रोकता है, अल्लाह तुम्हें उपदेश देता है कि शायद तुम सीख हासिल करो। इस तरह से हर समाज को न्याय की भी ज़रूरत होती है और भले कामों की भी। अगर किसी समाज में न्याय न हो तो उसका आधार डगमगाने लगता है और अगर भले काम न हों तो समाज का माहौल बंजर हो जाता है। एक दिन हज़रत ईसा मसीह अलैहिस्सलाम एक क़ब्र के क़रीब से गुज़रे, जिसमें दफ़न किया गया इंसान अल्लाह के अज़ाब में ग्रस्त था। एक साल के बाद जब वह उसी स्थान से गुज़रे तो उन्होंने देखा कि उस इंसान को सज़ा नहीं दी जा रही है। उन्होंने आशचर्य से पूछा ऐ मेरे परवरदिगार! पिछले साल यह इंसान अज़ाब में ग्रस्त था लेकिन अब इसका अज़ाब ख़त्म कर दिया गया है। इसका कारण क्या है? अल्लाह ने अपने ख़ास संदेश द्वारा उन्हें जवाब दिया। ऐ ईसा! इस इंसान का एक भला बेटा है जिसने इस साल लोगों के आने जाने के एक रास्ते को दोबारा बनवाया है और एक अनाथ की अभिभावकता स्वीकार की है, उस के इसी भले काम के कारण उसके बाप के अज़ाब को माफ़ कर दिया गया है। इस्लाम में हर काम की सीमा और हर परंपरा के ख़ास संस्कार होते हैं। लोगों को खाना खिलाने और दान दक्षिणा के संबंध में जो सबसे महत्वपूर्ण बात मद्देनज़र रहनी चाहिए वह यह है कि मेज़बान की भावना अल्लाह का सामिप्य व क़ुरबत हासिल करने और उसे ख़ुश करने के अतिरिक्त कुछ और नहीं होनी चाहिए। इस बात का सबसे स्पष्ट नतीजा दिखावे और घमण्ड से बचना है। एक दूसरी बात यह कि मेज़बान को न्यौता देते समय अपने ग़रीब नातेदारों को प्राथमिकता देनी चाहिए। इसी तरह जो इंसान दान दक्षिणा कर रहा है उसे वही चीज़ दान करनी चाहिए जो उसे ख़ुद पसंद हो। इस तरह का काम समाज में ग़रीबी का ख़ात्मा करने के साथ ही ख़ुद इंसान की आध्यात्मिक और आत्मिक प्रगति व परिपूर्णता पर बहुत ज़्यादा सकारात्मक प्रभाव डालता है। यही कारण है कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैं। नि:संदेह तुम्हें दान दक्षिणा के नतीजा की उस इंसान से ज़्यादा ज़रूरत है जो तुम से दान ले रहा है। इस काम से तुम्हें होने वाला फ़ायदे उस इंसान के फ़ायदे से कहीं ज़्यादा है जिसे तुमने दान दिया है।पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने कहा है शैतान इंसान के जिस्म में ख़ून की तरह दौड़ता है तो उस के रास्ते को भूख द्वारा तंग करो। शैतान अर्थात इंसान को बुराई की ओर ले जाने वाला वुजूद शैतान का कोई एक रुप नही होता। शैतान अर्थात बहकाने वाला तो फिर हमारे आस पास हमारे जान पहचान वालों और दोस्तों में भी बहुत से लोग बहकाने वाले हो सकते हैं। आजकल बहुत से बच्चे बुरे दोस्तों के कारण ख़राब हो जाते हैं। लेकिन पैग़म्बरे इस्लाम स.अ. ने इस हदीस में जिस्म के भीतर ख़ून की तरह दौड़ने वाले जिस शैतान की बात की है उस से आप कीम मुराद वह इच्छाएं भी हो सकती हैं जो इंसान को बुराई की ओर ले जाती है। क्योंकि हर इंसान में बुरे काम की इच्छा होती है अब अगर उस की अंतरात्मा बुरे काम की इच्छा से से ज़्यादा शाक्तिशाली होती है तो वह इंसान को बुराई से रोक देती हैं लेकिन जिस की अंतरात्मा विभिन्न कारणों से कमज़ोर हो चुकी होती है उसे फिर बुराई, बुराई नहीं लगती और वह बड़े आराम से बुरे काम करता है अर्थात उस के जिस्म में शैतान का राज होता है और वह उस के ख़ून के साथ उस के जिस्म के कोने कोने में पहुंच जाता है। रोज़ा वास्तव में इच्छाओं पर कंट्रोल और अंतरात्मा की चेतना में बढोत्तरी का एक रास्ता है। क्योंकि भूख व प्यास रूह को स्वच्छ करती है। अध्यात्मिक स्थान तक पहुंचने के लिए लगभग सभी धर्मों में शारिरिक सुख छोड़ने और भोग विलास से दूरी अपनाने की बात की गयी है लेकिन इस्लाम में इस पर भी कंट्रोल किया गया है और शरीरिक सुख त्यागने की भी सीमाएं निर्धारित की गयी हैं। हालांकि रोज़े का मक़सद खाना पीना छोड़ने से ही नही पूरा होता बल्कि रोज़े में जिस तरह खाना पीना छोड़ने को कहा गया है उसी तरह पीठ पीछे दूसरों की बुराई करने, झूठ बोलने और दूसरों को कष्ट पहुंचाने जैसी बहुत सी बुराइयों से भी रोका गया है। इस के साथ ही सिफ़ारिश की गयी है कि रोज़े की हालत में किसी की बुराई नहीं सुननी चाहिए और बात करने में भी होशियार रहना चाहिए कि मुंह से असभ्य अथवा किसी को कष्ट पहुंचाने वाली बात न निकलने पाए अगर कोई इस तरह का रोज़ा रखने में कामयाब हो जाता है तो वास्तव में वह अल्लाह की असीम कृपा का पात्र हो जाता है वरना रोज़ा मात्र भूख प्यास सहन करना ही होता है।


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सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह ख़ामेनई का हज संदेश
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