माँ बाप के अधिकार

  • News Code : 438011
  • Source : विलायत डाट इन
Brief

हमें अच्छी तरह मालूम है कि इस्लाम एक समाजिक और सोशल दीन है और उसके मानने वाले केवल अल्लाह तआला की इच्छा के लिए और उसकी राह में क़दम उठाते हुए एक दूसरे से सम्बंध और सम्पर्क रखते हैं।

हमें अच्छी तरह मालूम है कि इस्लाम एक समाजिक और सोशल दीन है और उसके मानने वाले केवल अल्लाह तआला की इच्छा के लिए और उसकी राह में क़दम उठाते हुए एक दूसरे से सम्बंध और सम्पर्क रखते हैं।इस्लाम ने हमें समाज में ज़िन्दगी बिताने के सिद्धांत भी अच्छी तरह बता दिए हैं ताकि उनकी पहचान के बाद उन पर अमल करके हम अल्लाह को ख़ुश कर सकें और उसके नतीजे में दुनिया व आख़ेरत का सौभाग्य हासिल कर सकें।इसलिए अगर हम दूसरों के बारे में अपनी ज़िम्मेदारियां और कर्तव्य अदा करना चाहें तो उससे पहले उनसे सम्बंधित उन सारे अधिकारों को जानना ज़रूरी है जो हमारी गरदन पर हैं।यहाँ संतानों के ऊपर माँ बाप के अधिकारों को बयान किया जा रहा है।1.  माँ बाप के साथ अच्छा व्यवहारइस्लाम में संतान के ऊपर माँ बाप का सबसे अहेम और वाजिब अधिकार अच्छा व्यवहार है, यही वजह है कि अल्लाह तआला ने माँ बाप के साथ अच्छे व्यवहार और अपनी इबादत का हुक्म एक साथ दिया है जैसे कि क़ुर्आने मजीद में आया हैःऔर आपके परवरदिगार का फ़ैसला यह है कि तुम उसके आलावा किसी की इबादत ना करना और माँ बाप के साथ अच्छा व्यवहार करना और अगर तुम्हारे सामने उन दोनों में से कोई एक या दोनो बूढ़े हो जाएँ तो ख़बरदार उनसे उफ़्फ तक ना करना और उन्हें झिड़कना भी नहीं और उनसे हमेशा अच्छी शैली में बातचीत करते रहना और उनके लिए नम्रता के साथ अपने कंधों को झुका देना और उनके हक़ में दुआ करते रहना कि परवरदिगार उन दोनो पर उसी तरह रहमत नाज़िल फ़रमा जिस तरह कि उन्होंने बचपने में मुझे पाला है।     (सूरए असरा 23 - 25)इस आयाते करीमा में अल्लाह तआला जहाँ अपने बंदो को अपनी इबादत का हुक्म दिया है वहीं उन्हें माँ बाप के साथ अच्छा व्यवहार और अच्छा व्यवहार का हुक्म भी दिया है।हज़रत इमाम-ए-जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम ने इस आयत ‘‘وبالوالدین احسانا’’ में एहसान के अर्थ को इस तरह बयान किया हैःमाँ बाप के साथ अच्छे व्यवहार का मतलब यह है कि अच्छी तरह उनके साथ रहो और अगर उन्हें किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो उनके सवाल करने से पहले ही उनकी सेवा में हाज़िर कर दो चाहे वह आत्मनिर्भर ही क्यों ना हों।हज़रत मुहम्मद मुसतफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम से किसी ने सवाल किया कि संतान के ऊपर माँ बाप का क्या हक़ है?तो आप ने फ़रमायाः(संक्षिप्त रूप से यह समझ लो कि) वह तुम्हारी जन्नत और जहन्नम हैं।    (अत्तरग़ीब वत्तरहीब 3/316)यानी आख़ेरत में इंसान इन्हीं माँ बाप के द्वारा जन्नत और जहन्नम में पहुँचेगा जैसे की इसी बात की तरफ़ इस हदीसे शरीफ़ में इशारा किया गया हैःजन्नत माँ के क़दमों के नीचे है।    (कनज़ुल अम्माल हदीस 45439)हालांकि संतान के ऊपर माँ बाप के अधिकार के बारे में बहुत ज़्यादा हदीसें मौजूद हैं मगर उसके बावजूद माँ के अधिकार और मरतबे के सिलसिले में और ज़्यादा ताकीद और प्राथमिकता पायी जाती है जैसा कि इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम के रिसालए हुक़ूक़ में इसकी तरफ़ यूँ इशारा पाया जाता हैःइसके बाद अल्लाह ने तुम्हारी गरदन पर तुम्हारी माँ का हक़ वाजिब किया है उसके बाद तुम्हारे बाप का हक़ है और फ़िर तुम्हारी संतान का हक़ है आख़िर में आप ने माँ के अधिकार की स्पष्टीकरण इन शब्दों में किया है।माँ का हक़ यह है कि तुम यह याद रखो कि उनसे तुम्हारे बोझ को (अपने पेट) में इतने दिन तक उठाया है जिसको कोई दूसरा वहाँ रख कर नहीं उठा सकता है और उसने तुम को अपना ख़ूने दिल पिलाया है और ऐसा भोजन दिया है जो दुनिया में कोई नहीं दे सकता और उसने अपने कान, आँख, हाथ, पैर, बाल और खाल बल्कि अपने पूरे वजूद की सारी क्षमताओं के साथ बख़ूबी हंसते हुए और मुस्कुराते हुए अपनी सारे संकट और मुश्किलों के हर बोझ को आसानी के साथ उठाया......यहाँ तक कि दस्ते क़ुदरत ने तुम को उसके वजूद से जुदा कर दिया और तुम्हारे क़दम ज़मीन पर पहुँच गए (यानी तुम पैदा हुए) फिर भी वह उससे ख़ुश और राज़ी रही कि चाहे ख़ुद भूखी रहे मगर तुम को सैर करती रहे और तुम को लिबास पहनाए चाहे ख़ुद बे लिबास रहना पड़े तुम को सैराब करे चाहे ख़ुद प्यासी रहे, ख़ुद धूप बर्दाश्त करले मगर तुम को अपने साए में रखे और ख़ुद ज़हमतें बर्दाश्त करके तुमहें नेमतों से मालामाल कर दे और जाग कर तुम्हें मीठी नींद का अवसर प्रदान करदे उसका पेट तुम्हारी रचना का बर्तन, उसकी गोद तुम्हारा झूला, और उसका सीना तुम्हें सैराब करने वाली झील और उसका पूरा वजूद तुम्हारा रक्षक था, उसने तुम्हारे लिए दुनिया की हर सरदी और गरमी को डायरेक्ट अपने ऊपर सह लिया इसलिये तुम उस मात्रा में उसका शुक्रिया अदा करो और यह तुम्हारे लिए असम्भव है ? मगर यह कि अल्लाह तआला की तौफ़ीक़ और सहायता के सहारे ! (बेहारुल अनवार जि 74 बाब 1, हदीस 2)उसके बाद इमाम ज़ैनुल आबदीन अलैहिस्सलाम ने बाप के हक़ का फ़लसफ़ा बयान किया हैःऔर अपने बाप के हक़ के बारे में तुम्हें याद रहे कि वह तुम्हारी अस्ल व जड़ है और तुम उसकी शाख़ा हो, अगर वह ना होता तो तुम्हारा वजूद भी ना होता इसलिये अपने अंदर तुम्हें अगर कोई ऐसी नेमत नज़र आये जिस से तुम्हें तअज्जुब और आश्चर्य हो तो ध्यान रखना कि तुम्हारा बाप ही उन नेमतों की अस्ल व बुनियाद है इसलिये अल्लाह का शुक्रिया अदा करो और उन नेमतों के बराबर उसका शुक्रिया अदा करो। (बेहारुल अनवार जि 74 बाब 1, हदीस2)इमाम ज़ैनुल आबदीन अलैहिस्सलाम ने माँ की मेहरबानियों का जो नक्शा खींचा है उससे माँ की मामता सामने आ जाती है जो कि रहमते इलाहिया का एक नमूना है क्योंकि माँ की गोद जिस मुहब्बत और मामता से भरी होती है उसको समझना हमारे लिए असम्भव है।2.  अनैतिकता व चिड़चिड़ेपन से परहेज़।किसी बात से नाराजगी पर इंसान की सबसे मामूली प्रतिक्रिया यह होती है कि उसकी ज़बान से उफ़्फ़ निकल जाता है और उफ़्फ़ वह आवाज़ है जो किसी मामूली अफ़सोस के क्षणों में इंसान की ज़बान पर आ जाती है, अल्लाह तआला को इतना मामूली शिकवा भी माँ बाप के बारे में बर्दाश्त नहीं है इसी लिए उसने मोमेनीन को उफ़्फ़ तक करने से मना किया है, जैसा कि अल्लाह ताला का इरशादे हैःख़बरदार उनसे (माँ बाप से) उफ़्फ़ तक ना कहना और उन्हें झिड़कना भी नहीं।    (सूरए इसरा/23)हज़रत इमाम-ए-जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम का इरशाद हैःआक़ होने के लिए सबसे मामूली चीज़ उफ़्फ़ कहना है और अगर अल्लाह तआला की निगाह में कोई और चीज़ उससे तुच्छ और मामूली होती तो वह उससे भी मना कर देता। (बेहारुल अनवार जि 74, पे 6)इसलिये जब पहले स्टेज में उफ़्फ़ तक करने से मना कर दिया गया है तो अगर कोई उन्हें बुरा कहे या बुलंद आवाज़ से उनसे बात करे या उन्हें झिड़क दे तो उसका किया हाल होगा ?क्योंकि यह एक बड़ा गुनाह अर्थात गुनाहे कबीरा है।इसलिए इस बड़े गुनाह अर्थात गुनाहे कबीरा के बाद जो लोग आक़ हो जाते हैं अगर अल्लाह तआला दूसरे बड़े गुनाहों के अज़ाब की तरह उनका भी सख़्त हिसाब ले और उन्हें दर्दनाक अज़ाब में ग्रस्त कर दे तो इस में कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम फ़रमाते हैंअल्लाह के नज़दीक क़यामत के दिन सबसे बड़े गुनाह यह हैं:शिर्क बिल्लाह (अनेकेश्वरवाद), ना हक़ किसी मोमिन को क़त्ल करना, मैदाने जेहाद से फ़रार करना, और माँ बाप का आक़ होना।दूसरी हदीस में हैःमाँ बाप के आक़ हुये से कहा जाएगा कि जो तेरा दिल चाहे अंजाम दे निश्चित रूप से मैं तुझे माफ़ नहीं कर सकता।संक्षिप्त रूप से यह कि आक़ होने का नतीजा क़यामत के दिन अल्लाह की माफ़ी और जन्नत से महरूमी है हालांकि यह स्पष्ट रहे कि आक़ होना भी दूसरे गुनाहों की तरह एक गुनाह है और अल्ला


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